हिन्दी (काव्य) · CBSE Class 10 · क्षितिज भाग 2 · सूर्यकांत त्रिपाठी निराला · 25 क्विज़
उत्साह एवं अट नहीं रही है — कवि परिचय, पाठ-सार, भावार्थ एवं शब्दार्थ
कवि परिचय
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ (जन्म सन् 1899, महिषादल, बंगाल — निधन सन् 1961) छायावाद के प्रमुख कवि थे। मूलतः गढ़ाकोला (उन्नाव, उ.प्र.) के निवासी निराला ने स्वाध्याय से संस्कृत, बांग्ला व अंग्रेज़ी का ज्ञान अर्जित किया; रामकृष्ण परमहंस एवं विवेकानंद की विचारधारा का उन पर गहरा प्रभाव पड़ा। उनका जीवन दुखों एवं संघर्षों से भरा रहा। प्रमुख काव्य-रचनाएँ — अनामिका, परिमल, गीतिका, कुकुरमुत्ता एवं नए पत्ते। वे विद्रोही स्वभाव के कवि थे; छायावादियों में उन्होंने सबसे पहले मुक्त छंद का प्रयोग किया। उनकी कविता में दार्शनिकता, विद्रोह, क्रांति, प्रेम की तरलता एवं प्रकृति का विराट चित्र मिलता है।
पाठ-परिचय
उत्साह एक आह्वान गीत है जो बादल को संबोधित है। कविता में बादल एक ओर पीड़ित-प्यासे जन की आकांक्षा पूरी करने वाला है, तो दूसरी ओर नई कल्पना एवं नए अंकुर के लिए विध्वंस, विप्लव एवं क्रांति-चेतना को संभव करने वाला भी। कवि जीवन को व्यापक एवं समग्र दृष्टि से देखता है; कविता में ललित कल्पना और क्रांति-चेतना दोनों हैं। अट नहीं रही है कविता फागुन की मादकता एवं सर्वव्यापी सुंदरता को प्रकट करती है। जब मन प्रसन्न हो तो हर ओर फागुन का ही सौंदर्य एवं उल्लास दिखाई देता है। सुंदर शब्द-चयन एवं लय ने कविता को भी फागुन की तरह सुंदर बना दिया है।
कविताओं का भावार्थ
उत्साह — कवि बादल से गरजने का आह्वान करता है — ‘घेर-घेर घोर गगन, धाराधर ओ!’ वह बादल को ललित, काले, घुँघराले, बाल-कल्पना-से पाले तथा हृदय में बिजली की छवि लिए ‘नवजीवन वाले कवि’ कहता है। वह चाहता है कि बादल अपने भीतर छिपे ओज से फिर से नूतन कविता भर दे। संसार के गर्मी (निदाघ) से तप्त, विकल एवं उदास जन के लिए वह अज्ञात-अनंत दिशा से आए घन तप्त धरती को जल से शीतल कर दें — यही आह्वान है। यहाँ गरजना केवल वर्षा नहीं, क्रांति एवं नव-निर्माण का प्रतीक है।
अट नहीं रही है — कवि कहता है कि फागुन की आभा तन में समा (अट) नहीं रही, न लिपट (सट) पा रही है — इतनी व्यापक है। यह कहीं साँस लेती है, घर-घर को भर देती है, नभ में उड़ने के लिए मानो पंख दे देती है; कवि आँख हटाना चाहे तो आँख हट ही नहीं रही। पत्तों से लदी डालें कहीं हरी कहीं लाल हैं, कहीं मंद-सुगंधित पुष्प-मालाएँ हैं; जगह-जगह (पाट-पाट) फैली शोभा-श्री समा (पट) नहीं रही। सारा वातावरण फागुन के सौंदर्य एवं उल्लास से भर उठा है।
शब्दार्थ
धाराधर = बादल; उन्मन = अनमनापन, कहीं मन न टिकना; निदाघ = गर्मी; सकल = सब, सारे; आभा = चमक; ओज = कठोर/भीषण, बल; अट = समाना, प्रविष्ट होना; सट = लिपटना; पर-पर = पंख-पंख; पाट-पाट = जगह-जगह; शोभा-श्री = सौंदर्य से भरपूर; पट = समा नहीं रही; विकल = व्याकुल, बेचैन।
प्रश्न-अभ्यास (सभी उत्तर)
उत्साह (प्रश्न 1-5) एवं अट नहीं रही है (प्रश्न 1-6)
उत्साह-1कवि बादल से फुहार, रिमझिम या बरसने के स्थान पर ‘गरजने’ के लिए कहता है, क्यों?
क्योंकि ‘गरजना’ केवल कोमल वर्षा का नहीं, बल्कि क्रांति, उत्साह, जोश एवं विध्वंस-विप्लव का प्रतीक है। गरजन में आह्वान एवं परिवर्तन की प्रचंड शक्ति है जो पीड़ित-सोए हुए जन में नई चेतना एवं आशा जगाती है। फुहार या रिमझिम में वह ओज एवं क्रांति-भाव नहीं; इसलिए कवि पुराने को तोड़कर नव-निर्माण करने वाली ‘गरजन’ चाहता है।
उत्साह-2कविता का शीर्षक ‘उत्साह’ क्यों रखा गया है?
क्योंकि यह एक आह्वान गीत है जो बादल के माध्यम से उत्साह, जोश, उमंग एवं क्रांति-चेतना जगाता है। पूरी कविता में ऊर्जा, नव-निर्माण एवं परिवर्तन का स्वर गूँजता है; कवि निराश-तप्त जन में नवजीवन का उत्साह भरना चाहता है — इसी भाव के अनुरूप शीर्षक ‘उत्साह’ सार्थक है।
उत्साह-3कविता में बादल किन-किन अर्थों की ओर संकेत करता है?
बादल अनेक अर्थों की ओर संकेत करता है — (i) पीड़ित-प्यासे जन की आकांक्षा पूरी करने वाला (जल देने वाला); (ii) नई कल्पना, नूतन कविता एवं नवजीवन का स्रोत; (iii) पुराने को तोड़कर नए का सृजन करने वाली विध्वंस-विप्लव एवं क्रांति-चेतना; (iv) कवि-हृदय एवं उसकी सृजन-शक्ति का प्रतीक।
उत्साह-4‘नाद-सौंदर्य’ क्या है? ‘उत्साह’ कविता में से नाद-सौंदर्य वाले शब्द छाँटकर लिखिए।
जिन शब्दों के प्रयोग से कविता में ध्वन्यात्मक (ध्वनि-जनित) प्रभाव उत्पन्न हो, उसे नाद-सौंदर्य कहते हैं। इस कविता में नाद-सौंदर्य वाले शब्द — ‘घेर-घेर घोर गगन’, ‘ललित-ललित’, ‘विकल-विकल’, ‘उन्मन-उन्मन’, ‘धाराधर’, ‘बाल कल्पना के-से पाले’ आदि; इनमें शब्दों की आवृत्ति एवं ध्वनि से विशेष संगीतात्मकता आती है।
उत्साह-5रचना-अभिव्यक्ति: किसी प्राकृतिक सौंदर्य को देखकर अपने उमड़ते भावों को कविता में उतारिए।
(छात्र स्वयं करें।) जैसे बादल उमड़-घुमड़कर बरसते हैं, वैसे ही किसी प्राकृतिक दृश्य (वर्षा, सूर्योदय, नदी, पर्वत आदि) को देखकर मन में उमड़ते भावों को सरल, लयात्मक पंक्तियों में अभिव्यक्त कीजिए।
अट-1छायावाद की एक खास विशेषता है अंतर्मन के भावों का बाहर की दुनिया से सामंजस्य। कविता की किन पंक्तियों से यह धारणा पुष्ट होती है?
यह धारणा इन पंक्तियों से पुष्ट होती है — ‘कहीं साँस लेते हो, घर-घर भर देते हो’ तथा ‘आँख हटाता हूँ तो हट नहीं रही है’। यहाँ फागुन का बाहरी सौंदर्य कवि के अंतर्मन में भी रच-बस गया है — बाहर की प्रकृति और भीतर के भाव एक हो गए हैं, जो छायावाद की विशेषता है।
अट-2कवि की आँख फागुन की सुंदरता से क्यों नहीं हट रही है?
क्योंकि फागुन का सौंदर्य इतना सर्वव्यापी एवं मनमोहक है कि वह हर ओर छाया हुआ है। कवि का मन प्रसन्न है, इसलिए उसे चारों ओर वही सुंदरता दिखाई देती है और वह उसमें पूरी तरह डूब गया है — लाख चाहने पर भी उसकी आँख इस सौंदर्य से हट नहीं पाती।
अट-3प्रस्तुत कविता में कवि ने प्रकृति की व्यापकता का वर्णन किन-किन रूपों में किया है?
कवि ने प्रकृति की व्यापकता इन रूपों में दिखाई है — पत्तों से लदी डालें (कहीं हरी, कहीं लाल), मंद सुगंध वाली पुष्प-मालाएँ, घर-घर में भरती सुगंध/साँस, नभ में उड़ने के मानो पंख, तथा जगह-जगह (पाट-पाट) फैली शोभा-श्री जो समा ही नहीं रही।
अट-4फागुन में ऐसा क्या होता है जो बाकी ऋतुओं से भिन्न होता है?
फागुन (वसंत) में प्रकृति का सर्वव्यापी एवं मादक सौंदर्य होता है — नई कोंपलें, रंग-बिरंगे फूल, मंद सुगंध, हरियाली, उल्लास एवं मस्ती। यह ऋतु प्रकृति को नवजीवन, रंग एवं उमंग से भर देती है; यही सर्वत्र छाया सौंदर्य एवं मादकता इसे अन्य ऋतुओं से भिन्न बनाती है।
अट-5इन कविताओं के आधार पर निराला के काव्य-शिल्प की विशेषताएँ लिखिए।
निराला के काव्य-शिल्प की विशेषताएँ — (i) मुक्त छंद का प्रयोग (छायावादियों में सर्वप्रथम); (ii) शब्दों का लयात्मक एवं नाद-सौंदर्ययुक्त प्रयोग; (iii) सुंदर बिंब एवं चित्रात्मकता; (iv) शब्द-आवृत्ति एवं मानवीकरण; (v) भाषा की सरलता, प्रवाह एवं नवीन प्रयोग; (vi) कल्पना के साथ क्रांति-चेतना का संयोग।
अट-6रचना-अभिव्यक्ति: होली के आसपास प्रकृति में जो परिवर्तन दिखाई देते हैं, उन्हें लिखिए।
(नमूना) होली के आसपास वसंत अपने पूर्ण यौवन पर होता है — आमों में बौर आ जाते हैं, टेसू (पलाश) एवं रंग-बिरंगे फूल खिल उठते हैं, खेतों में सरसों लहलहाती है, मंद-सुगंधित पवन बहती है, और चारों ओर हरियाली, रंग एवं उल्लास छा जाता है। (छात्र विस्तार दें।)