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देहि पदपल्लवमुदारम्

Dehi Padapallavam Udaram · ଦେହି ପଦପଲ୍ଲବମୁଦାରମ୍ (ଏକାଙ୍କିକା)

ସଂସ୍କୃତ (संस्कृतसाहित्यमञ्जरी) · ଓଡ଼ିଶା ବୋର୍ଡ ଦଶମ ଶ୍ରେଣୀ · ଏକାଙ୍କିକାଭାଗ ଦ୍ୱିତୀୟ ପାଠ · ଟିପ୍ପଣୀ + ଅଭ୍ୟାସ + ୨୫ Quiz

📖 ପାଠ ପରିଚୟ: କବିମାନଙ୍କ ମୁକୁଟର ହୀରା ସଦୃଶ ଭକ୍ତକବି ଜୟଦେବ ଉତ୍କଳ (ଓଡ଼ିଶା)ର ପ୍ରାଚୀ ନଦୀ ତୀରେ କେନ୍ଦୁବିଲ୍ୱ ଗ୍ରାମରେ ଜନ୍ମଗ୍ରହଣ କରିଥିଲେ। ଦ୍ୱାଦଶ ଶତାବ୍ଦୀରେ ସେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଭକ୍ତିରସ-ପୂର୍ଣ୍ଣ ‘ଗୀତଗୋବିନ୍ଦ’ କାବ୍ୟ ରଚନା କଲେ — ଯାହା ଶ୍ରୀରାଧା-ମାଧବଙ୍କ ଦିବ୍ୟଲୀଳା ଉପରେ, ଦ୍ୱାଦଶ ସର୍ଗରେ, ଅଷ୍ଟପଦୀ ପ୍ରବନ୍ଧଗୀତ ଓ ରାଗ-ତାଳ ନିର୍ଦେଶ ସହିତ। ଏହି ‘ଦେହି ପଦପଲ୍ଲବମୁଦାରମ୍’ ଏକାଙ୍କିକା ସେହି ଗୀତଗୋବିନ୍ଦକୁ ଆଧାର କରି ରଚିତ — ଯେଉଁଠି ଜୟଦେବ ଶ୍ରୀରାଧାଙ୍କ ‘ମାନଭଞ୍ଜନ’ ପଦ ଲେଖିବାକୁ ଦ୍ୱିଧାଗ୍ରସ୍ତ ଥିବା ବେଳେ ସ୍ୱୟଂ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଜୟଦେବଙ୍କ ବେଶ ଧରି ଆସି ପଦ ଲେଖି ଦିଅନ୍ତି।

ମୂଳ ପାଠ (मूलपाठः — ଏକାଙ୍କିକା)

(ପ୍ରଥମଦୃଶ୍ୟମ୍ — ଜୟଦେବଙ୍କ କୁଟୀର; ଜୟଦେବ ଗୀତଗୋବିନ୍ଦ ଲେଖୁଛନ୍ତି, ଦ୍ୱାରଦେଶରେ ବନ୍ଧୁ ପରାଶର ଡାକୁଛନ୍ତି)

पराशरः —बन्धो! जयदेव! जयदेव!
जयदेवः —(उत्थाय) अरे मित्र! पराशर! स्वागतं स्वागतम्, अभिवादये, सर्वं कुशलम्?
पराशरः —(जयदेवमालिङ्ग्य) जय जगन्नाथ! अहो भाग्यम् अहो भाग्यम्, तव दर्शनेन प्रमुदितोऽस्मि।
जयदेवः —(सस्मितम्) एहि मित्र, आगच्छ, अत्रासने उपविश। (उभौ उपविशतः)
पराशरः —गीतगोविन्दस्य रचना प्रचलति वा?
जयदेवः —एवम्।
पराशरः —मित्र! धन्यस्त्वम्, नीलाचलमौलिमण्डनस्य श्रीजगन्नाथस्य भक्तिरसनिष्णातः त्वत्सदृशः अपरः नास्ति। धन्यः तव पिता भोजदेवः, धन्या जननी रामादेवी।
जयदेवः —एवं मा कथय, प्रभुभक्तिं न जाने, केवलं जगज्जनन्याः श्रीराधायाः, परमपितुः श्रीजगन्नाथस्य लीलावर्णनार्थं लेखनीं चालयामि।
पराशरः —सुहृद्वर! श्रीराधा-कृष्णयोः दिव्यलीला या श्रीगीतगोविन्दे वर्णिता, तस्याः कुत्रापि तुलना अस्ति वा? आः कीदृशं कान्तकोमलं ललितं ललितं मधुरं मधुरं पदसंयोजनम्! अभिनवं रसालं प्रबन्धसङ्गीतम्! हृदयं निरन्तरं गातुम् अभिलषति। स्मरामि वसन्तरागेण तत् वसन्तवर्णनम् — (गायति)
ललितलवङ्गलतापरिशीलनकोमलमलयसमीरे।
मधुकरनिकरकरम्बितकोकिलकूजितकुञ्जकुटीरे॥
विहरति हरिरिह सरसवसन्ते
नृत्यति युवतिजनेन समं सखि! विरहिजनस्य दुरन्ते॥
जयदेवः —पद्मावति! पद्मावति! अत्रागच्छ, पश्य, मम पुरतः को विद्यते।
पद्मावती —(प्रविश्य) मित्र पराशर! भवान्? नमस्करोमि। (नमस्करोति)
पराशरः —जय जगन्नाथ! नमो नमः, बन्धुपत्नि! यत्र जयदेवः, तत्र पराशरः।
जयदेवः —प्रिये! मित्रस्य कृते श्रीजगन्नाथमहाप्रभोः स्वल्पमपि प्रसादमानय।
पद्मावती —आम् आर्य। (प्रस्थिता)
पराशरः —मित्र! गीतगोविन्दस्य अमृतास्वादनेन हृदयं नितरां तृप्यति। अस्य प्रबन्धसङ्गीतं कर्णेषु मधुधारां वर्षति। कृपया चन्दनचर्चितपद्यं गायतु। अहमपि गायामि।
(उभौ गायतः) चन्दनचर्चितनीलकलेवरपीतवसनवनमाली।
केलिचलन्मणिकुण्डलमण्डितगण्डयुगस्मितशाली।
हरिरिह मुग्धवधूनिकरे, विलसति विलासिनि! केलिपरे॥
पद्मावती —(प्रसादमानीय जलपात्रेण समं समर्पयति) नयतु मित्र!
पराशरः —(स्वीकरोति) बन्धो! त्वमपि नय। (ददाति, उभौ खादतः)
पद्मावती —मित्र! जयदेवः कविश्रेष्ठः पराशरश्च गायकोत्तमः।
पराशरः —(हसित्वा) पद्मावती च नृत्यनिपुणा। (सर्वे हसन्ति) (उत्थाय) साधयामः सम्प्रति। जय जगन्नाथ!
जयदेवः —(उत्थाय) आगच्छ मित्र! पुनर्दर्शनाय, प्रणमामि। (पराशरः गच्छति)

(ଦ୍ୱିତୀୟଦୃଶ୍ୟମ୍ — ଚିନ୍ତିତ ଜୟଦେବ ଆସନରେ ବସିଛନ୍ତି)

पद्मावती —(प्रविश्य - तमालोक्य - स्वगतम्) कथं कान्तः चिन्तायुक्तः आलोक्यते? (प्रकाशम्) आर्य! कथमद्य मुखचन्द्रः म्लानः, चिन्तान्वितं च नयनयुगलम्? किमस्य कारणम्?
जयदेवः —सत्यं लक्षितं भवत्या। विषमस्थितौ पतितोऽस्मि, गीतगोविन्दस्य सांप्रतिकप्रसङ्गं विचारयतु भवती। किशोरी श्रीराधा कुञ्जवने नागरराजं प्रतीक्षते। निर्दयः श्यामः नायाति। अपरा काऽपि सखी वनमालिना रमिता; इति ज्ञात्वा खिन्ना विरहविधुरा किशोरी दृढम् अभिमानवती। तस्याः मानभञ्जनं कथं भवेत्?
पद्मावती —हे कविवर! भवान् सर्वम् उपायं जानाति। रसिकशेखरः मुरलीधरः तस्याः मानभञ्जनार्थं प्रयत्नं करोतु।
जयदेवः —अयि सखि! तेन बहुयत्नः कृतः। रासरसिकस्य विनयवचनं शृणु — (गायति)
वदसि यदि किञ्चिदपि दन्तरुचिकौमुदी हरति दरतिमिरमतिघोरम्।
स्फुरदधरसीधवे तव वदनचन्द्रमा रोचयतु लोचनचकोरम्॥
प्रिये! चारुशीले! मुञ्च मयि मानमनिदानम्, देहि मुखकमलमधुपानम्॥
पद्मावती —अतिरतिरुचिरः अनुनयप्रकारः। परन्तु इदं न यथेष्टम्।
जयदेवः —प्रिये! अपरं यदस्ति तस्य रचना एव मम चिन्ताकारणम्, मानभञ्जनार्थं श्रीमन्नारायणं किशोरीचरणतले कथं पातयिष्यामि?
पद्मावती —(स्मितहास्यपूर्वकम्) श्रीजगन्नाथं शरणं याहि। स एवास्य समाधानं विधास्यति।
जयदेवः —(उत्थाय) प्रिये! तैलमानय, स्नानाय सागरं यामि, ततः चिन्तयिष्यामि। (तालपत्रं लेखनीं च गृहस्य चाले स्थापयति) हे नटनागर! हे कृष्ण मार्गं दर्शय प्रभो! (निष्क्रान्तः)
पद्मावती —(प्रार्थयति) हे रासरसिक! श्रीराधावल्लभ! त्वमेव शरणम्। (प्रणमति)

(ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଜୟଦେବଙ୍କ ବେଶ ଧରି ପ୍ରବେଶ କରନ୍ତି)

श्रीकृष्णः —(जयदेववेशं धारयित्वा प्रविशति) पद्मावति! पद्मावति!
पद्मावती —(उत्थाय) आश्चर्यम्! स्नानं विना भवान् प्रत्यागतः?
श्रीकृष्णः —अयि! समाधानं संजातम्। श्रीराधायाः मानभञ्जनार्थम् उपयुक्तं पद्यं मया कल्पितम्। तदेव प्रथमं लिखित्वा स्नातुं यास्यामि। (चालात् तालपत्रं, लेखनीं च आनीय, पदानि लिखित्वा तत्र स्थापयति। पद्मायां गृहाभ्यन्तरं गतायां स्वीयं मुरली-मयूरचन्द्रिकायुतं रूपं प्रदर्श्य, स्मितं कृत्वा बहिर्गच्छति)
जयदेवः —(स्नातः प्रविशति) प्रिये पद्मावति!
पद्मावती —(प्रविश्य) आश्चर्यम्! इदानीम् एव गतवान्। सागरे स्नानं समाप्य प्रत्यागतो वा?
जयदेवः —किं कथयसि? अहं तु बहुसमयात् प्राक् गतवान् आसम्, न इदानीमेव।
पद्मावती —नहि नहि स्वामिन्! बहुसमयात् प्राक् गत इति सत्यम्, परन्तु पुनरागत्य कल्पितं मानभञ्जनपद्यं पत्रे लिखित्वा इदानीमेव गतः।
जयदेवः —सखि! विश्वसिहि, नाहम् आगतवान्, न वा किमपि पद्यं लिखितवान्।
पद्मावती —(विहस्य) भवद्वेशं धारयन् कोऽपि आगतः किम्?
जयदेवः —प्रिये! पत्रं मे दर्शय। (पद्मा तालपत्रमानीय दर्शयति, जयदेवः पठति)
‘‘हरगरलखण्डनं मम शिरसि मण्डनम्, देहि पदपल्लवमुदारम्’’।
जयदेवः —(भक्तिगद्गदस्वरेण) अद्भुतं घटितम्। लीलापुरुषोत्तमः श्रीकृष्णः मम वेशेन प्रविश्य मानभञ्जनस्य सफलं पद्यं रचयित्वा गतः। एतदेव मम चिन्ताकारणम् आसीत्। कथं वा श्रीजगन्नाथः श्रीराधायाः चरणग्रहणं कृत्वा मानभञ्जनं करिष्यति? कदाचित् अस्य वर्णनेन मर्यादालङ्घनं स्यात् इति। परन्तु स्वयं प्रभुः मम संशयनिरसनं कृतवान्, अहो-भाग्यम्!
पद्मावती —स्वामिन्! परमकारुणिकोऽसौ भक्तस्य भावं जानाति, असाध्यसाधनं करोति।
जयदेवः —पद्मावति! त्वमेव धन्या। प्रभोः साक्षाद्दर्शनं प्राप्तवती। अयि सौभाग्यवति! एहि, भक्तमानरक्षकस्य श्रीकृष्णस्य चरणतले प्रणत्यर्घ्यं निवेदयिष्यामः। (उभौ प्रणमतः)
(नेपथ्यगानम्) इति चटुलचाटुपटुचारु मुरवैरिणो राधिकामधिवचनजातम्।
जयति पद्मावतीरमणजयदेवकविभारतीभणितमिति गीतम्॥

– ସମାପ୍ତମ୍ –

ଓଡ଼ିଆ ଅନୁବାଦ (କଥାସାର)

ପ୍ରଥମ ଦୃଶ୍ୟ: ଜୟଦେବ ନିଜ କୁଟୀରରେ ଗୀତଗୋବିନ୍ଦର ପଦ ଲେଖୁଥା'ନ୍ତି। ବନ୍ଧୁ ପରାଶର ଦ୍ୱାରରେ ‘ବନ୍ଧୁ! ଜୟଦେବ!’ ବୋଲି ଡାକନ୍ତି। ଜୟଦେବ ଉଠି ସ୍ୱାଗତ କରି ବସାନ୍ତି। ପରାଶର ଆଲିଙ୍ଗନ କରି କହନ୍ତି — “ଜୟ ଜଗନ୍ନାଥ! ତୁମ ଦର୍ଶନରେ ମୁଁ ଆନନ୍ଦିତ। ନୀଳାଚଳ-ମୌଳିମଣ୍ଡନ ଶ୍ରୀଜଗନ୍ନାଥଙ୍କ ଭକ୍ତିରସରେ ତୁମ ସଦୃଶ ଆଉ କେହି ନାହିଁ। ଧନ୍ୟ ତୁମ ପିତା ଭୋଜଦେବ, ଧନ୍ୟା ମାତା ରାମାଦେବୀ।” ଜୟଦେବ ବିନୟରେ କହନ୍ତି — “ଏମିତି କୁହ ନାହିଁ; ମୁଁ ଭକ୍ତି ଜାଣେ ନାହିଁ, କେବଳ ଜଗଜ୍ଜନନୀ ଶ୍ରୀରାଧା ଓ ପରମପିତା ଶ୍ରୀଜଗନ୍ନାଥଙ୍କ ଲୀଳା ବର୍ଣ୍ଣନା ପାଇଁ ଲେଖନୀ ଚଳାଉଛି।”

ପରାଶର ଗୀତଗୋବିନ୍ଦର ମାଧୁର୍ଯ୍ୟ ପ୍ରଶଂସା କରି ବସନ୍ତ-ବର୍ଣ୍ଣନାର ପ୍ରସିଦ୍ଧ ଅଷ୍ଟପଦୀ “ଲଲିତଲବଙ୍ଗଲତା...” ଗାଆନ୍ତି। ଜୟଦେବ ପତ୍ନୀ ପଦ୍ମାବତୀଙ୍କୁ ଡାକନ୍ତି। ପଦ୍ମାବତୀ ଆସି ପରାଶରଙ୍କୁ ପ୍ରଣାମ କରନ୍ତି। ଜୟଦେବ ପତ୍ନୀଙ୍କୁ ବନ୍ଧୁ ପାଇଁ ଶ୍ରୀଜଗନ୍ନାଥଙ୍କ ପ୍ରସାଦ ଆଣିବାକୁ କହନ୍ତି। ପରାଶର ଓ ଜୟଦେବ ମିଳିତ ଭାବେ “ଚନ୍ଦନଚର୍ଚ୍ଚିତ...” ଗାଆନ୍ତି। ପଦ୍ମାବତୀ ପ୍ରସାଦ (ଜଳପାତ୍ର ସହ) ଅର୍ପଣ କରନ୍ତି, ଦୁହେଁ ଗ୍ରହଣ କରନ୍ତି। ପଦ୍ମାବତୀ କହନ୍ତି — “ଜୟଦେବ କବିଶ୍ରେଷ୍ଠ, ପରାଶର ଗାୟକୋତ୍ତମ।” ପରାଶର ହସି କହନ୍ତି — “ଆଉ ପଦ୍ମାବତୀ ନୃତ୍ୟନିପୁଣା।” ସମସ୍ତେ ହସନ୍ତି, ଓ ପରାଶର ବିଦାୟ ନିଅନ୍ତି।

ଦ୍ୱିତୀୟ ଦୃଶ୍ୟ: ଜୟଦେବ ଚିନ୍ତିତ ହୋଇ ବସିଛନ୍ତି। ପଦ୍ମାବତୀ ଦେଖି ପଚାରନ୍ତି — “ଆର୍ଯ୍ୟ! ଆଜି ଆପଣଙ୍କ ମୁଖ-ଚନ୍ଦ୍ର ମଳିନ, ଆଖି ଚିନ୍ତାଗ୍ରସ୍ତ କାହିଁକି?” ଜୟଦେବ କହନ୍ତି — “ତୁମେ ଠିକ୍ ଲକ୍ଷ୍ୟ କଲ। ଗୀତଗୋବିନ୍ଦର ଏକ ପ୍ରସଙ୍ଗରେ ବିପଦରେ ପଡ଼ିଛି। କିଶୋରୀ ଶ୍ରୀରାଧା କୁଞ୍ଜବନରେ ନାଗରରାଜ (କୃଷ୍ଣ)ଙ୍କୁ ଅପେକ୍ଷା କରୁଛନ୍ତି, କିନ୍ତୁ ନିର୍ଦୟ ଶ୍ୟାମ ଆସୁ ନାହାଁନ୍ତି। ଅନ୍ୟ ଏକ ସଖୀ ସହ ବନମାଳୀ ରମଣ କଲେ — ଏହା ଜାଣି ବିରହ-ବ୍ୟାକୁଳ କିଶୋରୀ ଅଭିମାନିନୀ ହୋଇଯାଇଛନ୍ତି। ତାଙ୍କ ‘ମାନଭଞ୍ଜନ’ (ଅଭିମାନ ଭଙ୍ଗ) କିପରି ହେବ?”

ପଦ୍ମାବତୀ କହନ୍ତି — “ହେ କବିବର! ଆପଣ ସବୁ ଉପାୟ ଜାଣନ୍ତି।” ଜୟଦେବ ଉତ୍ତରରେ ‘ବଦସି ଯଦି କିଞ୍ଚିଦପି...’ ଓ ‘ପ୍ରିୟେ ଚାରୁଶୀଲେ! ମୁଞ୍ଚ ମୟି ମାନମ୍...’ ଗାଆନ୍ତି। ତା'ପରେ କହନ୍ତି — “ମୋ ଅସଲ ଚିନ୍ତା ଏହି — ମାନଭଞ୍ଜନ ପାଇଁ ଶ୍ରୀନାରାୟଣଙ୍କୁ କିଶୋରୀଙ୍କ ଚରଣରେ କିପରି ପକାଇବି? (ଅର୍ଥାତ୍ ଭଗବାନ ରାଧାଙ୍କ ପାଦ ଧରିବେ — ଏ କଥା ଲେଖିବା ମର୍ଯ୍ୟାଦା-ଲଙ୍ଘନ ହୋଇପାରେ)।” ପଦ୍ମାବତୀ କହନ୍ତି — “ଶ୍ରୀଜଗନ୍ନାଥଙ୍କ ଶରଣ ନିଅନ୍ତୁ, ସେ ହିଁ ସମାଧାନ ଦେବେ।” ଜୟଦେବ ତାଳପତ୍ର ଓ ଲେଖନୀ ଘରର ଚାଳରେ ରଖି, “ହେ କୃଷ୍ଣ! ମାର୍ଗ ଦେଖାଅ” କହି ସମୁଦ୍ର-ସ୍ନାନକୁ ବାହାରିଯାଆନ୍ତି।

ଅଦ୍ଭୁତ ଘଟଣା: ସେତେବେଳେ ସ୍ୱୟଂ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଜୟଦେବଙ୍କ ବେଶ ଧରି ଆସି ପଦ୍ମାବତୀଙ୍କୁ ଡାକନ୍ତି — “ସମାଧାନ ହୋଇଗଲା; ମାନଭଞ୍ଜନର ପଦ ମୁଁ ରଚନା କଲି, ପ୍ରଥମେ ଲେଖି ତା'ପରେ ସ୍ନାନକୁ ଯିବି।” ସେ ଚାଳରୁ ତାଳପତ୍ର ଆଣି ପଦ ଲେଖି ରଖନ୍ତି। ପଦ୍ମାବତୀ ଭିତରକୁ ଗଲେ, ‘କୃଷ୍ଣ’ ନିଜର ମୁରଲୀ-ମୟୂରଚନ୍ଦ୍ରିକାଯୁକ୍ତ ଅସଲ ରୂପ ଦେଖାଇ, ହସି ବାହାରିଯାଆନ୍ତି।

ଅସଲ ଜୟଦେବ ସ୍ନାନ ସାରି ଫେରନ୍ତି। ପଦ୍ମାବତୀ ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟ ହୋଇ କହନ୍ତି — “ଆପଣ ତ ଏବେ ଆସି ପଦ ଲେଖି ଗଲେ!” ଜୟଦେବ କହନ୍ତି — “ମୁଁ ବହୁ ଆଗରୁ ଗଲି, ଏବେ ଆସି କିଛି ଲେଖି ନାହିଁ।” ଜୟଦେବ ପତ୍ର ଦେଖି ପଢ଼ନ୍ତି — “ହରଗରଲଖଣ୍ଡନଂ ମମ ଶିରସି ମଣ୍ଡନମ୍, ଦେହି ପଦପଲ୍ଲବମୁଦାରମ୍।” ଭକ୍ତିରେ ଗଦ୍‌ଗଦ ହୋଇ ବୁଝନ୍ତି — ଲୀଳାପୁରୁଷୋତ୍ତମ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ସ୍ୱୟଂ ତାଙ୍କ ବେଶ ଧରି ଆସି, ଯେଉଁ ମାନଭଞ୍ଜନ-ପଦ ପାଇଁ ସେ ଚିନ୍ତିତ ଥିଲେ, ତାହା ଲେଖି ଯାଇଛନ୍ତି — ଭଗବାନ ନିଜେ ତାଙ୍କ ସନ୍ଦେହ ଦୂର କରିଛନ୍ତି! ପଦ୍ମାବତୀ କହନ୍ତି — “ପରମ କରୁଣାମୟ ପ୍ରଭୁ ଭକ୍ତର ଭାବ ଜାଣନ୍ତି, ଅସାଧ୍ୟ ସାଧନ କରନ୍ତି।” ଦୁହେଁ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ଚରଣରେ ପ୍ରଣାମ କରନ୍ତି। ନେପଥ୍ୟରେ ଗୀତଗୋବିନ୍ଦର ମଙ୍ଗଳଶ୍ଳୋକ ବାଜେ।

ଶବ୍ଦାର୍ଥ (ଟିପ୍ପଣୀ)

ସଂସ୍କୃତ ଶବ୍ଦଓଡ଼ିଆ ଅର୍ଥ
कविमुकुटहीरकःକବିମାନଙ୍କ ମୁକୁଟର ହୀରା (ଶ୍ରେଷ୍ଠ କବି)
केन्दुविल्वग्रामेକେନ୍ଦୁବିଲ୍ୱ ଗ୍ରାମରେ (ଜୟଦେବଙ୍କ ଜନ୍ମସ୍ଥାନ)
प्राचीतीरेପ୍ରାଚୀ ନଦୀ କୂଳରେ
निर्यासःସାର, ନିର୍ଯ୍ୟାସ
सुहृद्वरହେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବନ୍ଧୁ
तुलनाସମାନତା, ତୁଳନା
उपविशବସ
प्रसादम् आनयପ୍ରସାଦ ଆଣ
तृप्यतिତୃପ୍ତ ହୁଏ
मुखचन्द्रः म्लानःମୁଖ-ଚନ୍ଦ୍ର ମଳିନ
विषमस्थितौ पतितःକଠିନ ପରିସ୍ଥିତିରେ ପଡ଼ିଛି
नागरराजम्ନାଗରରାଜ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ)
विरहविधुराବିରହରେ ବ୍ୟାକୁଳ
अभिमानवतीଅଭିମାନିନୀ
मानभञ्जनम्ଅଭିମାନ ଭଙ୍ଗ କରିବା
अनुनयप्रकारःମନାଇବାର ଉପାୟ
तालपत्रम्ତାଳପତ୍ର (ଲେଖିବା ପାଇଁ)
गृहस्य चालेଘରର ଚାଳ/ଛାତରେ
जयदेववेशं धारयित्वाଜୟଦେବଙ୍କ ବେଶ ଧାରଣ କରି
समाधानं संजातम्ସମାଧାନ ହୋଇଗଲା
कल्पितम्ରଚନା କଲି / ଭାବିଲି
भक्तिगद्गदस्वरेणଭକ୍ତିରେ ଗଦ୍‌ଗଦ ସ୍ୱରରେ
लीलापुरुषोत्तमःଲୀଳାପୁରୁଷୋତ୍ତମ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ)
मर्यादालङ्घनम्ମର୍ଯ୍ୟାଦା ଉଲ୍ଲଙ୍ଘନ
संशयनिरसनम्ସନ୍ଦେହ ଦୂର କରିବା
परमकारुणिकःପରମ କରୁଣାମୟ
असाध्यसाधनम्ଅସମ୍ଭବକୁ ସମ୍ଭବ କରିବା
प्रणत्यर्घ्यम्ପ୍ରଣାମ-ଅର୍ଘ୍ୟ
नेपथ्यगानम्ନେପଥ୍ୟ (ପରଦା ପଛ) ଗାନ

💡 ଉତ୍ସ: ମହାକବି ଜୟଦେବଙ୍କ ‘ଗୀତଗୋବିନ୍ଦ’ ଆଧାରିତ ଏକାଙ୍କିକା। ବିଷୟ — ଭକ୍ତବତ୍ସଲ ଭଗବାନ ଓ ଜୟଦେବଙ୍କ ଭକ୍ତି।

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