Bhautikam Paryavaranam · ଭୌତିକ ପର୍ଯ୍ୟାବରଣ
ସଂସ୍କୃତ (संस्कृतसाहित्यमञ्जरी) · ଓଡ଼ିଶା ବୋର୍ଡ ଦଶମ ଶ୍ରେଣୀ · ଗଦ୍ୟଭାଗ ଦଶମ ପାଠ · ଟିପ୍ପଣୀ + ଅଭ୍ୟାସ + ୨୫ Quiz
📖 ପାଠ ପରିଚୟ: ଏହା ଏକ ପ୍ରବନ୍ଧ (essay) — ‘ପରି’ + ‘ଆବରଣ’ ର ଯୋଗରୁ ‘ପର୍ଯ୍ୟାବରଣ’ ଶବ୍ଦ ବନେ। ପୃଥିବୀ ଚାରିପଟେ ଥିବା ନୈସର୍ଗିକ ଆବରଣ ହିଁ ପର୍ଯ୍ୟାବରଣ। ଏହି ପାଠରେ ପଞ୍ଚ ମହାଭୂତ (ଆକାଶ, ବାୟୁ, ଅଗ୍ନି, ଜଳ, ପୃଥିବୀ)ର ମହତ୍ତ୍ୱ, ପ୍ରଦୂଷଣର ଭୟ ଓ ପର୍ଯ୍ୟାବରଣ-ସୁରକ୍ଷାର ଆବଶ୍ୟକତା ବର୍ଣ୍ଣିତ। ଶେଷରେ ‘ଶାନ୍ତିମନ୍ତ୍ର’ ଦ୍ୱାରା ସର୍ବତ୍ର ଶାନ୍ତିର କାମନା କରାଯାଇଛି।
"परि" "आवरण" इति अनयोःयोगेन "पर्यावरण" शब्दः निष्पन्नः भवति। पृथिवी एकः विचित्रः ग्रहः यत्र विभिन्नरूपेण जीवजगतः विकासः अभवत्। पृथिवीं परितः यत् नैसर्गिकम् आवरणम् अस्ति, तत् पर्यावरणम् उच्यते। सम्प्रति परिवेष इति शब्दः पर्यावरणस्य पर्यायवाचकः। "वेष्टने परिवेषः स्याद् भानोः सविधमण्डले"। अमरकोषे "परिवेष" इति शब्दः उपलब्धः। परिवेषस्तु परिधिः उपसूर्यकमण्डले। परितः विष्यते अनेन इति परिवेषः। परि + विष् (व्याप्तौ) + घञ् = परिवेषः। येन सर्वं व्याप्तं भवति स परिवेषः।
जगत् परितः आवरणं पर्यावरणम्। सृष्टिप्रक्रियायां पञ्च महाभूतानि परस्परं संश्लिष्टानि। सूक्ष्मात् भूतात् स्थूलस्य भूतस्य उत्पत्तिः भवति। आकाशाद् वायुः, वायोः अग्निः, अग्नेः आपः, अद्भ्यः पृथिवी। एवं भौतिकसृष्टिक्रमः। पृथिवी स्थूलतमा यत्र अन्यानि भूतानि संश्लिष्टानि सन्ति। पर्यावरणे एतानि भूतानि गृहीतानि। आकाशः, वायुः, अग्निः, जलम्, पृथिवी च भूतानि। पर्यावरणमध्ये एतेषां ग्रहणं भवति। Ecology, Oecology इति शब्दद्वयं Oiko(s) इति ग्रीक् शब्दतः निष्पन्नम्। यस्यार्थः गृहम्। संस्कृते "ओकस्" शब्दः गृहपर्यायवाचकः। प्राणिजगतः उद्भिज्जगतः च व्यापकं गृहं भवति पर्यावरणम्।
भौतिक-जैविकभेदेन पर्यावरणं द्विविधम्। भौतिकपर्यावरणे पञ्चभूतानां, जैविके वृक्षाणां जीवानां च ग्रहणं भवति। प्राणिनः भूमेः भोजनं, जलाज्जलं, वायुमण्डलात् प्राणवायुं च गृहीत्वा जीवन्ति। भौतिकपर्यावरणस्य सुरक्षया जीवजगत् सुरक्षितं भविष्यति।
"पृथिवी-विश्वम्भरा वसुधानी प्रतिष्ठा जगतो निवेशनी" (अथर्ववेदः- XII,16)। पृथिवी अस्माकं माता। पृथिवी जीवजगत्, वृक्षजगत्, रत्नानि, खनिजद्रव्याणि च धारयति। पृथिव्याः संरक्षणेन सर्वे सुरक्षिताः भविष्यन्ति। भूमेः प्रदूषणेन रोगाः जायन्ते। वृक्षाणां वृथा छेदनेन अत्यधिकरासायनिककीटनाशकविषप्रयोगेण च भूमिः प्रदूषिता शक्तिहीना च भवति। भूमिः प्रकृतिः उच्यते। अतः तस्याः संरक्षणेन सर्वं संरक्षितं भवति।
जायते अस्मात् इति 'जम्', लीयते अस्मिन् इति 'लम्'। यत्र जीवजगतः उत्पत्तिः लयः च भवतः तद्भवति जलम्। एवम् अर्थस्य जलं प्रतीकं भवति। जलं सर्वत्र आप्नोति व्याप्तं भवति, अतः जलम् आपः इति उच्यते। पृथिव्यां यज्जलं व्याप्तं भवति, सूर्यरश्मिभिः वाष्पीभवनप्रक्रियया तज्जलं मेघे सञ्चितं भवति। वर्षाकाले वृष्ट्या तज्जलम् अन्नम् उद्भावयति। "अन्नाद् भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः" इति गीतावचनम्। जले जीवनस्य बीजं सृष्टम्। "अप एव ससर्जादौ तासु बीजमवासृजत्।" (मनुस्मृतिः I.8)। जलं 'रस' उच्यते। पर्वतेभ्यः प्रवहन्तीषु जलधारासु मृत्तिकाधातुखनिजजलवणादिरसाः सञ्चरन्ति। अत्र जीवनस्य धारकं वर्धकं च तत्त्वं निहितमस्ति। शिल्पायनेन वर्ज्यवस्तुत्यागेन जलं प्रदूषितं रोगजनकं च भवति। निर्मलेन जलेन जीवनम् आयुरारोग्यमयं भवति।
अग्निः तेजोरूपः। अग्नेः दाहिका शक्तिः सर्वमशुद्धं वस्तु नाशयति, पर्यावरणस्य विशुद्धिं च रक्षति। सूर्यः, यज्ञाग्निः, गार्हपत्याग्निः, वनाग्निः, वडवाग्निः इति विविधरूपेण अग्निः शुद्धेः कारणं भवति, वायुमण्डलस्य विषप्रक्रियाम् अग्निः नाशयति, संसारस्य हितं साधयति च।
"वाति गच्छति गन्धं वहति" इति वायुः। जीवनस्य आधारः वायुः। वायुः विश्वभेषजरूपः। प्राणवायुद्वारा जीवनस्य सञ्चारः भवति। यज्ञे अग्नौ घृतयुक्ताः आहुतयः वायुमण्डलं शुद्धं कुर्वन्ति। वृक्षः वायुमण्डलात् अङ्गाराम्लं गृहीत्वा अङ्गारं सञ्चिनोति, प्राणवायुम् अम्लजानं निःसारयति। वृक्षः स्वपत्रमाध्यमेन रश्मिप्रतिपालनप्रक्रियया (Photosynthesis) खाद्यं प्रस्तौति। वायुसंशोधने वृक्षाणां भूमिका महत्त्वपूर्णा। वृक्षाणां छेदनेन वायुप्रदूषणं वर्धते। वायुमण्डलस्य सुरक्षया जीवनं सुरक्षितं स्यात्।
"आ समन्तात् कशते प्रकाशते" इति आकाशः। वायुमण्डलस्य शुद्धिनिमित्तं द्युलोकस्य भूलोकस्य च संरक्षणम् आवश्यकम्। आकाशः पिता पृथिवी माता। द्यौः पिता (अथर्ववेदः - VI, 120, 2)। द्युलोकस्य अन्तरिक्षस्य वा प्रदूषणेन ऊर्जास्रोतसः हानिः, भूमेः प्रदूषणेन जीवनं च संकटापन्नं भवति।
एतानि भूतानि समन्वितरूपेण प्राणिनां जीवनं धारयन्ति पोषयन्ति च। एकस्यापि विपर्यये सृष्टेः विनाशः अवश्यम्भावी। विश्वस्य तदावरणस्य पर्यावरणस्य च सुरक्षया सृष्टिरियं नूनं रमणीया भविष्यति। सर्वत्र शान्तिः विराजताम् इति धिया एतेषां सुरक्षानिमित्तं शान्तिमन्त्रः पठ्यते।
ॐ द्यौः शान्तिः, अन्तरिक्षं शान्तिः, पृथिवी शान्तिः, आपः शान्तिः, ओषधयः शान्तिः, वनस्पतयः शान्तिः, विश्वेदेवाः शान्तिः, ब्रह्म शान्तिः, सर्वं शान्तिः, शान्तिरेव शान्तिः, सा मा शान्तिरेधि। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः। (यजुर्वेदः- 36-17)
ପର୍ଯ୍ୟାବରଣ: ‘ପରି’ ଓ ‘ଆବରଣ’ ର ଯୋଗରୁ ‘ପର୍ଯ୍ୟାବରଣ’ ଶବ୍ଦ ବନେ। ପୃଥିବୀ ଏକ ବିଚିତ୍ର ଗ୍ରହ, ଯେଉଁଠି ବିଭିନ୍ନ ରୂପରେ ଜୀବଜଗତର ବିକାଶ ହେଲା। ପୃଥିବୀ ଚାରିପଟେ ଥିବା ନୈସର୍ଗିକ ଆବରଣ ହିଁ ପର୍ଯ୍ୟାବରଣ। ‘ପରିବେଷ’ ଏହାର ପର୍ଯ୍ୟାୟବାଚକ। ‘ପରି + ବିଷ୍ (ବ୍ୟାପ୍ତି) + ଘଞ୍’ = ପରିବେଷ; ଯାହା ଦ୍ୱାରା ସବୁ ବ୍ୟାପ୍ତ ହୁଏ ତାହା ପରିବେଷ।
ପଞ୍ଚ ମହାଭୂତ: ସୃଷ୍ଟି-ପ୍ରକ୍ରିୟାରେ ପାଞ୍ଚ ମହାଭୂତ ପରସ୍ପର ସଂଶ୍ଳିଷ୍ଟ। ସୂକ୍ଷ୍ମ ଭୂତରୁ ସ୍ଥୂଳ ଭୂତ ଜନ୍ମେ — ଆକାଶରୁ ବାୟୁ, ବାୟୁରୁ ଅଗ୍ନି, ଅଗ୍ନିରୁ ଜଳ, ଜଳରୁ ପୃଥିବୀ। ପର୍ଯ୍ୟାବରଣ ଏହି ପାଞ୍ଚ ଭୂତ (ଆକାଶ, ବାୟୁ, ଅଗ୍ନି, ଜଳ, ପୃଥିବୀ)କୁ ନେଇ ଗଠିତ। ‘Ecology’ ଗ୍ରୀକ ଶବ୍ଦ ‘Oikos’ (ଅର୍ଥ — ଗୃହ)ରୁ ବନିଛି; ସଂସ୍କୃତରେ ‘ଓକସ୍’ ଅର୍ଥ ଗୃହ। ପ୍ରାଣିଜଗତ ଓ ଉଦ୍ଭିଦ୍ଜଗତର ବ୍ୟାପକ ଗୃହ ହିଁ ପର୍ଯ୍ୟାବରଣ। ଏହା ଭୌତିକ ଓ ଜୈବିକ — ଦୁଇ ପ୍ରକାର।
🌍 ପୃଥିବୀ: ପୃଥିବୀ ଆମର ମାତା। ସେ ଜୀବଜଗତ, ବୃକ୍ଷ, ରତ୍ନ ଓ ଖଣିଜ ଧାରଣ କରେ। ପୃଥିବୀର ସଂରକ୍ଷଣରେ ସମସ୍ତେ ସୁରକ୍ଷିତ। ଭୂମିର ପ୍ରଦୂଷଣରେ ରୋଗ ଜନ୍ମେ। ବୃକ୍ଷର ବୃଥା ଛେଦନ ଓ ଅତ୍ୟଧିକ ରାସାୟନିକ କୀଟନାଶକ ବିଷ ପ୍ରୟୋଗରେ ଭୂମି ପ୍ରଦୂଷିତ ଓ ଶକ୍ତିହୀନ ହୁଏ।
💧 ଜଳ: ‘ଜ’ (ଜନ୍ମେ) + ‘ଲ’ (ଲୀନ ହୁଏ) — ଯେଉଁଠି ଜୀବଜଗତର ଉତ୍ପତ୍ତି ଓ ଲୟ ହୁଏ ତାହା ଜଳ। ସୂର୍ଯ୍ୟ-କିରଣ ଦ୍ୱାରା ବାଷ୍ପୀଭବନ ହୋଇ ଜଳ ମେଘରେ ସଞ୍ଚିତ ହୁଏ, ବର୍ଷାରେ ପଡ଼ି ଅନ୍ନ ଉତ୍ପନ୍ନ କରେ (“ଅନ୍ନାଦ୍ ଭବନ୍ତି ଭୂତାନି...” — ଗୀତା)। ନିର୍ମଳ ଜଳରେ ଜୀବନ ଆୟୁ ଓ ଆରୋଗ୍ୟମୟ ହୁଏ; ଦୂଷିତ ଜଳ ରୋଗ ଜନ୍ମାଏ।
🔥 ଅଗ୍ନି: ଅଗ୍ନି ତେଜୋରୂପ। ତାହାର ଦାହିକା ଶକ୍ତି ସମସ୍ତ ଅଶୁଦ୍ଧ ବସ୍ତୁ ନଷ୍ଟ କରି ପର୍ଯ୍ୟାବରଣର ବିଶୁଦ୍ଧି ରକ୍ଷା କରେ। ସୂର୍ଯ୍ୟ, ଯଜ୍ଞାଗ୍ନି ଆଦି ବିଭିନ୍ନ ରୂପରେ ଅଗ୍ନି ଶୁଦ୍ଧିର କାରଣ ହୋଇ ସଂସାରର ହିତ ସାଧନ କରେ।
🌬️ ବାୟୁ: ‘ବାତି’ (ବହେ, ଗନ୍ଧ ବହନ କରେ) — ତାହା ବାୟୁ। ଜୀବନର ଆଧାର ବାୟୁ। ବୃକ୍ଷ ବାୟୁମଣ୍ଡଳରୁ ଅଙ୍ଗାରାମ୍ଳ (CO₂) ନେଇ ପ୍ରାଣବାୟୁ (ଅମ୍ଳଜାନ/O₂) ଛାଡ଼େ ଓ ପତ୍ର ଦ୍ୱାରା ଫଟୋସିନ୍ଥେସିସରେ ଖାଦ୍ୟ ତିଆରି କରେ। ବୃକ୍ଷ-ଛେଦନରେ ବାୟୁ-ପ୍ରଦୂଷଣ ବଢ଼େ।
🌌 ଆକାଶ: ‘ଆ ସମନ୍ତାତ୍ କଶତେ ପ୍ରକାଶତେ’ — ତାହା ଆକାଶ। ଆକାଶ ପିତା, ପୃଥିବୀ ମାତା। ଦ୍ୟୁଲୋକ/ଅନ୍ତରିକ୍ଷର ପ୍ରଦୂଷଣରେ ଊର୍ଜାସ୍ରୋତର ହାନି ହୁଏ ଓ ଭୂମିର ପ୍ରଦୂଷଣରେ ଜୀବନ ସଙ୍କଟାପନ୍ନ ହୁଏ।
ଏହି ପାଞ୍ଚ ଭୂତ ମିଳିତ ଭାବେ ପ୍ରାଣୀଙ୍କ ଜୀବନ ଧାରଣ ଓ ପୋଷଣ କରନ୍ତି। ଗୋଟିଏ ବି ବିକୃତ ହେଲେ ସୃଷ୍ଟିର ବିନାଶ ନିଶ୍ଚିତ। ପର୍ଯ୍ୟାବରଣର ସୁରକ୍ଷାରେ ହିଁ ଏ ସୃଷ୍ଟି ରମଣୀୟ ହେବ। ‘ସର୍ବତ୍ର ଶାନ୍ତି ବିରାଜ କରୁ’ — ଏହି ଭାବନାରେ ଶେଷରେ ଶାନ୍ତିମନ୍ତ୍ର ପଠିତ ହୁଏ (ଯଜୁର୍ବେଦ ୩୬-୧୭)।
| ସଂସ୍କୃତ ଶବ୍ଦ | ଓଡ଼ିଆ ଅର୍ଥ |
|---|---|
| परिवेषः | ସୂର୍ଯ୍ୟ ଚାରିପାଖରେ ଥିବା ଧୂଳିକଣିକା-ମଣ୍ଡଳ |
| पर्यावरणम् | ପୃଥିବୀ ଚାରିପାଖରେ ଥିବା ଆବରଣ (ବୃହତ୍ତର ଆବରଣ) |
| अद्भ्यः | ଜଳରୁ |
| पर्जन्यात् | ବୃଷ୍ଟିରୁ |
| आपः | ଜଳ |
| द्विविधम् | ଦୁଇ ପ୍ରକାର |
| लीयते | ଲୀନ ହୁଏ |
| प्रवहन्तीषु | ବହୁଥିବା |
| ओकस् | (କ୍ଲୀବଲିଙ୍ଗ) ଗୃହ / ଆବାସ |
| विश्व | ଭୂମଣ୍ଡଳ |
| तदावरणम् | ତାହାର ଆବରଣ (ବାୟୁମଣ୍ଡଳ) |
| अङ्गाराम्लम् / अम्लजानम् | ଅଙ୍ଗାରାମ୍ଳ (CO₂) / ଅମ୍ଳଜାନ (O₂) |
| विश्वम्भरा | ବିଶ୍ୱକୁ ଧାରଣ କରୁଥିବା (ପୃଥିବୀ) |
| तेजोरूपः | ତେଜ (ଜ୍ୟୋତି) ରୂପ |
| विश्वभेषजरूपः | ବିଶ୍ୱର ଔଷଧ ରୂପ |
| द्युलोकः / अन्तरिक्षम् | ସ୍ୱର୍ଗଲୋକ / ଆକାଶ |
💡 ଶିକ୍ଷା — ପଞ୍ଚ ମହାଭୂତର ସୁରକ୍ଷା (ପର୍ଯ୍ୟାବରଣ ସଂରକ୍ଷଣ) ହିଁ ଜୀବନ ଓ ସୃଷ୍ଟିର ରକ୍ଷା।
ମାଗଣା ଟିପ୍ପଣୀ, ନୂଆ ପାଠ ସମାଧାନ, ମଡେଲ ପ୍ରଶ୍ନପତ୍ର ଓ ପରୀକ୍ଷା ଅପଡେଟ୍ — ସିଧା ଆପଣଙ୍କ ଫୋନରେ।
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