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क्षितिज पाठ 5: यह दंतुरित मुसकान / फसल

काव्य खंड · पाठ 5 · क्षितिज भाग 2

हिन्दी (काव्य) · CBSE Class 10 · क्षितिज भाग 2 · नागार्जुन · 25 क्विज़

यह दंतुरित मुसकान एवं फसल — कवि परिचय, पाठ-सार, भावार्थ एवं शब्दार्थ

कवि परिचय

नागार्जुन (जन्म सन् 1911, सतलखा, दरभंगा, बिहार — निधन सन् 1998) का मूल नाम वैद्यनाथ मिश्र था। मातृभाषा मैथिली में वे ‘यात्री’ नाम से प्रसिद्ध हैं। घुमक्कड़ एवं अक्खड़ स्वभाव के नागार्जुन सच्चे अर्थों में जनकवि थे; व्यंग्य में माहिर होने के कारण उन्हें ‘आधुनिक कबीर’ भी कहा जाता है। प्रमुख काव्य-कृतियाँ — युगधारा, सतरंगे पंखों वाली, हज़ार-हज़ार बाँहों वाली, तुमने कहा था, पुरानी जूतियों का कोरस आदि। मैथिली कविता के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। वे भ्रष्टाचार, राजनीतिक स्वार्थ एवं समाज की पतनशील स्थितियों के प्रति सजग रहे।

पाठ-परिचय

यह दंतुरित मुसकान कविता में एक छोटे बच्चे की मनोहारी दंतुरित (नए दाँतों वाली) मुसकान देखकर कवि के मन में उमड़ते वात्सल्य-भाव अनेक बिंबों के माध्यम से व्यक्त हुए हैं। कवि मानता है कि इस सुंदरता में ही जीवन का संदेश है — यह ऐसी है कि कठोर से कठोर मन भी पिघल जाए। फसल कविता बताती है कि फसल केवल अन्न नहीं, बल्कि नदियों के पानी, असंख्य हाथों के श्रम, हज़ारों खेतों की मिट्टी, सूरज की किरणों एवं हवा के सहयोग का परिणाम है — अर्थात् प्रकृति एवं मनुष्य के सहयोग से ही सृजन संभव है। यह कविता हमें उपभोक्ता-संस्कृति के दौर में कृषि-संस्कृति के निकट ले जाती है।

कविताओं का भावार्थ

यह दंतुरित मुसकान — कवि कहता है कि तुम्हारी यह दंतुरित मुसकान मृतक में भी जान डाल देगी। धूल-धूसरित तुम्हारे अंग ऐसे लगते हैं मानो तालाब छोड़कर कमल के फूल कवि की झोंपड़ी में खिल उठे हों। तुम्हारा स्पर्श पाकर मानो कठोर पत्थर भी पिघलकर जल बन गया; तुम्हारे छूते ही बबूल जैसे कठोर पेड़ से भी शेफालिका के फूल झरने लगे। बच्चा कवि को पहचानता नहीं, अनिमेष (एकटक) देखता रहता है। कवि कहता है — धन्य हो तुम, तुम्हारी माँ भी धन्य! यदि माँ माध्यम न बनती तो कवि यह मुसकान देख एवं जान न पाता। आँखें चार होने पर वह दंतुरित मुसकान और भी छविमान (सुंदर) लगती है।

फसल — कवि प्रश्न करता है — फसल क्या है? वह एक-दो नहीं, बल्कि ढेर सारी नदियों के पानी का जादू है; एक-दो नहीं, लाख-लाख करोड़-करोड़ हाथों के स्पर्श की गरिमा है; हज़ार-हज़ार खेतों की मिट्टी का गुण-धर्म है। फसल और कुछ नहीं — वह नदियों के पानी का जादू, हाथों के स्पर्श की महिमा, भूरी-काली-सँदली मिट्टी का गुण-धर्म, सूरज की किरणों का रूपांतर एवं हवा की थिरकन का सिमटा हुआ संकोच है। अर्थात् फसल प्रकृति एवं मानव-श्रम के सहयोग की देन है।

शब्दार्थ

दंतुरित = बच्चों के नए-नए दाँत; धूलि-धूसर गात = धूल-मिट्टी से सने अंग; जलजात = कमल का फूल; अनिमेष = बिना पलक झपकाए लगातार देखना; इतर = दूसरा; मधुपर्क = दही, घी, शहद, जल व दूध का योग (यहाँ माँ के प्यार का प्रतीक); कनखी = तिरछी निगाह से देखना; छविमान = सुंदर; गरिमा/महिमा = महत्ता, गौरव; रूपांतर = बदला हुआ रूप; थिरकन = गति, नृत्य।

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