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युधिष्ठिरयक्षसंवादः

Yudhishthira Yaksha Samvada · ଯୁଧିଷ୍ଠିରଯକ୍ଷସଂବାଦଃ (ପଦ୍ୟ)

ସଂସ୍କୃତ (संस्कृतसाहित्यमञ्जरी) · ଓଡ଼ିଶା ବୋର୍ଡ ଦଶମ ଶ୍ରେଣୀ · ପଦ୍ୟଭାଗ ଦ୍ୱିତୀୟ ପାଠ · ଟିପ୍ପଣୀ + ଅଭ୍ୟାସ + ୨୫ Quiz

📖 ପାଠ ପରିଚୟ: ଏହି ପଦ୍ୟ ‘ମହାଭାରତ’ର ବନପର୍ବରୁ ଗୃହୀତ। ଏକ ଯକ୍ଷ ମହାରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଜ୍ଞାନ-ବୁଦ୍ଧି ପରୀକ୍ଷା କରିବା ପାଇଁ କେତେକ ପ୍ରଶ୍ନ ପଚାରିଲେ, ଆଉ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ସେହି ପ୍ରଶ୍ନମାନଙ୍କର ସମୁଚିତ ଉତ୍ତର ଦେଲେ। ଏହି ପ୍ରଶ୍ନୋତ୍ତର-ମୂଳକ ସଂବାଦରେ ତପ, ଦମ, କ୍ଷମା, ଜ୍ଞାନ, ଦୟା, ସାଧୁ-ଅସାଧୁ, ପଣ୍ଡିତ-ମୂର୍ଖ ଆଦି ଜୀବନମୂଲ୍ୟର ସୁନ୍ଦର ବ୍ୟାଖ୍ୟା ଅଛି।

ମୂଳ ପାଠ (मूलपाठः — ୧୭ ଶ୍ଳୋକ, ପ୍ରଶ୍ନୋତ୍ତର)

यक्ष उवाच
॥୧॥ किंस्वित् प्रवसतो मित्रं? किं स्विन्मित्रं गृहे सतः?
आतुरस्य च किं मित्रं? किं स्विन्मित्रं मरिष्यतः?॥
युधिष्ठिर उवाच
॥୨॥ विद्या प्रवसतो मित्रं भार्या मित्रं गृहे सतः।
आतुरस्य भिषङ् मित्रं दानं मित्रं मरिष्यतः॥
यक्ष उवाच
॥୩॥ मृतः कथं स्यात् पुरुषः? कथं राष्ट्रं मृतं भवेत्?
श्राद्धं मृतं कथं वा स्यात्? कथं यज्ञो मृतो भवेत्?॥
युधिष्ठिर उवाच
॥୪॥ मृतो दरिद्रः पुरुषो मृतं राष्ट्रमराजकम्।
मृतमश्रोत्रियं श्राद्धं मृतो यज्ञस्त्वदक्षिणः॥
यक्ष उवाच
॥୫॥ तपः किं लक्षणं प्रोक्तं को दमश्च प्रकीर्त्तितः?
क्षमा च का परा प्रोक्ता? का च ह्रीःपरिकीर्त्तिता?॥
युधिष्ठिर उवाच
॥୬॥ तपः स्वधर्मवर्त्तित्वं मनसो दमनं दमः।
क्षमा द्वन्द्वसहिष्णुत्वं ह्रीरकार्यनिवर्त्तनम्॥
यक्ष उवाच
॥୭॥ किं ज्ञानं प्रोच्यते राजन्? कः शमश्च प्रकीर्त्तितः?
दया च का परा प्रोक्ता? किं चार्जवमुदाहृतम्?॥
युधिष्ठिर उवाच
॥୮॥ ज्ञानं तत्त्वार्थसम्बोधः शमश्चित्तप्रशान्तता।
दया सर्वसुखैषित्वमार्जवं समचित्तता॥
यक्ष उवाच
॥୯॥ कः शत्रुर्दुर्जयः पुंसां? कश्च व्याधिरनन्तकः?
कीदृशश्च स्मृतः साधुरसाधुः कीदृशः स्मृतः?॥
युधिष्ठिर उवाच
॥୧୦॥ क्रोधः सुदुर्जयः शत्रुर्लोभो व्याधिरनन्तकः।
सर्वभूतहितः साधुरसाधुर्निर्दयः स्मृतः॥
यक्ष उवाच
॥୧୧॥ कः पण्डितः पुमान् ज्ञेयो? नास्तिकः कः प्रकीर्त्तितः?
को मूर्खः? कश्च कामः स्यात्? को मत्सर इति स्मृतः?॥
युधिष्ठिर उवाच
॥୧୨॥ धर्मज्ञः पण्डितो ज्ञेयो नास्तिको मूर्ख उच्यते।
कामः संसारहेतुश्च हृत्तापो मत्सरः स्मृतः॥
यक्ष उवाच
॥୧୩॥ को मोदते? किमाश्चर्यं? कः पन्थाः? का च वार्त्तिका?
वद मे चतुरः प्रश्नान् मृता जीवन्तु बान्धवाः॥
युधिष्ठिर उवाच
॥୧୪॥ पञ्चमेऽहनि षष्ठे वा शाकं पचति यो गृहे।
अनृणी चाप्रवासी च स वारिचर! मोदते॥
॥୧୫॥ अहन्यहनि भूतानि गच्छन्तीह यमालयम्।
शेषा जीवितुमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम्?॥
॥୧୬॥ तर्कोऽप्रतिष्ठः श्रुतयो विभिन्ना नैको मुनिर्यस्य मतं प्रमाणम्।
धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायां महाजनो येन गतः स पन्थाः॥
॥୧୭॥ पृथ्वी विभाण्डं गगनं पिधानं सूर्याग्निना रात्रिन्दिवेन्धनेन।
मासर्तुदर्वीपरिघट्टनेन भूतानि कालः पचतीति वार्ता॥
(महाभारतम्, वनपर्व)

ଓଡ଼ିଆ ଅନୁବାଦ (ପ୍ରଶ୍ନୋତ୍ତର)

ଯକ୍ଷ (୧): ପ୍ରବାସୀର ମିତ୍ର କିଏ? ଘରେ ଥିବା ବ୍ୟକ୍ତିର? ରୋଗୀର? ଆଉ ମରିବାକୁ ଥିବା ବ୍ୟକ୍ତିର ମିତ୍ର କିଏ?
ଯୁଧିଷ୍ଠିର (୨): ପ୍ରବାସୀର ମିତ୍ର ବିଦ୍ୟା, ଘରେ ଥିବା ବ୍ୟକ୍ତିର ମିତ୍ର ଭାର୍ଯ୍ୟା (ପତ୍ନୀ), ରୋଗୀର ମିତ୍ର ବୈଦ୍ୟ, ଆଉ ମରିବାକୁ ଥିବା ବ୍ୟକ୍ତିର ମିତ୍ର ଦାନ।

ଯକ୍ଷ (୩): ପୁରୁଷ କିପରି ‘ମୃତ’ ପରି? ରାଷ୍ଟ୍ର, ଶ୍ରାଦ୍ଧ, ଯଜ୍ଞ କିପରି ମୃତ?
ଯୁଧିଷ୍ଠିର (୪): ଦରିଦ୍ର ପୁରୁଷ ମୃତ, ଅରାଜକ (ରାଜାହୀନ) ରାଷ୍ଟ୍ର ମୃତ, ଅଶ୍ରୋତ୍ରିୟ (ବେଦଜ୍ଞ ବ୍ରାହ୍ମଣ ବିନା) ଶ୍ରାଦ୍ଧ ମୃତ, ଦକ୍ଷିଣାବିହୀନ ଯଜ୍ଞ ମୃତ।

ଯକ୍ଷ (୫): ତପର ଲକ୍ଷଣ କ'ଣ? ଦମ, ଶ୍ରେଷ୍ଠ କ୍ଷମା, ହ୍ରୀ (ଲଜ୍ଜା) କ'ଣ?
ଯୁଧିଷ୍ଠିର (୬): ନିଜ ଧର୍ମରେ ନିଷ୍ଠା = ତପ; ମନର ଦମନ = ଦମ; ଦ୍ୱନ୍ଦ୍ୱ (ସୁଖ-ଦୁଃଖ) ସହିବା = କ୍ଷମା; ଅକାର୍ଯ୍ୟରୁ ନିବୃତ୍ତି = ହ୍ରୀ।

ଯକ୍ଷ (୭): ଜ୍ଞାନ, ଶମ, ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଦୟା, ଆର୍ଜବ କ'ଣ?
ଯୁଧିଷ୍ଠିର (୮): ତତ୍ତ୍ୱାର୍ଥର ବୋଧ = ଜ୍ଞାନ; ଚିତ୍ତର ପ୍ରଶାନ୍ତତା = ଶମ; ସମସ୍ତଙ୍କ ସୁଖ ଚାହିଁବା = ଦୟା; ସମଚିତ୍ତତା (ସମାନ ଭାବ) = ଆର୍ଜବ।

ଯକ୍ଷ (୯): ମନୁଷ୍ୟର ଦୁର୍ଜୟ ଶତ୍ରୁ କିଏ? ଅନନ୍ତ ବ୍ୟାଧି? ସାଧୁ ଓ ଅସାଧୁ କିପରି?
ଯୁଧିଷ୍ଠିର (୧୦): କ୍ରୋଧ = ଦୁର୍ଜୟ ଶତ୍ରୁ; ଲୋଭ = ଅନନ୍ତ ବ୍ୟାଧି; ସର୍ବଭୂତ-ହିତକାରୀ = ସାଧୁ; ନିର୍ଦୟ = ଅସାଧୁ।

ଯକ୍ଷ (୧୧): ପଣ୍ଡିତ, ନାସ୍ତିକ, ମୂର୍ଖ କିଏ? କାମ ଓ ମତ୍ସର କ'ଣ?
ଯୁଧିଷ୍ଠିର (୧୨): ଧର୍ମଜ୍ଞ = ପଣ୍ଡିତ; ମୂର୍ଖ (ବେଦ ନମାନୁଥିବା) = ନାସ୍ତିକ; କାମ = ସଂସାରର କାରଣ; ହୃଦୟର ତାପ (ଈର୍ଷା) = ମତ୍ସର।

ଯକ୍ଷ (୧୩): କିଏ ଆନନ୍ଦିତ? ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟ କ'ଣ? ମାର୍ଗ (ପନ୍ଥା) କ'ଣ? ବାର୍ତ୍ତା କ'ଣ? ଚାରି ପ୍ରଶ୍ନର ଉତ୍ତର ଦିଅ, ତୁମ ମୃତ ବନ୍ଧୁ ବଞ୍ଚିବେ।
ଯୁଧିଷ୍ଠିର (୧୪): ହେ ଜଳଚର (ଯକ୍ଷ)! ଯେ ପଞ୍ଚମ ବା ଷଷ୍ଠ (ଅଂଶ/ଦିନ)ରେ ଘରେ ଶାକ ରାନ୍ଧେ, ଋଣରହିତ ଓ ଅପ୍ରବାସୀ (ନିଜ ଘରେ ରହୁଥିବା) — ସେ ଆନନ୍ଦିତ।

(୧୫): ପ୍ରତିଦିନ ପ୍ରାଣୀମାନେ ଯମାଳୟକୁ (ମୃତ୍ୟୁକୁ) ଯାଉଛନ୍ତି, ତଥାପି ବଳକା ଲୋକ ବଞ୍ଚିବାକୁ ଚାହାନ୍ତି — ଏଠାରୁ ବଡ଼ ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟ ଆଉ କ'ଣ!

(୧୬): ତର୍କ ଅସ୍ଥିର, ବେଦ (ଶ୍ରୁତି) ବିଭିନ୍ନ, ଏମିତି କୌଣସି ଏକ ମୁନି ନାହାଁନ୍ତି ଯାହାଙ୍କ ମତ ହିଁ ପ୍ରମାଣ; ଧର୍ମର ତତ୍ତ୍ୱ ଗୁହାରେ (ଗୋପନରେ) ଲୁକ୍କାୟିତ — ତେଣୁ ମହାଜନ (ଶ୍ରେଷ୍ଠ ପୁରୁଷ) ଯେଉଁ ମାର୍ଗରେ ଯାଇଛନ୍ତି, ତାହା ହିଁ (ଠିକ୍) ପନ୍ଥା।

(୧୭): ପୃଥିବୀ ହେଉଛି ପାତ୍ର (କଡ଼େଇ), ଆକାଶ ଢାଙ୍କୁଣୀ, ସୂର୍ଯ୍ୟ ଅଗ୍ନି, ରାତି-ଦିନ ଜାଳେଣି (ଇନ୍ଧନ), ମାସ-ଋତୁ ଚାମଚ (ଦର୍ବୀ) — ଏହିପରି କାଳ ପ୍ରାଣୀମାନଙ୍କୁ ‘ରାନ୍ଧୁଛି’ (ପଚାଉଛି) — ଏ ହିଁ ବାର୍ତ୍ତା (ତତ୍ତ୍ୱ)।

ଅନ୍ୱୟ (संस्कृत — ଗଦ୍ୟକ୍ରମ)

୧. प्रवसतः किं स्वित् मित्रम्? गृहे सतः किंस्वित् मित्रम्? आतुरस्य च किं मित्रम्? मरिष्यतः किंस्वित् मित्रम्?

୨. प्रवसतः विद्या मित्रम्, गृहे सतः भार्या मित्रम्, आतुरस्य भिषक् मित्रम्, मरिष्यतः दानं मित्रम्।

୩. कथं पुरुषः मृतः स्यात्? कथं राष्ट्रं मृतं भवेत्? कथं वा श्राद्धं मृतं स्यात्? कथं यज्ञः तु मृतः भवेत्?

୪. दरिद्रः पुरुषः मृतः, अराजकं राष्ट्रं मृतम्, अश्रोत्रियं श्राद्धं मृतम्, अदक्षिणः यज्ञः तु मृतः।

୫. तपः किं लक्षणं प्रोक्तम्? कः च दमः प्रकीर्त्तितः? का च परा क्षमा प्रोक्ता? का च ह्रीः परिकीर्त्तिता?

୬. स्वधर्मवर्त्तित्वं तपः, मनसः दमनं दमः। द्वन्द्वसहिष्णुत्वं क्षमा, अकार्य-निवर्त्तनं ह्रीः।

୭. राजन्! ज्ञानं किं प्रोच्यते? कः च शमः प्रकीर्त्तितः? का च परा दया प्रोक्ता? किं च आर्जवम् उदाहृतम्?

୮. तत्त्वार्थसम्बोधः ज्ञानम्, चित्तप्रशान्तता शमः। सर्वसुखैषित्वम् दया, समचित्तता आर्जवम्।

୯. कः पुंसां दुर्जयः शत्रुः? कः च अनन्तकः व्याधिः? कीदृशः च साधुः स्मृतः? कीदृशः असाधुः स्मृतः?

୧୦. क्रोधः सुदुर्जयः शत्रुः, लोभः अनन्तकः व्याधिः, सर्वभूतहितः साधुः, असाधुः निर्दयः स्मृतः।

୧୧. कः पुमान् पण्डितः ज्ञेयः? कः नास्तिकः प्रकीर्त्तितः? कः मूर्खः? कः च कामः स्यात्? कः मत्सरः इति स्मृतः?

୧୨. धर्मज्ञः पण्डितः ज्ञेयः, नास्तिकः मूर्खः उच्यते। संसारहेतुः च कामः, हृत्तापः मत्सरः स्मृतः।

୧୩. कः मोदते? किम् आश्चर्यम्? कः पन्थाः? का च वार्त्तिका? चतुरः प्रश्नान् (पृच्छामि), मे (उत्तरं) वद, (तव) मृताः बान्धवाः जीवन्तु।

୧୪. वारिचर! यः अहनि पञ्चमे (अंशे) षष्ठे (अंशे) वा गृहे शाकं पचति, अनृणी अप्रवासी च (भवति); सः मोदते।

୧୫. इह अहनि अहनि भूतानि यमालयं गच्छन्ति। शेषाः जीवितुम् इच्छन्ति, अतः परम् आश्चर्यं किम्?

୧୬. तर्कः अप्रतिष्ठः, श्रुतयः विभिन्नाः, एकः मुनिः न अस्ति यस्य मतं प्रमाणम्। धर्मस्य तत्त्वं गुहायां निहितम्, महाजनः येन गतः सः पन्थाः (भवति)।

୧୭. पृथ्वी विभाण्डं, गगनं पिधानं, सूर्याग्निना, रात्रिन्दिवेन्धनेन, मास-ऋतु-दर्वी परिघट्टनेन, कालः भूतानि पचति इति वार्त्ता।

ଶବ୍ଦାର୍ଥ (ଟିପ୍ପଣୀ)

ସଂସ୍କୃତ ଶବ୍ଦଓଡ଼ିଆ ଅର୍ଥ
किंस्वित्କ'ଣ / କିଏ (ଅବ୍ୟୟ)
प्रवसतःପ୍ରବାସୀର (ବିଦେଶରେ ଥିବା)
आतुरस्यରୋଗୀର
भिषक्ବୈଦ୍ୟ, ଚିକିତ୍ସକ
श्राद्धम्ପିତୃପୁରୁଷଙ୍କ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟରେ ପିଣ୍ଡଦାନ
अश्रोत्रियम्ବେଦଜ୍ଞ ବ୍ରାହ୍ମଣ ବିନା
अदक्षिणःଦକ୍ଷିଣାବିହୀନ
दमःମନର ଦମନ
स्वधर्मवर्त्तित्वम्ନିଜଧର୍ମରେ ନିଷ୍ଠା
द्वन्द्वसहिष्णुत्वम्ସୁଖ-ଦୁଃଖ ଆଦି ଦ୍ୱନ୍ଦ୍ୱ ସହିବା
ह्रीःଲଜ୍ଜା
अकार्यनिवर्त्तनम्ଅକାର୍ଯ୍ୟରୁ ନିବୃତ୍ତି
आर्जवम् / समचित्तताସରଳତା / ସମାନ ଭାବ
शमःଚିତ୍ତର ଶାନ୍ତି
सर्वसुखैषित्वम्ସମସ୍ତଙ୍କ ସୁଖ କାମନା
व्याधिरनन्तकःଅନ୍ତହୀନ / ଦୁରାରୋଗ୍ୟ ବ୍ୟାଧି
सर्वभूतहितःସକଳ ଜୀବର ହିତକାରୀ
मत्सरःପରଶ୍ରୀକାତରତା (ଈର୍ଷା)
कामःଜାଗତିକ ବିଷୟଭୋଗ ଲାଳସା
संसारहेतुःଜନ୍ମମରଣ ରୂପ ସଂସାରର କାରଣ
वार्त्ता / वार्त्तिकाବାର୍ତ୍ତା, ସନ୍ଦେଶ
शाकम्ଶାକ (ସାତ୍ତ୍ୱିକ ଆହାର)
अप्रवासीନିଜ ଘରେ ରହୁଥିବା
अनृणीଋଣରହିତ
वारिचरଜଳଚର (ଯକ୍ଷ)
अहन्यहनिପ୍ରତିଦିନ
तर्कः / अप्रतिष्ठःଅପ୍ରାମାଣିକ ଯୁକ୍ତି / ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ ନୁହେଁ
निहितम् / गुहायाम्ଲୁକ୍କାୟିତ / ଗହ୍ୱରରେ (ଗୋପନରେ)
महाजनः / पन्थाःଶ୍ରେଷ୍ଠ ପୁରୁଷ / ମାର୍ଗ
विभाण्डम् / पिधानम्ବଡ଼ ପାତ୍ର / ଢାଙ୍କୁଣୀ
इन्धनम् / दर्वीଜାଳେଣି / ଚାମଚ, କରଚୁଲି
पचति / मोदतेରାନ୍ଧେ, ପଚାଏ / ଆନନ୍ଦିତ ହୁଏ

💡 ଉତ୍ସ: ‘ମହାଭାରତ’ — ବନପର୍ବ (ଯକ୍ଷପ୍ରଶ୍ନ)। ବିଷୟ — ଜୀବନମୂଲ୍ୟ ଓ ଧର୍ମତତ୍ତ୍ୱର ପ୍ରଶ୍ନୋତ୍ତର।

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