संगतकार — कवि परिचय, पाठ-सार, भावार्थ एवं शब्दार्थ
कवि परिचय
मंगलेश डबराल (जन्म सन् 1948, काफलपानी, टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंड — निधन सन् 2020) की शिक्षा-दीक्षा देहरादून में हुई। वे अनेक पत्र-पत्रिकाओं (हिन्दी पेट्रियट, प्रतिपक्ष, पूर्वग्रह, जनसत्ता आदि) में संपादन से जुड़े रहे। उनके चार काव्य-संग्रह प्रकाशित हुए — पहाड़ पर लालटेन, घर का रास्ता, हम जो देखते हैं एवं आवाज़ भी एक जगह है। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार एवं पहल सम्मान मिला; एक अनुवादक के रूप में भी उनकी ख्याति है। उनकी कविताओं में सामंती बोध एवं पूँजीवादी छल-छद्म दोनों का प्रतिकार मिलता है — वह भी शोर-शराबे से नहीं, बल्कि एक सुंदर सपना रचकर। उनका सौंदर्यबोध सूक्ष्म एवं भाषा पारदर्शी है।
पाठ-परिचय
संगतकार कविता गायन में मुख्य गायक का साथ देने वाले संगतकार की भूमिका के महत्त्व पर विचार करती है। यह केवल नाटक, फ़िल्म, संगीत, नृत्य जैसी दृश्य-प्रस्तुतियों के लिए ही सही नहीं, बल्कि समाज एवं इतिहास में भी ऐसे अनेक प्रसंग हैं जहाँ नायक की सफलता में अनेक गुमनाम लोगों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कविता हममें यह संवेदनशीलता विकसित करती है कि इनमें से प्रत्येक का अपना-अपना महत्त्व है, और उनका सामने न आना उनकी कमज़ोरी नहीं, बल्कि मानवीयता है।
कविता का भावार्थ
कवि कहता है कि मुख्य गायक के चट्टान जैसे भारी स्वर का साथ देने वाली संगतकार की आवाज़ सुंदर, कमज़ोर एवं काँपती हुई होती है। वह मुख्य गायक का छोटा भाई है, या शिष्य, या पैदल चलकर सीखने आने वाला कोई दूर का रिश्तेदार — जो प्राचीन काल से मुख्य गायक की गरज में अपनी गूँज मिलाता आया है। जब गायक अंतरे की जटिल तानों के जंगल में खो जाता है या अपने ही सरगम को लाँघकर भटकने लगता है, तब संगतकार ही ‘स्थायी’ को सँभाले रखता है — मानो मुख्य गायक का पीछे छूटा सामान समेट रहा हो, उसे उसका नौसिखिया बचपन याद दिला रहा हो।
जब तारसप्तक में गायक का गला बैठने लगता है, प्रेरणा साथ छोड़ने लगती है, उत्साह अस्त होने लगता है और आवाज़ से राख जैसा कुछ गिरने लगता है — तभी संगतकार का स्वर मुख्य गायक को ढाँढ़स बँधाता है। कभी-कभी वह यों ही साथ दे देता है, यह बताने के लिए कि वह अकेला नहीं है और फिर से गाया जा सकता है। अंत में कवि कहता है कि संगतकार की आवाज़ में जो हिचक है या अपने स्वर को ऊँचा न उठाने की कोशिश है, उसे विफलता नहीं, उसकी मनुष्यता समझा जाना चाहिए।
शब्दार्थ
संगतकार = मुख्य गायक के साथ गाने या वाद्य बजाने वाला सहयोगी कलाकार; गरज = ऊँची गंभीर आवाज़; अंतरा = स्थायी/टेक को छोड़कर गीत का चरण; जटिल = कठिन; तान = संगीत में स्वर का विस्तार; नौसिखिया = जिसने अभी सीखना आरंभ किया हो; स्थायी = गीत की मुख्य टेक; तारसप्तक = मध्य सप्तक से ऊँचा सप्तक; राख जैसा कुछ गिरना = बुझता हुआ स्वर; ढाँढ़स बँधाना = तसल्ली/सांत्वना देना; अनहद = असीम ध्वनि।
प्रश्न-अभ्यास (सभी उत्तर)
1संगतकार के माध्यम से कवि किस प्रकार के व्यक्तियों की ओर संकेत करना चाह रहा है?
कवि उन गुमनाम सहयोगियों एवं पृष्ठभूमि में रहने वाले लोगों की ओर संकेत कर रहा है जो किसी नायक या मुख्य व्यक्ति की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, पर स्वयं सामने नहीं आते। कवि उनके त्याग, विनम्रता एवं निःस्वार्थ सहयोग की ओर ध्यान दिलाता है — वे सहायक, शिष्य या साथी जो दूसरों को चमकाने के लिए अपना स्वर ऊँचा नहीं करते।
2संगतकार जैसे व्यक्ति संगीत के अलावा और किन-किन क्षेत्रों में दिखाई देते हैं?
ऐसे व्यक्ति हर क्षेत्र में दिखाई देते हैं — फ़िल्म में (निर्देशक, लेखक, कैमरामैन, तकनीशियन, स्पॉट बॉय), खेल में (कोच एवं सहयोगी खिलाड़ी), राजनीति/समाज-सेवा में (गुमनाम कार्यकर्ता), साहित्य में (संपादक), विज्ञान में (सहायक शोधार्थी) आदि। हर सफल व्यक्ति के पीछे अनेक ऐसे अनाम सहयोगी होते हैं।
3संगतकार किन-किन रूपों में मुख्य गायक-गायिकाओं की मदद करते हैं?
संगतकार कई रूपों में मदद करते हैं — (i) जब गायक जटिल तानों के जंगल में खो जाता है, तब वे ‘स्थायी’ को सँभाले रखते हैं; (ii) गायक को उसका छूटा सामान/नौसिखिया बचपन याद दिलाते हैं; (iii) जब तारसप्तक में स्वर बैठने एवं उत्साह अस्त होने लगता है, तब ढाँढ़स बँधाते हैं; (iv) कभी यों ही साथ देकर बताते हैं कि गायक अकेला नहीं है और फिर से गाया जा सकता है।
4भाव स्पष्ट कीजिए — ‘और उसकी आवाज़ में जो एक हिचक साफ सुनाई देती है…उसकी मनुष्यता समझा जाना चाहिए।’
कवि कहता है कि संगतकार की आवाज़ में जो हिचक या अपने स्वर को जान-बूझकर ऊँचा न उठाने की कोशिश दिखती है, उसे उसकी कमज़ोरी या विफलता नहीं समझना चाहिए। वह ऐसा मुख्य गायक की गरिमा बनाए रखने के लिए करता है — आगे न बढ़कर नायक को चमकने देना उसका त्याग, विनम्रता एवं मानवीयता है, कमज़ोरी नहीं।
5रचना-अभिव्यक्ति: किसी भी क्षेत्र में प्रसिद्धि पाने वाले को अनेक लोग तरह-तरह से योगदान देते हैं। कोई एक उदाहरण देकर इस कथन पर अपने विचार लिखिए।
(नमूना) किसी फ़िल्म की सफलता में केवल अभिनेता ही नहीं, बल्कि निर्देशक, लेखक, संगीतकार, कैमरामैन एवं अनेक तकनीशियन का योगदान होता है, जो परदे पर दिखाई नहीं देते। इसी प्रकार एक क्रिकेटर की सफलता में उसके कोच एवं पूरी टीम का सहयोग रहता है। अतः हर सफलता सामूहिक प्रयास का फल होती है — पर्दे के पीछे के लोगों का सम्मान भी आवश्यक है।
6तारसप्तक की ऊँचाई पर पहुँचकर कभी-कभी मुख्य गायक का स्वर बिखरता नज़र आता है; उस समय संगतकार उसे बिखरने से बचा लेता है। इस कथन के आलोक में संगतकार की विशेष भूमिका को स्पष्ट कीजिए।
जब तारसप्तक की ऊँचाई पर मुख्य गायक का स्वर बैठने एवं बिखरने लगता है, उसका उत्साह अस्त होने लगता है, तब संगतकार ‘स्थायी’ को सँभालकर, अपनी आवाज़ मिलाकर उसे बिखरने से बचा लेता है और ढाँढ़स बँधाता है। इस प्रकार वह न केवल प्रस्तुति को, बल्कि मुख्य गायक की गरिमा एवं आत्मविश्वास को भी बचा लेता है — यही उसकी विशेष एवं अनिवार्य भूमिका है।
7सफलता के चरम शिखर पर पहुँचने के दौरान यदि व्यक्ति लड़खड़ाता है, तब उसे सहयोगी किस तरह सँभालते हैं?
ऐसे समय सहयोगी व्यक्ति को ढाँढ़स एवं सांत्वना देकर, अपना निःस्वार्थ साथ देकर, उसका आत्मविश्वास बनाए रखकर तथा यह अहसास कराकर कि ‘वह अकेला नहीं है’ उसे सँभाल लेते हैं। वे उसे फिर से प्रयास करने की प्रेरणा देते हैं और उसकी कमज़ोरी को ढककर उसे गिरने से बचा लेते हैं।
8रचना-अभिव्यक्ति: कल्पना कीजिए कि आपको किसी संगीत/नृत्य समारोह का कार्यक्रम प्रस्तुत करना है पर सहयोगी कलाकार नहीं पहुँच पाए — (क) अपनी स्थिति का वर्णन (ख) इस परिस्थिति का सामना कैसे करेंगे?
(क) सहयोगी कलाकारों के बिना मैं अत्यंत असहाय, घबराया एवं अधूरा अनुभव करूँगा, क्योंकि अकेले पूरी प्रस्तुति सँभालना कठिन है और आत्मविश्वास डगमगाने लगेगा। (ख) मैं धैर्य रखकर, उपलब्ध साधनों एवं अपनी तैयारी के बल पर यथासंभव प्रस्तुति दूँगा, दर्शकों से सहयोग माँगूँगा और स्थिति को शांत मन से सँभालूँगा। (छात्र विस्तार दें।)
9रचना-अभिव्यक्ति: अपने विद्यालय में मनाए जाने वाले सांस्कृतिक समारोह में मंच के पीछे काम करने वाले सहयोगियों की भूमिका पर एक अनुच्छेद लिखिए।
(नमूना) किसी भी सांस्कृतिक समारोह की सफलता में मंच के पीछे काम करने वाले सहयोगी अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं — मंच-सज्जा, प्रकाश एवं ध्वनि-व्यवस्था, परदे, वेशभूषा, संगीत आदि सँभालने वाले। वे सामने नहीं आते, न उनकी तालियाँ बजती हैं, फिर भी उनके बिना कोई प्रस्तुति संभव नहीं। उनका मौन परिश्रम एवं समर्पण ही कार्यक्रम को सफल बनाता है। (छात्र विस्तार दें।)
10किसी भी क्षेत्र में ‘संगतकार’ की पंक्ति वाले लोग प्रतिभावान होते हुए भी मुख्य या शीर्ष स्थान पर क्यों नहीं पहुँच पाते होंगे?
(नमूना) इसके अनेक कारण हो सकते हैं — कभी अवसर एवं संसाधनों का अभाव, कभी परिस्थितियाँ, कभी अत्यधिक विनम्रता एवं त्याग-भावना (वे जान-बूझकर दूसरों को आगे बढ़ाते हैं), तो कभी आत्म-प्रचार से दूरी। प्रतिभा होते हुए भी वे पृष्ठभूमि में रहकर दूसरों की सफलता में योगदान देना पसंद करते हैं — और यही उनकी मानवीयता है।