नेताजी का चश्मा — लेखक परिचय, कहानी का सार, पात्र-परिचय एवं शब्दार्थ
लेखक परिचय
स्वयं प्रकाश (जन्म सन् 1947, इंदौर, म.प्र. — निधन सन् 2019) समकालीन कहानी के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर उन्होंने एक औद्योगिक प्रतिष्ठान में नौकरी की; उनका अधिकांश जीवन राजस्थान में बीता। वे ‘वसुधा’ पत्रिका के संपादन से जुड़े रहे। प्रमुख कहानी-संग्रह — सूरज कब निकलेगा, आएँगे अच्छे दिन भी, आदमी जात का आदमी, संधान; उपन्यास — बीच में विनय एवं ईंधन। मध्यवर्गीय जीवन के कुशल चितेरे स्वयं प्रकाश की कहानियों में वर्ग-शोषण के विरुद्ध चेतना तथा जाति, संप्रदाय एवं लिंग के भेदभाव के विरुद्ध प्रतिकार का स्वर है। उन्हें पहल सम्मान, बनमाली पुरस्कार आदि मिले।
पाठ-परिचय
केवल चारों ओर सीमाओं से घिरे भूभाग का नाम ही देश नहीं होता; देश बनता है उसमें रहने वाले सभी नागरिकों, नदियों, पहाड़ों, पेड़-पौधों एवं पशु-पक्षियों से। इन सबसे प्रेम करना ही देशभक्ति है। ‘नेताजी का चश्मा’ कहानी कैप्टन चश्मेवाले के माध्यम से देश के उन करोड़ों नागरिकों के योगदान को रेखांकित करती है जो देश के निर्माण में अपने-अपने तरीके से सहयोग करते हैं। कहानी यह भी कहती है कि इसमें केवल बड़े ही नहीं, बच्चे भी शामिल हैं।
कहानी का सार
हालदार साहब को कंपनी के काम से हर पंद्रहवें दिन एक कस्बे से गुज़रना पड़ता था। उस कस्बे के मुख्य चौराहे पर नगरपालिका ने नेताजी सुभाषचंद्र बोस की संगमरमर की मूर्ति लगवाई थी, जिसे स्थानीय ड्राइंग मास्टर मोतीलाल ने बनाया था। मूर्ति सुंदर थी, फौजी वर्दी में; केवल एक कमी थी — उसकी आँखों पर संगमरमर का नहीं, बल्कि एक असली चश्मा (चौड़ा काला फ्रेम) लगा था।
हर बार गुज़रते समय हालदार साहब देखते कि मूर्ति पर चश्मा बदल जाता है — कभी गोल, कभी चौकोर, कभी काला, कभी धूप का। पूछने पर पानवाले ने बताया कि ‘कैप्टन चश्मेवाला’ ऐसा करता है — वह एक लंगड़ा फेरीवाला है जो चश्मे बेचता है। जब कोई ग्राहक मूर्ति पर लगे फ्रेम जैसा चश्मा माँगता तो वह वह फ्रेम मूर्ति से उतारकर (नेताजी से क्षमा माँगते हुए) ग्राहक को दे देता और बाद में दूसरा फ्रेम लगा देता। नेताजी की बिना चश्मे वाली मूर्ति उसे आहत करती थी।
दो साल बाद एक दिन मूर्ति पर कोई चश्मा नहीं था और पानवाले ने उदास होकर बताया — ‘कैप्टन मर गया।’ हालदार साहब दुखी हुए, सोचते रहे कि कैसी कौम है जो अपने देशभक्तों पर हँसती है। पंद्रह दिन बाद फिर गुज़रते हुए उन्होंने तय किया कि आज रुकेंगे नहीं। पर आदत से मजबूर आँखें मूर्ति की ओर उठ गईं — और उन्होंने देखा कि मूर्ति की आँखों पर किसी बच्चे ने सरकंडे का छोटा-सा चश्मा बना कर रख दिया है। यह देखकर भावुक हालदार साहब की आँखें भर आईं — क्योंकि इससे पता चला कि देशभक्ति की भावना अभी जीवित है, नई पीढ़ी में भी।
पात्र-परिचय
हालदार साहब — संवेदनशील, देशभक्त एवं भावुक; छोटी-सी बात में निहित देश-भावना को पहचानने वाले। कैप्टन चश्मेवाला — बूढ़ा, लंगड़ा, गरीब फेरीवाला, पर सच्चा देशभक्त; नेताजी के प्रति अगाध श्रद्धा। पानवाला — काला, मोटा, खुशमिज़ाज, व्यंग्यप्रिय; पर भीतर से संवेदनशील। मास्टर मोतीलाल — कस्बे का इकलौता ड्राइंग मास्टर, जिसने मूर्ति बनाई।
शब्दार्थ
कस्बा = छोटा शहर; कौतुक = कुतूहल, आश्चर्य-मिश्रित आनंद; बस्ट = कंधे तक की मूर्ति; दुर्दमनीय = जिसे दबाया न जा सके; कौम = जाति, समुदाय; होम देना = न्योछावर/बलिदान कर देना; नतमस्तक = सिर झुकाना; मरियल = बहुत कमज़ोर; सरकंडा = एक पतली लकड़ी जैसी घास; द्रवित = भावुक होना; फेरी लगाना = घूम-घूमकर सामान बेचना।
प्रश्न-अभ्यास (सभी उत्तर — प्रश्न-अभ्यास + रचना-अभिव्यक्ति + भाषा-अध्ययन)
1सेनानी न होते हुए भी चश्मेवाले को लोग ‘कैप्टन’ क्यों कहते थे?
चश्मेवाला वास्तव में सेनानी नहीं, बल्कि एक बूढ़ा, लंगड़ा फेरीवाला था। फिर भी लोग उसे ‘कैप्टन’ इसलिए कहते थे क्योंकि उसमें नेताजी एवं देश के प्रति सच्ची देशभक्ति एवं श्रद्धा थी — वह नेताजी की मूर्ति पर चश्मा लगाकर उनका सम्मान करता था। कुछ लोग स्नेह से, तो कुछ व्यंग्य/मज़ाक में उसे ‘कैप्टन’ कहते थे।
2हालदार साहब ने ड्राइवर को पहले चौराहे पर गाड़ी रोकने से मना किया था, पर बाद में तुरंत रोकने को कहा — (क) पहले मायूस क्यों हुए? (ख) मूर्ति पर सरकंडे का चश्मा क्या उम्मीद जगाता है? (ग) इतनी-सी बात पर भावुक क्यों हुए?
(क) हालदार साहब इसलिए मायूस थे क्योंकि उन्हें पता चला कि कैप्टन मर गया और अब नेताजी की मूर्ति पर चश्मा लगाने वाला कोई न रहा; उन्हें लगा कि देशभक्ति की वह भावना समाप्त हो गई। (ख) मूर्ति पर रखा सरकंडे का चश्मा यह उम्मीद जगाता है कि देशभक्ति की भावना मरी नहीं है — नई पीढ़ी (बच्चे) भी इसमें शामिल है, और यह भावना पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रहेगी। (ग) एक छोटे बच्चे द्वारा बनाया सरकंडे का चश्मा देखकर उन्हें लगा कि देश-प्रेम की भावना अब भी जीवित है; इस छोटी-सी बात में निहित गहरी देश-भावना ने उनका हृदय छू लिया, इसलिए वे भावुक हो उठे।
3आशय स्पष्ट कीजिए — ‘बार-बार सोचते, क्या होगा उस कौम का जो अपने देश की खातिर घर-गृहस्थी-जवानी-ज़िंदगी सब कुछ होम देनेवालों पर भी हँसती है और अपने लिए बिकने के मौके ढूँढ़ती है।’
इस कथन में लेखक उस समाज/कौम पर गहरी चिंता एवं दुख व्यक्त करता है जो अपने देश के लिए घर, जवानी एवं जीवन तक न्योछावर कर देने वाले देशभक्तों/शहीदों का भी मज़ाक उड़ाती है, और स्वयं स्वार्थवश बिकने (अपना ईमान बेचने) के अवसर ढूँढ़ती रहती है। यह देशभक्ति के प्रति उदासीनता एवं नैतिक पतन की स्थिति है, जिस पर लेखक व्यथित है।
4पानवाले का एक रेखाचित्र प्रस्तुत कीजिए।
पानवाला एक काला, मोटा एवं खुशमिज़ाज आदमी था। उसके मुँह में हमेशा पान ठुँसा रहता; वह आँखों-ही-आँखों में हँसता और हँसते समय उसकी तोंद थिरकती थी। वह बातूनी एवं व्यंग्यप्रिय था, पर भीतर से संवेदनशील भी — कैप्टन की मृत्यु पर वह उदास होकर धोती के छोर से आँखें पोंछने लगा। इस प्रकार वह ऊपर से हँसमुख पर भीतर से भावुक व्यक्ति था।
5‘वो लंगड़ा क्या जाएगा फौज में। पागल है पागल!’ — कैप्टन के प्रति पानवाले की इस टिप्पणी पर अपनी प्रतिक्रिया लिखिए।
(नमूना) पानवाले की यह टिप्पणी असंवेदनशील एवं अनुचित है। कैप्टन शारीरिक रूप से भले ही लंगड़ा था, पर उसकी देशभक्ति-भावना किसी फौजी से कम नहीं थी। किसी की शारीरिक अक्षमता का मज़ाक उड़ाना गलत है। सच्ची देशभक्ति शरीर से नहीं, भावना एवं कर्म से होती है — इस दृष्टि से कैप्टन सच्चा देशभक्त था, पागल नहीं।
6रचना-अभिव्यक्ति: निम्नलिखित वाक्य पात्रों की किस विशेषता की ओर संकेत करते हैं? (क) हालदार साहब हमेशा चौराहे पर रुकते और नेताजी को निहारते। (ख) पानवाला उदास हो गया…‘कैप्टन मर गया।’ (ग) कैप्टन बार-बार मूर्ति पर चश्मा लगा देता था।
(क) हालदार साहब की देशभक्ति-भावना, संवेदनशीलता एवं जिज्ञासा की ओर। (ख) पानवाले की भीतरी संवेदनशीलता एवं भावुकता की ओर (ऊपर से हँसमुख पर भीतर कोमल)। (ग) कैप्टन की निरंतर देशभक्ति, नेताजी के प्रति श्रद्धा एवं निःस्वार्थ सेवा-भावना की ओर।
7जब तक हालदार साहब ने कैप्टन को साक्षात नहीं देखा था, तब तक उनके मानस-पटल पर उसका कौन-सा चित्र रहा होगा? अपनी कल्पना से लिखिए।
(नमूना) कैप्टन को देखने से पहले हालदार साहब के मन में एक रोबदार, स्वस्थ, अनुशासित एवं फौजी वर्दी पहने वीर सैनिक का चित्र रहा होगा — जैसे आज़ाद हिंद फौज का कोई जाँबाज़ कैप्टन। पर जब उन्होंने एक बूढ़ा, मरियल, लंगड़ा फेरीवाला देखा तो वे अवाक रह गए।
8रचना-अभिव्यक्ति: कस्बों, शहरों, महानगरों के चौराहों पर प्रसिद्ध व्यक्तियों की मूर्ति लगाने का प्रचलन-सा हो गया है — (क) उद्देश्य? (ख) अपने इलाके के चौराहे पर किसकी मूर्ति, क्यों? (ग) उस मूर्ति के प्रति उत्तरदायित्व?
(क) उद्देश्य — महापुरुषों के प्रति सम्मान प्रकट करना, उनकी स्मृति को जीवित रखना, नई पीढ़ी को प्रेरणा देना एवं स्थान की शोभा बढ़ाना। (ख) (छात्र स्वयं चुनें) — जैसे किसी स्वतंत्रता-सेनानी, समाज-सुधारक या वैज्ञानिक की, क्योंकि उनके आदर्श प्रेरणादायक हैं। (ग) उत्तरदायित्व — मूर्ति की स्वच्छता एवं रख-रखाव करना, उसका सम्मान करना एवं उसे किसी प्रकार की क्षति न पहुँचाना।
9रचना-अभिव्यक्ति: सीमा पर तैनात फौजी ही देश-प्रेम का परिचय नहीं देते; हम सभी अपने दैनिक कार्यों में देश-प्रेम प्रकट करते हैं। ऐसे और कार्यों का उल्लेख कीजिए।
ऐसे कार्य — सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान न पहुँचाना, पर्यावरण-संरक्षण (वृक्षारोपण, जल एवं बिजली की बचत), स्वच्छता बनाए रखना, ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाना, नियमों एवं कानून का पालन, स्वदेशी वस्तुओं को अपनाना, कर समय पर चुकाना एवं दूसरों की सहायता करना — ये सब अपने-अपने ढंग से देश-प्रेम के ही रूप हैं।
10भाषा-अध्ययन: निम्नलिखित पंक्तियों में स्थानीय बोली का प्रभाव है, इन्हें मानक हिन्दी में लिखिए — ‘कोई गिराक आ गया समझो। उसको चौड़े चौखट चाहिए। तो कैप्टन किदर से लाएगा? तो उसको मूर्तिवाला दे दिया। उदर दूसरा बिठा दिया।’
मानक हिन्दी: ‘मान लीजिए कोई ग्राहक आ गया। उसे चौड़े फ्रेम (चौखट) का चश्मा चाहिए। तो कैप्टन उसे कहाँ से लाएगा? तब वह मूर्ति पर लगा फ्रेम (उतारकर) उसे दे देता है, और उधर (मूर्ति पर) दूसरा फ्रेम लगा देता है।’
11‘भई खूब! क्या आइडिया है।’ — इस वाक्य को ध्यान में रखते हुए बताइए कि एक भाषा में दूसरी भाषा के शब्दों के आने से क्या लाभ होते हैं?
एक भाषा में दूसरी भाषा के शब्दों के आने से — (i) भाषा समृद्ध एवं सशक्त होती है; (ii) अभिव्यक्ति सहज, सरल एवं प्रभावशाली बनती है; (iii) नए शब्दों से भाषा का शब्द-भंडार बढ़ता है; (iv) संप्रेषण (बात कहना-समझना) आसान होता है; (v) भाषा लचीली एवं जीवंत बनी रहती है।
12भाषा-अध्ययन: निम्नलिखित वाक्यों से निपात छाँटिए — (क) नगरपालिका थी तो कुछ न कुछ करती भी रहती थी। (ख) किसी स्थानीय कलाकार को ही अवसर देने का निर्णय किया गया होगा। (ग) यानी चश्मा तो था लेकिन संगमरमर का नहीं था। (घ) हालदार साहब अब भी नहीं समझ पाए।
निपात (बल देने वाले अव्यय): (क) भी — ‘करती भी रहती थी’। (ख) ही — ‘कलाकार को ही’। (ग) तो — ‘चश्मा तो था’। (घ) भी — ‘अब भी’।
नए वाक्य: (क) वह भी आया। (ख) मैंने ही यह किया। (ग) तुम तो जानते ही हो। (घ) वह अब भी नहीं माना।
13भाषा-अध्ययन: निम्नलिखित वाक्यों को कर्मवाच्य में बदलिए।
(क) उसके द्वारा अपनी छोटी-सी दुकान में उपलब्ध गिने-चुने फ्रेमों में से नेताजी की मूर्ति पर एक फ्रेम फिट कर दिया जाता है। (ख) पानवाले द्वारा नया पान खाया जा रहा था। (ग) पानवाले द्वारा साफ बता दिया गया था। (घ) ड्राइवर द्वारा ज़ोर से ब्रेक मारा गया। (ङ) नेताजी द्वारा देश के लिए अपना सब कुछ त्याग दिया गया। (च) हालदार साहब द्वारा चश्मेवाले की देशभक्ति का सम्मान किया गया।
14भाषा-अध्ययन: निम्नलिखित वाक्यों को भाववाच्य में बदलिए।
(क) माँ से बैठा नहीं जाता। (ख) मुझसे देखा नहीं जाता। (ग) चलो, अब सोया जाए। (घ) माँ से रोया भी नहीं जाता।