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सीतायाः वनगमनम्

Sitayah Vanagamanam · ସୀତାୟାଃ ବନଗମନମ୍ (ପଦ୍ୟ)

ସଂସ୍କୃତ (संस्कृतसाहित्यमञ्जरी) · ଓଡ଼ିଶା ବୋର୍ଡ ଦଶମ ଶ୍ରେଣୀ · ପଦ୍ୟଭାଗ ପ୍ରଥମ ପାଠ · ଟିପ୍ପଣୀ + ଅଭ୍ୟାସ + ୨୫ Quiz

📖 ପାଠ ପରିଚୟ: ଏହି ପଦ୍ୟ ଆଦିକବି ବାଲ୍ମୀକିଙ୍କ ‘ରାମାୟଣ’ର ଅଯୋଧ୍ୟାକାଣ୍ଡରୁ ଗୃହୀତ। ରାମାୟଣର କଥା ଅତ୍ୟନ୍ତ ରମଣୀୟ — ତେଣୁ କୁହାଯାଏ “ରମ୍ୟା ରାମାୟଣୀ କଥା”। ମନୁଷ୍ୟର ଆଚାର-ବିଚାର ପାଇଁ ରାମାୟଣ ଆଦର୍ଶ, ଆଉ ରାମ ମର୍ଯ୍ୟାଦାବାନ ଆଦର୍ଶପୁରୁଷ। କୈକେୟୀଙ୍କ ସତ୍ୟପାଶରେ ବନ୍ଧା ଦଶରଥ ରାମଙ୍କୁ ବନକୁ ପଠାଇଲେ। ସୀତା ମଧ୍ୟ ସ୍ୱାମୀ (ରାମ) ସହ ବନ ଯିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କଲେ ଓ ଗଲେ। ଏହି ୩୨ ଶ୍ଳୋକରେ ରାମ-ସୀତାଙ୍କ ସେହି ସଂଳାପ ବର୍ଣ୍ଣିତ।

ମୂଳ ପାଠ (मूलपाठः — ୩୨ ଶ୍ଳୋକ)

॥୧॥ प्रविवेशाथ रामस्तु स्ववेश्म सुविभूषितम्।
प्रहृष्टजनसम्पूर्णं ह्रिया किञ्चिदवाङ्मुखः॥
॥୨॥ अथ सीता समुत्पत्य वेपमाना च तं पतिम्।
अपश्यच्छोकसंतप्तं चिन्ताव्याकुलितेन्द्रियम्॥
॥୩॥ तां दृष्ट्वा स हि धर्मात्मा न शशाक मनोगतम्।
तं शोकं राघवः सोढुं ततो विवृततां गतः॥
॥୪॥ विवर्णवदनं दृष्ट्वा तं प्रस्विन्नममर्षणम्।
आह दुःखाभिसंतप्ता किमिदानीमिदं प्रभो॥
॥୫॥ अभिषेको यदा सज्जः किमिदानीमिदं तव।
अपूर्वो मुखवर्णश्च न प्रहर्षश्च लक्ष्यते॥
॥୬॥ इतीव विलपन्तीं तां प्रोवाच रघुनन्दनः।
सीते तत्रभवांस्तातः प्रव्राजयति मां वनम्॥
॥୭॥ कुले महति संभूते धर्मज्ञे धर्मचारिणि।
शृणु जानकि येनेदं क्रमेणाद्यागतं मम॥
॥୮॥ राज्ञा सत्यप्रतिज्ञेन पित्रा दशरथेन वै।
कैकेय्यै मम मात्रे तु पुरा दत्तौ महावरौ॥
॥୯॥ तयाद्य मम सज्जेऽस्मिन्नभिषेके नृपोद्यते।
प्रचोदितः स समयो धर्मेण प्रतिनिर्जितः॥
॥୧୦॥ चतुर्दश हि वर्षाणि वस्तव्यं दण्डके मया।
पित्रा मे भरतश्चापि यौवराज्ये नियोजितः॥
॥୧୧॥ विप्रियं न च कर्त्तव्यं भरतस्य कदाचन।
स हि राजा च वैदेहि देशस्य च कुलस्य च॥
॥୧୨॥ अहं गमिष्यामि महावनं प्रिये त्वया हि वस्तव्यमिहैव भामिनि।
यथा व्यलीकं कुरुषे न कस्यचित् तथा त्वया कार्यमिदं वचो मम॥
॥୧୩॥ एवमुक्ता तु वैदेही प्रियार्हा प्रियवादिनी।
प्रणयादेव संक्रुद्धा भर्त्तारमिदमब्रवीत्॥
॥୧୪॥ किमिदं भाषसे राम वाक्यं लघुतया ध्रुवम्।
त्वया यदपहास्यं मे श्रुत्वा नरवरोत्तम॥
॥୧୫॥ आर्यपुत्र पिता माता भ्राता पुत्रस्तथा स्नुषा।
स्वानि पुण्यानि भुञ्जानाः स्वं स्वं भाग्यमुपासते॥
॥୧୬॥ भर्त्तुर्भाग्यं तु नार्येका प्राप्नोति पुरुषर्षभ।
अतश्चैवाहमादिष्टा वने वस्तव्यमित्यपि॥
॥୧୭॥ प्रासादाग्रे विमानैर्वा वैहायसगतेन वा।
सर्वावस्थागता भर्त्तुः पादच्छाया विशिष्यते॥
॥୧୮॥ अहं दुर्गं गमिष्यामि वनं पुरुषवर्जितम्।
नानामृगगणाकीर्णं शार्दूलगणसेवितम्॥
॥୧୯॥ सुखं वने निवत्स्यामि यथैव भवने पितुः।
अचिन्तयन्ती त्रील्लोकांश्चिन्तयन्ती पतिव्रतम्॥
॥୨୦॥ स एवं ब्रुवतीं सीतां धर्मज्ञां धर्मवत्सलः।
न नेतुं कुरुते बुद्धिं वने दुःखानि चिन्तयन्॥
॥୨୧॥ सीते यथा त्वां वक्ष्यामि तथा कार्यं त्वयाबले।
वने दोषा हि बहवो वसतस्तान् निबोध मे॥
॥୨୨॥ सुप्यते पर्णशय्यासु स्वयंभग्नासु भूतले।
रात्रिषु श्रमखिन्नेन तस्मात् दुःखमतो वनम्॥
॥୨୩॥ उपवासश्च कर्त्तव्यो यथाप्राणेन मैथिलि।
जटाभारश्च कर्त्तव्यो वल्कलाम्बरधारणम्॥
॥୨୪॥ अतीव वातस्तिमिरं बुभुक्षा चाति नित्यशः।
भयानि च महान्त्यत्र ततो दुःखतरं वनम्॥
॥୨୫॥ तदलं ते वनं गत्वा क्षेमं न हि वनं तव।
विमृशन्निव पश्यामि बहुदोषकरं वनम्॥
॥୨୬॥ एतत् तु वचनं श्रुत्वा सीता रामस्य दुःखिता।
प्रसक्ताश्रुमुखी मन्दमिदं वचनमब्रवीत्॥
॥୨୭॥ ये त्वया कीर्त्तिता दोषा वने वस्तव्यतां प्रति।
गुणानित्येव तान् विद्धि तव स्नेहपुरस्कृता॥
॥୨୮॥ त्वया च सह गन्तव्यं मया गुरुजनाज्ञया।
त्वद्वियोगेन मे राम त्यक्तव्यमिह जीवितम्॥
॥୨୯॥ भक्तां पतिव्रतां दीनां मां समां सुखदुःखयोः।
नेतुमर्हसि काकुत्स्थ समानसुखदुःखिनीम्॥
॥୩୦॥ यदि मां दुःखितामेवं वनं नेतुं न चेच्छसि।
विषमग्निं जलं वाहमास्थास्ये मृत्युकारणात्॥
॥୩୧॥ तां परिष्वज्य बाहुभ्यां विसंज्ञामिव दुःखिताम्।
उवाच वचनं रामः परिविश्वासयंस्तदा॥
॥୩୨॥ आरभस्व शुभश्रोणि वनवासक्षमाः क्रियाः।
नेदानीं त्वदृते सीते स्वर्गोऽपि मम रोचते॥
(रामायणस्यायोध्याकाण्डम्)

ଓଡ଼ିଆ ଅନୁବାଦ (ଭାବାର୍ଥ)

(ଶ୍ଳୋକ ୧–୫): ରାମ ଲଜ୍ଜାରେ ଈଷତ୍ ତଳମୁହାଁ ହୋଇ ପ୍ରସନ୍ନ-ଜନଙ୍କରେ ଭରା ସୁସଜ୍ଜିତ ନିଜ ପ୍ରାସାଦରେ ପ୍ରବେଶ କଲେ। ସୀତା ଥରିଥରି ଉଠି ଦୌଡ଼ି ଆସି ଦେଖିଲେ — ସ୍ୱାମୀ ଶୋକରେ ସନ୍ତପ୍ତ, ଚିନ୍ତାରେ ଇନ୍ଦ୍ରିୟ ବିକଳିତ। ଧର୍ମାତ୍ମା ରାମ ମନ ଭିତରର ଶୋକ ଲୁଚାଇ ପାରିଲେ ନାହିଁ। ବିବର୍ଣ୍ଣ-ମୁଖ, ଝାଳ-ଭିଜା, କ୍ଷୁବ୍ଧ ରାମଙ୍କୁ ଦେଖି ଦୁଃଖିତା ସୀତା କହିଲେ — “ପ୍ରଭୁ! ଏବେ ଏ କ'ଣ? ଅଭିଷେକର ପ୍ରସ୍ତୁତି ଥିଲା, ତଥାପି ଆପଣଙ୍କ ମୁଖ-ବର୍ଣ୍ଣ ଅଲଗା, ହର୍ଷ ଦେଖାଯାଉନାହିଁ କାହିଁକି?”

(୬–୧୧): ବିଳାପ କରୁଥିବା ସୀତାଙ୍କୁ ରାମ କହିଲେ — “ସୀତା! ପୂଜ୍ୟ ପିତା ମୋତେ ବନକୁ ପଠାଉଛନ୍ତି। ହେ ଉଚ୍ଚ କୁଳଜାତା, ଧର୍ମଜ୍ଞା, ଧର୍ମଚାରିଣୀ ଜାନକୀ! ଶୁଣ କିପରି ଏ ହେଲା। ସତ୍ୟପ୍ରତିଜ୍ଞ ପିତା ଦଶରଥ ପୂର୍ବରୁ ମାତା କୈକେୟୀଙ୍କୁ ଦୁଇ ବର ଦେଇଥିଲେ। ଆଜି ମୋ ଅଭିଷେକ ପ୍ରସ୍ତୁତ ହେବା ବେଳେ ସେ ସେହି ବର ମାଗିଲେ — ମୋତେ ୧୪ ବର୍ଷ ଦଣ୍ଡକ ବନରେ ରହିବାକୁ ହେବ, ଆଉ ଭରତ ଯୁବରାଜ ହେବେ। ଭରତର କଦାପି ଅପ୍ରିୟ କରିବ ନାହିଁ, କାରଣ ସେ ହିଁ ଦେଶ ଓ କୁଳର ରାଜା।”

(୧୨–୧୯): ରାମ କହିଲେ — “ପ୍ରିୟେ! ମୁଁ ମହାବନକୁ ଯିବି, ତୁମେ ଏଠାରେ ହିଁ ରୁହ; କାହାରି ଅପ୍ରିୟ କରିବ ନାହିଁ — ଏ ମୋ ବଚନ।” ପ୍ରିୟବାଦିନୀ ବୈଦେହୀ ସ୍ନେହ ହେତୁ କିଛି ରୁଷ୍ଟ ହୋଇ କହିଲେ — “ରାମ! ଏ ତୁଚ୍ଛ କଥା କାହିଁକି କହୁଛ? ଏହା ଶୁଣି ମୋତେ ହସ ଆସୁଛି। ଆର୍ଯ୍ୟପୁତ୍ର! ପିତା-ମାତା-ଭାଇ-ପୁତ୍ର-ବୋହୂ ସମସ୍ତେ ନିଜ ନିଜ ପୁଣ୍ୟ ଓ ଭାଗ୍ୟ ଭୋଗନ୍ତି, କିନ୍ତୁ ନାରୀ କେବଳ ସ୍ୱାମୀର ଭାଗ୍ୟ ପାଏ — ତେଣୁ ମୋତେ ବି ବନରେ ରହିବାକୁ ଆଦେଶ। ପ୍ରାସାଦ-ଛାତ, ରଥ ବା ଆକାଶ-ଗମନଠାରୁ ବି, ସବୁ ଅବସ୍ଥାରେ ସ୍ୱାମୀଙ୍କ ଚରଣ-ଛାୟା ଶ୍ରେଷ୍ଠ। ତିନି ଲୋକର ଚିନ୍ତା ନକରି, କେବଳ ପତିବ୍ରତ ଧର୍ମ ଭାବି, ପିତାଙ୍କ ଘର ପରି ବନରେ ବି ସୁଖରେ ରହିବି।”

(୨୦–୨୫): ଧର୍ମପ୍ରିୟ ରାମ, ବନର ଦୁଃଖ ଭାବି, ଧର୍ମଜ୍ଞା ସୀତାଙ୍କୁ ନେବାକୁ ମନ କଲେ ନାହିଁ। କହିଲେ — “ସୀତା! ଯେମିତି କହେ ସେମିତି କର। ବନରେ ବହୁ ଦୋଷ — ରାତିରେ ଶ୍ରମ-କ୍ଲାନ୍ତ ହୋଇ ଭୂମିରେ ଭଙ୍ଗା ପତ୍ର-ଶଯ୍ୟାରେ ଶୋଇବାକୁ ହୁଏ; ପ୍ରାଣ ଅନୁସାରେ ଉପବାସ, ଜଟାଭାର ଓ ବଲ୍କଳ-ବସ୍ତ୍ର ଧାରଣ କରିବାକୁ ହୁଏ; ତୀବ୍ର ପବନ, ଅନ୍ଧକାର, ଭୋକ ଓ ବଡ଼ ବଡ଼ ଭୟ ଥାଏ। ତେଣୁ ବନ ଯାଅ ନାହିଁ, ବନ ତୁମ ପାଇଁ କଲ୍ୟାଣକର ନୁହେଁ — ବିଚାର କରି ଦେଖୁଛି, ବନ ବହୁ-ଦୋଷ-ଯୁକ୍ତ।”

(୨୬–୩୨): ରାମଙ୍କ ଏହି ବଚନ ଶୁଣି ଦୁଃଖିତା ସୀତା, ଲୋତକ-ଭରା ମୁଖରେ ଧୀରେ କହିଲେ — “ବନରେ ରହିବାର ଯେଉଁ ଦୋଷ ତୁମେ କହିଲ, ସେଗୁଡ଼ିକୁ ମୁଁ ତୁମ ସ୍ନେହ ହେତୁ ଗୁଣ ବୋଲି ମାନେ। ଗୁରୁଜନଙ୍କ ଆଜ୍ଞାରେ ମୋତେ ତୁମ ସହ ଯିବା ଉଚିତ; ରାମ! ତୁମ ବିଚ୍ଛେଦରେ ମୁଁ ଜୀବନ ତ୍ୟାଗ କରିବି। ହେ କାକୁତ୍ସ୍ଥ! ଭକ୍ତ, ପତିବ୍ରତା, ସୁଖ-ଦୁଃଖରେ ସମାନ ମୁଁ ଦୀନାକୁ ନେଇଚାଲ। ଯଦି ଦୁଃଖିତା ମୋତେ ବନ ନେବାକୁ ନ ଚାହଁ, ତେବେ ମୁଁ ମୃତ୍ୟୁ ପାଇଁ ବିଷ/ଅଗ୍ନି/ଜଳ ଗ୍ରହଣ କରିବି।” ତେବେ ରାମ ଅଚେତ ପରି ଦୁଃଖିତା ସୀତାଙ୍କୁ ବାହୁରେ ଆଲିଙ୍ଗନ କରି, ଭରସା ଦେଇ କହିଲେ — “ହେ ଶୁଭଶ୍ରୋଣି! ଏବେ ବନବାସ ଯୋଗ୍ୟ ପ୍ରସ୍ତୁତି ଆରମ୍ଭ କର। ହେ ସୀତା! ତୁମ ବିନା ମୋତେ ସ୍ୱର୍ଗ ବି ଭଲ ଲାଗେ ନାହିଁ।”

ଅନ୍ୱୟ (संस्कृत — ଗଦ୍ୟକ୍ରମ)

୧. अथ रामः ह्रिया किञ्चिद् अवाङ्मुखः (सन्) तु प्रहृष्टजनसम्पूर्णं सुविभूषितं स्ववेश्म प्रविवेश।

୨. अथ सीता वेपमाना (सती) समुत्पत्य शोकसन्तप्तं चिन्ताव्याकुलितेन्द्रियं तं पतिम् अपश्यत्।

୩. स धर्मात्मा राघवः हि तां दृष्ट्वा मनोगतं तं शोकं सोढुं न शशाक। ततः विवृततां गतः।

୪. विवर्णवदनं प्रस्विन्नम् अमर्षणं तं दृष्ट्वा दुःखाभिसन्तप्ता सीता आह – प्रभो! इदानीम् इदं किम्?

୫. यदा अभिषेकः सज्जः, इदानीं तव इदं किम्? मुखवर्णः च अपूर्वः, प्रहर्षः च न लक्ष्यते।

୬. इतीव विलपन्तीं तां रघुनन्दनः प्रोवाच – सीते! तत्रभवान् तातः मां वनं प्रव्राजयति।

୭. हे महति कुले संभूते! धर्मज्ञे! धर्मचारिणि! जानकि! अद्य येन क्रमेण मम इदम् आगतं (तत्) शृणु।

୮. पुरा सत्यप्रतिज्ञेन पित्रा राज्ञा दशरथेन तु मम मात्रे कैकेय्यै महावरौ दत्तौ।

୯. अद्य नृपोद्यते मम अस्मिन् अभिषेके सज्जे तया (कैकेय्या) धर्मेण प्रतिनिर्जितः सः समयः प्रचोदितः।

୧୦. मया हि दण्डके चतुर्दश वर्षाणि वस्तव्यम्। भरतः अपि मे पित्रा यौवराज्ये नियोजितः च।

୧୧. वैदेहि! कदाचन भरतस्य विप्रियं न कर्त्तव्यम्। सः हि देशस्य कुलस्य च राजा।

୧୨. प्रिये! अहं महावनं गमिष्यामि। भामिनि! त्वया हि इह एव वस्तव्यम्। यथा कस्यचित् व्यलीकं न कुरुषे, तथा त्वया कार्यम्, इदं मम वचः।

୧୩. एवम् उक्ता प्रियार्हा प्रियवादिनी वैदेही प्रणयात् एव संक्रुद्धा (सती) भर्त्तारम् इदम् अब्रवीत्।

୧୪. हे राम! लघुतया इदं किं भाषसे? हे नरवरोत्तम! त्वया यत् (उक्तं) श्रुत्वा मे ध्रुवम् अपहास्यं (जायते)।

୧୫. आर्यपुत्र! पिता, माता, भ्राता, पुत्रः तथा स्नुषा स्वानि पुण्यानि भुञ्जानाः स्वं स्वं भाग्यम् उपासते।

୧୬. हे पुरुषर्षभ! नारी एका तु भर्त्तुः भाग्यं प्राप्नोति। अतः "वने वस्तव्यम्" इति अपि अहम् आदिष्टा च।

୧୭. प्रासादाग्रे विमानैः वा वैहायसगतेन वा सर्वावस्थागता भर्त्तुः पादच्छाया विशिष्यते।

୧୮. अहं पुरुषवर्जितं नानामृगगणाकीर्णं शार्दूलगणसेवितं दुर्गं वनं गमिष्यामि।

୧୯. त्रीन् लोकान् अचिन्तयन्ती, पतिव्रतं चिन्तयन्ती (अहं सीता) यथा एव पितुः भवने (तथा एव) वने सुखं निवत्स्यामि।

୨୦. धर्मवत्सलः सः वने दुःखानि चिन्तयन् एवं ब्रुवतीं धर्मज्ञां सीतां (वनं) नेतुं बुद्धिं न कुरुते।

୨୧. हे सीते! त्वां यथा वक्ष्यामि त्वया तथा कार्यम्। हे अबले! वने वसतः मे बहवः दोषाः (सन्ति)। तान् निबोध।

୨୨. श्रमखिन्नेन रात्रिषु भूतले स्वयंभग्नासु पर्णशय्यासु सुप्यते। अतः तस्मात् वनं दुःखम्।

୨୩. हे मैथिलि! यथाप्राणेन उपवासः कर्त्तव्यः, जटाभारः च कर्त्तव्यः, वल्कलाम्बरधारणं च (कर्त्तव्यम्)।

୨୪. अत्र (वनवासे) नित्यशः अतीव वातः, तिमिरं, वुभुक्षा, महान्ति भयानि च (सन्ति)। ततः वनं दुःखतरम्।

୨୫. तत् ते वनं गत्वा अलम्। वनं गत्वा तव क्षेमं न हि (भवेत्)। विमृशन् इव पश्यामि, वनं बहुदोषकरं (भवति)।

୨୬. रामस्य तु एतत् वचनं श्रुत्वा सीता दुःखिता, प्रसक्ता अश्रुमुखी (सती) मन्दम् इदं वचनम् अब्रवीत्।

୨୭. वने वस्तव्यतां प्रति ये दोषाः त्वया कीर्त्तिताः, तान् गुणान् इति एव विद्धि। (यतः अहं सीता) तव स्नेहपुरस्कृता।

୨୮. गुरुजनाज्ञया मया च त्वया सह गन्तव्यम्। राम! त्वद्वियोगेन इह मे जीवितं त्यक्तव्यम्।

୨୯. (हे) काकुत्स्थ! भक्तां पतिव्रतां सुखदुःखयोः समां समानसुखदुःखिनीं मां दीनां (वनं) नेतुं त्वम् अर्हसि।

୩୦. यदि एवं दुःखितां मां च वनं नेतुं न इच्छसि (तर्हि) मृत्युकारणात् अहं विषम् अग्निं जलं वा आस्थास्ये।

୩୧. तदा रामः विसंज्ञाम् इव दुःखितां तां बाहुभ्यां परिष्वज्य तदा परिविश्वासयन् वचनम् उवाच।

୩୨. हे शुभश्रोणि! इदानीं वनवासक्षमाः क्रियाः आरभस्व। हे सीते! त्वत् ऋते स्वर्गः अपि मम न रोचते।

ଶବ୍ଦାର୍ଥ (ଟିପ୍ପଣୀ)

ସଂସ୍କୃତ ଶବ୍ଦଓଡ଼ିଆ ଅର୍ଥ
ह्रियाଲଜ୍ଜାରେ
अवाङ्मुखःଅଧୋମୁଖ, ତଳମୁହାଁ
समुत्पत्यଉଠି
वेपमानाଥରିଥରି (କମ୍ପମାନା)
शोकसंतप्तम्ଶୋକରେ ସନ୍ତପ୍ତ
चिन्ताव्याकुलितेन्द्रियम्ଚିନ୍ତାରେ ଇନ୍ଦ୍ରିୟ ବିକଳିତ
शशाकସମର୍ଥ ହେଲା
सोढुम्ସହିବାକୁ
प्रस्विन्नम्ସ୍ୱେଦଯୁକ୍ତ (ଝାଳ)
अमर्षणम्ଅସହନଶୀଳ, କ୍ଷୁବ୍ଧ
विलपन्तीम्କାନ୍ଦୁଥିବା
रघुनन्दनःରାମ
प्रव्राजयतिବନକୁ ପଠାଉଛନ୍ତି
जानकिଜନକପୁତ୍ରୀ (ସୀତା)
सत्यप्रतिज्ञेनସତ୍ୟନିଷ୍ଠ (ରାଜା)ଙ୍କ ଦ୍ୱାରା
यौवराज्येଯୁବରାଜ ପଦରେ
दण्डकेଦଣ୍ଡକାରଣ୍ୟରେ
विप्रियम् / व्यलीकम्ଅପ୍ରିୟ
वैदेहिବିଦେହ (ରାଜ୍ୟ) ନନ୍ଦିନୀ (ସୀତା)
प्रणयादेवସ୍ନେହ ହେତୁ
ध्रुवम्ନିଶ୍ଚିତ
अपहास्यम्ଉପହାସଯୋଗ୍ୟ
स्नुषाବୋହୂ
पुरुषर्षभପୁରୁଷଶ୍ରେଷ୍ଠ
विमानैः / वैहायसगतेनରଥରେ / ଆକାଶ ମାର୍ଗରେ ଗମନ ଦ୍ୱାରା
पुरुषवर्जितम्ମନୁଷ୍ୟଶୂନ୍ୟ
शार्दूलगणसेवितम्ହିଂସ୍ର (ସିଂହ/ବାଘ) ଜନ୍ତୁ ରହିଥିବା
निबोधବୁଝିନିଅ
मैथिलिମିଥିଲା ରାଜକୁମାରୀ (ସୀତା)
वुभुक्षाଭୋଜନ ଇଚ୍ଛା (ଭୋକ)
नित्यशःସର୍ବଦା
क्षेमम्କଲ୍ୟାଣକର
प्रसक्ताश्रुमुखीଲୋତକାପୂର୍ଣ୍ଣ ବଦନା
त्वद्वियोगेनତୁମ ବିଚ୍ଛେଦରେ
काकुत्स्थକକୁତ୍ସ୍ଥ ବଂଶଜ (ରାମ)
परिष्वज्यଆଲିଙ୍ଗନ କରି
विसंज्ञामिवଚେତନା ହରାଇଲା ପରି
आरभस्वଆରମ୍ଭ କର
नेदानीम्ବର୍ତ୍ତମାନ ନୁହେଁ
त्वदृतेତୁମ ବିନା

💡 ଉତ୍ସ: ଆଦିକବି ବାଲ୍ମୀକିଙ୍କ ‘ରାମାୟଣ’ — ଅଯୋଧ୍ୟାକାଣ୍ଡ। ବିଷୟ — ରାମଙ୍କ ବନବାସ ଓ ସୀତାଙ୍କ ପତିବ୍ରତ ଧର୍ମ।

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