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क्षितिज पाठ 6: संगतकार

काव्य खंड · पाठ 6 (अंतिम) · क्षितिज भाग 2

हिन्दी (काव्य) · CBSE Class 10 · क्षितिज भाग 2 · मंगलेश डबराल · 25 क्विज़

संगतकार — कवि परिचय, पाठ-सार, भावार्थ एवं शब्दार्थ

कवि परिचय

मंगलेश डबराल (जन्म सन् 1948, काफलपानी, टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंड — निधन सन् 2020) की शिक्षा-दीक्षा देहरादून में हुई। वे अनेक पत्र-पत्रिकाओं (हिन्दी पेट्रियट, प्रतिपक्ष, पूर्वग्रह, जनसत्ता आदि) में संपादन से जुड़े रहे। उनके चार काव्य-संग्रह प्रकाशित हुए — पहाड़ पर लालटेन, घर का रास्ता, हम जो देखते हैं एवं आवाज़ भी एक जगह है। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार एवं पहल सम्मान मिला; एक अनुवादक के रूप में भी उनकी ख्याति है। उनकी कविताओं में सामंती बोध एवं पूँजीवादी छल-छद्म दोनों का प्रतिकार मिलता है — वह भी शोर-शराबे से नहीं, बल्कि एक सुंदर सपना रचकर। उनका सौंदर्यबोध सूक्ष्म एवं भाषा पारदर्शी है।

पाठ-परिचय

संगतकार कविता गायन में मुख्य गायक का साथ देने वाले संगतकार की भूमिका के महत्त्व पर विचार करती है। यह केवल नाटक, फ़िल्म, संगीत, नृत्य जैसी दृश्य-प्रस्तुतियों के लिए ही सही नहीं, बल्कि समाज एवं इतिहास में भी ऐसे अनेक प्रसंग हैं जहाँ नायक की सफलता में अनेक गुमनाम लोगों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कविता हममें यह संवेदनशीलता विकसित करती है कि इनमें से प्रत्येक का अपना-अपना महत्त्व है, और उनका सामने न आना उनकी कमज़ोरी नहीं, बल्कि मानवीयता है।

कविता का भावार्थ

कवि कहता है कि मुख्य गायक के चट्टान जैसे भारी स्वर का साथ देने वाली संगतकार की आवाज़ सुंदर, कमज़ोर एवं काँपती हुई होती है। वह मुख्य गायक का छोटा भाई है, या शिष्य, या पैदल चलकर सीखने आने वाला कोई दूर का रिश्तेदार — जो प्राचीन काल से मुख्य गायक की गरज में अपनी गूँज मिलाता आया है। जब गायक अंतरे की जटिल तानों के जंगल में खो जाता है या अपने ही सरगम को लाँघकर भटकने लगता है, तब संगतकार ही ‘स्थायी’ को सँभाले रखता है — मानो मुख्य गायक का पीछे छूटा सामान समेट रहा हो, उसे उसका नौसिखिया बचपन याद दिला रहा हो।

जब तारसप्तक में गायक का गला बैठने लगता है, प्रेरणा साथ छोड़ने लगती है, उत्साह अस्त होने लगता है और आवाज़ से राख जैसा कुछ गिरने लगता है — तभी संगतकार का स्वर मुख्य गायक को ढाँढ़स बँधाता है। कभी-कभी वह यों ही साथ दे देता है, यह बताने के लिए कि वह अकेला नहीं है और फिर से गाया जा सकता है। अंत में कवि कहता है कि संगतकार की आवाज़ में जो हिचक है या अपने स्वर को ऊँचा न उठाने की कोशिश है, उसे विफलता नहीं, उसकी मनुष्यता समझा जाना चाहिए।

शब्दार्थ

संगतकार = मुख्य गायक के साथ गाने या वाद्य बजाने वाला सहयोगी कलाकार; गरज = ऊँची गंभीर आवाज़; अंतरा = स्थायी/टेक को छोड़कर गीत का चरण; जटिल = कठिन; तान = संगीत में स्वर का विस्तार; नौसिखिया = जिसने अभी सीखना आरंभ किया हो; स्थायी = गीत की मुख्य टेक; तारसप्तक = मध्य सप्तक से ऊँचा सप्तक; राख जैसा कुछ गिरना = बुझता हुआ स्वर; ढाँढ़स बँधाना = तसल्ली/सांत्वना देना; अनहद = असीम ध्वनि।

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