यह दंतुरित मुसकान एवं फसल — कवि परिचय, पाठ-सार, भावार्थ एवं शब्दार्थ
कवि परिचय
नागार्जुन (जन्म सन् 1911, सतलखा, दरभंगा, बिहार — निधन सन् 1998) का मूल नाम वैद्यनाथ मिश्र था। मातृभाषा मैथिली में वे ‘यात्री’ नाम से प्रसिद्ध हैं। घुमक्कड़ एवं अक्खड़ स्वभाव के नागार्जुन सच्चे अर्थों में जनकवि थे; व्यंग्य में माहिर होने के कारण उन्हें ‘आधुनिक कबीर’ भी कहा जाता है। प्रमुख काव्य-कृतियाँ — युगधारा, सतरंगे पंखों वाली, हज़ार-हज़ार बाँहों वाली, तुमने कहा था, पुरानी जूतियों का कोरस आदि। मैथिली कविता के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। वे भ्रष्टाचार, राजनीतिक स्वार्थ एवं समाज की पतनशील स्थितियों के प्रति सजग रहे।
पाठ-परिचय
यह दंतुरित मुसकान कविता में एक छोटे बच्चे की मनोहारी दंतुरित (नए दाँतों वाली) मुसकान देखकर कवि के मन में उमड़ते वात्सल्य-भाव अनेक बिंबों के माध्यम से व्यक्त हुए हैं। कवि मानता है कि इस सुंदरता में ही जीवन का संदेश है — यह ऐसी है कि कठोर से कठोर मन भी पिघल जाए। फसल कविता बताती है कि फसल केवल अन्न नहीं, बल्कि नदियों के पानी, असंख्य हाथों के श्रम, हज़ारों खेतों की मिट्टी, सूरज की किरणों एवं हवा के सहयोग का परिणाम है — अर्थात् प्रकृति एवं मनुष्य के सहयोग से ही सृजन संभव है। यह कविता हमें उपभोक्ता-संस्कृति के दौर में कृषि-संस्कृति के निकट ले जाती है।
कविताओं का भावार्थ
यह दंतुरित मुसकान — कवि कहता है कि तुम्हारी यह दंतुरित मुसकान मृतक में भी जान डाल देगी। धूल-धूसरित तुम्हारे अंग ऐसे लगते हैं मानो तालाब छोड़कर कमल के फूल कवि की झोंपड़ी में खिल उठे हों। तुम्हारा स्पर्श पाकर मानो कठोर पत्थर भी पिघलकर जल बन गया; तुम्हारे छूते ही बबूल जैसे कठोर पेड़ से भी शेफालिका के फूल झरने लगे। बच्चा कवि को पहचानता नहीं, अनिमेष (एकटक) देखता रहता है। कवि कहता है — धन्य हो तुम, तुम्हारी माँ भी धन्य! यदि माँ माध्यम न बनती तो कवि यह मुसकान देख एवं जान न पाता। आँखें चार होने पर वह दंतुरित मुसकान और भी छविमान (सुंदर) लगती है।
फसल — कवि प्रश्न करता है — फसल क्या है? वह एक-दो नहीं, बल्कि ढेर सारी नदियों के पानी का जादू है; एक-दो नहीं, लाख-लाख करोड़-करोड़ हाथों के स्पर्श की गरिमा है; हज़ार-हज़ार खेतों की मिट्टी का गुण-धर्म है। फसल और कुछ नहीं — वह नदियों के पानी का जादू, हाथों के स्पर्श की महिमा, भूरी-काली-सँदली मिट्टी का गुण-धर्म, सूरज की किरणों का रूपांतर एवं हवा की थिरकन का सिमटा हुआ संकोच है। अर्थात् फसल प्रकृति एवं मानव-श्रम के सहयोग की देन है।
शब्दार्थ
दंतुरित = बच्चों के नए-नए दाँत; धूलि-धूसर गात = धूल-मिट्टी से सने अंग; जलजात = कमल का फूल; अनिमेष = बिना पलक झपकाए लगातार देखना; इतर = दूसरा; मधुपर्क = दही, घी, शहद, जल व दूध का योग (यहाँ माँ के प्यार का प्रतीक); कनखी = तिरछी निगाह से देखना; छविमान = सुंदर; गरिमा/महिमा = महत्ता, गौरव; रूपांतर = बदला हुआ रूप; थिरकन = गति, नृत्य।
प्रश्न-अभ्यास (सभी उत्तर)
यह दंतुरित मुसकान (प्रश्न 1-7) एवं फसल (प्रश्न 1-5)
दंतुरित-1बच्चे की दंतुरित मुसकान का कवि के मन पर क्या प्रभाव पड़ता है?
बच्चे की दंतुरित मुसकान कवि के मन को गहराई तक प्रभावित करती है। यह इतनी मनोहारी एवं जीवनदायी है कि ‘मृतक में भी जान डाल देगी’; कठोर से कठोर पत्थर-सा हृदय भी पिघलकर जल बन जाता है। कवि आनंद-विभोर एवं वात्सल्य-भाव से भर उठता है और उसका नीरस जीवन मानो खिल उठता है।
दंतुरित-2बच्चे की मुसकान और एक बड़े व्यक्ति की मुसकान में क्या अंतर है?
बच्चे की मुसकान निश्छल, सहज, निष्कपट एवं पवित्र होती है, जो सीधे हृदय को छू लेती है और उसमें कोई स्वार्थ या बनावट नहीं होती। इसके विपरीत बड़े व्यक्ति की मुसकान में प्रायः औपचारिकता, बनावट या स्वार्थ हो सकता है। बच्चे की मुसकान स्वाभाविक एवं हृदय से उपजी होती है, बड़ों की कई बार कृत्रिम।
दंतुरित-3कवि ने बच्चे की मुसकान के सौंदर्य को किन-किन बिंबों के माध्यम से व्यक्त किया है?
कवि ने अनेक सुंदर बिंब प्रयोग किए हैं — (i) झोंपड़ी में खिलते कमल के फूल (जलजात); (ii) झरते शेफालिका के फूल; (iii) पत्थर का पिघलकर जल बन जाना; (iv) माँ की उँगलियों का मधुपर्क कराना; (v) बच्चे का कनखी मारना। इन बिंबों से बच्चे की मुसकान का कोमल एवं मोहक सौंदर्य व्यक्त हुआ है।
दंतुरित-4भाव स्पष्ट कीजिए — (क) ‘छोड़कर तालाब मेरी झोंपड़ी में खिल रहे जलजात।’ (ख) ‘छू गया तुमसे कि झरने लग पड़े शेफालिका के फूल / बाँस था कि बबूल?’
(क) बच्चे के धूल-धूसरित कोमल अंग कवि को ऐसे लगते हैं मानो तालाब छोड़कर कमल के फूल उसकी गरीब झोंपड़ी में आकर खिल उठे हों — अर्थात् कीचड़/धूल में भी बच्चे की सुंदरता कमल-सी निर्मल है। (ख) बच्चे के स्पर्श ने कवि के नीरस, कठोर एवं जड़ जीवन को ऐसे खिला दिया मानो बबूल जैसे कठोर पेड़ से भी शेफालिका के कोमल फूल झरने लगे हों — स्पर्श ने जड़ता में नवजीवन एवं कोमलता भर दी।
दंतुरित-5रचना-अभिव्यक्ति: मुसकान और क्रोध भिन्न-भिन्न भाव हैं। इनकी उपस्थिति से बने वातावरण की भिन्नता का चित्रण कीजिए।
(नमूना) मुसकान से वातावरण स्नेहिल, मधुर, सौहार्दपूर्ण एवं आनंदमय हो जाता है; मन खिल उठता है और सब ओर अपनापन छा जाता है। इसके विपरीत क्रोध से वातावरण तनावपूर्ण, कटु, भयपूर्ण एवं बोझिल बन जाता है; संबंधों में दूरी एवं कड़वाहट आ जाती है। अतः मुसकान जोड़ती है, क्रोध तोड़ता है।
दंतुरित-6दंतुरित मुसकान से बच्चे की उम्र का अनुमान लगाइए और तर्क सहित उत्तर दीजिए।
बच्चे की उम्र लगभग आठ-नौ महीने से एक वर्ष के बीच होगी। तर्क — (i) उसके नए-नए दाँत आए हैं (इसलिए ‘दंतुरित’); (ii) वह कवि को पहचान नहीं पाता (पहली बार देख रहा है); (iii) माँ के माध्यम से ही उसका परिचय संभव हुआ — ये सब इसी छोटी उम्र के लक्षण हैं।
दंतुरित-7बच्चे से कवि की मुलाकात का जो शब्द-चित्र उपस्थित हुआ है, उसे अपने शब्दों में लिखिए।
(नमूना) धूल-मिट्टी से सना एक नन्हा बच्चा अपनी नए दाँतों वाली मुसकान बिखेर रहा है। वह कवि को पहचानता नहीं, फिर भी एकटक (अनिमेष) उसे देखता है, कभी कनखी मारता है। जब दोनों की आँखें चार होती हैं तो उसकी मुसकान और भी छविमान हो उठती है। माँ उसे प्यार से सँभाले है — यह दृश्य वात्सल्य एवं कोमलता से भरा है। (छात्र विस्तार दें।)
फसल-1कवि के अनुसार फसल क्या है?
कवि के अनुसार फसल केवल अन्न नहीं है। वह ढेर सारी नदियों के पानी का जादू, लाखों-करोड़ों हाथों के स्पर्श/श्रम की गरिमा, हज़ार-हज़ार खेतों की मिट्टी का गुण-धर्म, सूरज की किरणों का रूपांतर एवं हवा की थिरकन का सिमटा हुआ संकोच है — अर्थात् फसल प्रकृति एवं मानव-श्रम के सहयोग का परिणाम है।
फसल-2कविता में फसल उगाने के लिए आवश्यक तत्वों की बात कही गई है। वे आवश्यक तत्व कौन-कौन से हैं?
फसल उगाने के लिए आवश्यक तत्व हैं — (i) अनेक नदियों का पानी; (ii) लाखों-करोड़ों किसानों के हाथों का श्रम/स्पर्श; (iii) हज़ारों खेतों की मिट्टी का गुण-धर्म; (iv) सूरज की किरणें (ताप एवं प्रकाश); (v) हवा। इन सबके सहयोग से ही फसल तैयार होती है।
फसल-3फसल को ‘हाथों के स्पर्श की गरिमा’ और ‘महिमा’ कहकर कवि क्या व्यक्त करना चाहता है?
इससे कवि किसानों एवं मेहनतकश मनुष्यों के परिश्रम का सम्मान एवं महत्त्व व्यक्त करना चाहता है। वह बताना चाहता है कि फसल किसी एक-दो व्यक्ति की नहीं, बल्कि असंख्य हाथों की कठोर मेहनत का फल है। इस प्रकार वह श्रम की गरिमा एवं महिमा को रेखांकित करता है।
फसल-4भाव स्पष्ट कीजिए — ‘रूपांतर है सूरज की किरणों का / सिमटा हुआ संकोच है हवा की थिरकन का!’
कवि कहता है कि फसल वस्तुतः सूरज की किरणों का रूपांतरित रूप है — अर्थात् सूर्य की ऊर्जा ही पौधों में बदलकर फसल बन जाती है। साथ ही यह हवा की थिरकन (गति) का सिमटा-सँकोचा रूप है — अर्थात् बहती हवा की शक्ति भी फसल में समा जाती है। इस प्रकार प्रकृति के तत्व (सूर्य, वायु) ही रूप बदलकर फसल में उपस्थित हैं।
फसल-5रचना-अभिव्यक्ति: कवि ने फसल को ‘मिट्टी का गुण-धर्म’ कहा है — (क) मिट्टी का गुण-धर्म कैसे परिभाषित करेंगे? (ख) वर्तमान जीवन-शैली उसे कैसे प्रभावित करती है? (ग) मिट्टी द्वारा गुण-धर्म छोड़ने पर जीवन की कल्पना? (घ) उसे पोषित करने में हमारी भूमिका?
(क) मिट्टी का गुण-धर्म अर्थात् उसकी उर्वरता एवं जीवनदायिनी शक्ति — पौधों को पोषण देकर अन्न उपजाने की क्षमता। (ख) वर्तमान जीवन-शैली — अत्यधिक रासायनिक खाद-कीटनाशक, प्रदूषण, कंक्रीट एवं वनों की कटाई — मिट्टी की उर्वरता नष्ट करती है। (ग) यदि मिट्टी अपना गुण-धर्म छोड़ दे तो फसल ही न उगेगी और किसी भी प्रकार के जीवन की कल्पना असंभव हो जाएगी। (घ) हमारी भूमिका — जैविक खेती, वृक्षारोपण, रसायनों का कम प्रयोग एवं मिट्टी-संरक्षण द्वारा उसके गुण-धर्म को पोषित करना।