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क्षितिज पाठ 4: उत्साह / अट नहीं रही है

काव्य खंड · पाठ 4 · क्षितिज भाग 2

हिन्दी (काव्य) · CBSE Class 10 · क्षितिज भाग 2 · सूर्यकांत त्रिपाठी निराला · 25 क्विज़

उत्साह एवं अट नहीं रही है — कवि परिचय, पाठ-सार, भावार्थ एवं शब्दार्थ

कवि परिचय

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ (जन्म सन् 1899, महिषादल, बंगाल — निधन सन् 1961) छायावाद के प्रमुख कवि थे। मूलतः गढ़ाकोला (उन्नाव, उ.प्र.) के निवासी निराला ने स्वाध्याय से संस्कृत, बांग्ला व अंग्रेज़ी का ज्ञान अर्जित किया; रामकृष्ण परमहंस एवं विवेकानंद की विचारधारा का उन पर गहरा प्रभाव पड़ा। उनका जीवन दुखों एवं संघर्षों से भरा रहा। प्रमुख काव्य-रचनाएँ — अनामिका, परिमल, गीतिका, कुकुरमुत्ता एवं नए पत्ते। वे विद्रोही स्वभाव के कवि थे; छायावादियों में उन्होंने सबसे पहले मुक्त छंद का प्रयोग किया। उनकी कविता में दार्शनिकता, विद्रोह, क्रांति, प्रेम की तरलता एवं प्रकृति का विराट चित्र मिलता है।

पाठ-परिचय

उत्साह एक आह्वान गीत है जो बादल को संबोधित है। कविता में बादल एक ओर पीड़ित-प्यासे जन की आकांक्षा पूरी करने वाला है, तो दूसरी ओर नई कल्पना एवं नए अंकुर के लिए विध्वंस, विप्लव एवं क्रांति-चेतना को संभव करने वाला भी। कवि जीवन को व्यापक एवं समग्र दृष्टि से देखता है; कविता में ललित कल्पना और क्रांति-चेतना दोनों हैं। अट नहीं रही है कविता फागुन की मादकता एवं सर्वव्यापी सुंदरता को प्रकट करती है। जब मन प्रसन्न हो तो हर ओर फागुन का ही सौंदर्य एवं उल्लास दिखाई देता है। सुंदर शब्द-चयन एवं लय ने कविता को भी फागुन की तरह सुंदर बना दिया है।

कविताओं का भावार्थ

उत्साह — कवि बादल से गरजने का आह्वान करता है — ‘घेर-घेर घोर गगन, धाराधर ओ!’ वह बादल को ललित, काले, घुँघराले, बाल-कल्पना-से पाले तथा हृदय में बिजली की छवि लिए ‘नवजीवन वाले कवि’ कहता है। वह चाहता है कि बादल अपने भीतर छिपे ओज से फिर से नूतन कविता भर दे। संसार के गर्मी (निदाघ) से तप्त, विकल एवं उदास जन के लिए वह अज्ञात-अनंत दिशा से आए घन तप्त धरती को जल से शीतल कर दें — यही आह्वान है। यहाँ गरजना केवल वर्षा नहीं, क्रांति एवं नव-निर्माण का प्रतीक है।

अट नहीं रही है — कवि कहता है कि फागुन की आभा तन में समा (अट) नहीं रही, न लिपट (सट) पा रही है — इतनी व्यापक है। यह कहीं साँस लेती है, घर-घर को भर देती है, नभ में उड़ने के लिए मानो पंख दे देती है; कवि आँख हटाना चाहे तो आँख हट ही नहीं रही। पत्तों से लदी डालें कहीं हरी कहीं लाल हैं, कहीं मंद-सुगंधित पुष्प-मालाएँ हैं; जगह-जगह (पाट-पाट) फैली शोभा-श्री समा (पट) नहीं रही। सारा वातावरण फागुन के सौंदर्य एवं उल्लास से भर उठा है।

शब्दार्थ

धाराधर = बादल; उन्मन = अनमनापन, कहीं मन न टिकना; निदाघ = गर्मी; सकल = सब, सारे; आभा = चमक; ओज = कठोर/भीषण, बल; अट = समाना, प्रविष्ट होना; सट = लिपटना; पर-पर = पंख-पंख; पाट-पाट = जगह-जगह; शोभा-श्री = सौंदर्य से भरपूर; पट = समा नहीं रही; विकल = व्याकुल, बेचैन।

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