ସାଧାରଣତଃ ଧାତୁରୂପ ବା କ୍ରିୟାପଦକୁ ‘ତିଙନ୍ତ’ କୁହାଯାଏ। ମୂଳଧାତୁ (ପ୍ରକୃତି)ରେ शतृ, शानच्, क्त, क्तवतु, क्त्वा, ल्यप्, तुमुन्, घञ्, अल्, क्तिन्, ल्युट् ଭଳି “କୃତ୍” ପ୍ରତ୍ୟୟ ଯୋଗ କରି ଯେଉଁ ନୂତନ ଶବ୍ଦ ସୃଷ୍ଟି ହୁଏ ତାହାକୁ କୃଦନ୍ତ କୁହାଯାଏ — ଅର୍ଥାତ୍ ‘କୃତ୍’ ଯାହାର ‘ଅନ୍ତ’ (ଶେଷ)ରେ। ଯଥା — गम् + ल्युट् = गमनम्, पठ् + क्त्वा = पठित्वा। ଏହି ଶବ୍ଦଗୁଡ଼ିକ ବାକ୍ୟରେ ବିଶେଷ୍ୟ, ବିଶେଷଣ, ଅବ୍ୟୟ, ଅସମାପିକା ବା ସମାପିକା କ୍ରିୟାରୂପେ ବ୍ୟବହୃତ ହୁଅନ୍ତି।
ଏହି ଅଧ୍ୟାୟର ପ୍ରତ୍ୟୟଗୁଡ଼ିକ: शतृ · शानच् · क्त्वा · ल्यप् · तुमुन् · क्तिन् · ल्युट् · घञ् · क्त · क्तवतु · तव्य · अनीय — ପ୍ରତ୍ୟେକର ନିୟମ ଓ ଉଦାହରଣ ତଳେ।
୧. ଶତୃ (अत्) ଓ ଶାନଚ୍ (आन/मान/ईन)
शतृକର୍ତୃବାଚ୍ୟରେ ବର୍ତ୍ତମାନ କାଳରେ ପରସ୍ମୈପଦୀ ଧାତୁରେ ‘शतृ’ (अत्) ଲାଗେ। ଲଟ୍ଲକାର ପ୍ରଥମ ପୁରୁଷ ବହୁବଚନର ‘न्ति/ति’ କାଢ଼ି ‘त्’ କଲେ ଶତୃ ମୂଳ କୃଦନ୍ତ ପଦ ହୁଏ।
गच्छन्ति → गच्छत् (गम्+शतृ)
ददति → ददत् (दा+शतृ)
बिभ्यति → बिभ्यत् (भी+शतृ)
पश्यन्ति → पश्यत् (दृश्+शतृ)
ଶତୃ ପଦ ବିଶେଷଣ — ବିଶେଷ୍ୟର ଲିଙ୍ଗ-ବିଭକ୍ତି-ବଚନ ଅନୁସାରେ ରୂପ ବଦଳେ। ପୁଂଲିଙ୍ଗ गच्छन्, ସ୍ତ୍ରୀଲିଙ୍ଗ गच्छन्ती (ନଦୀ ଭଳି), କ୍ଲୀବ गच्छत् (ଫଳ ଭଳି)।
| ମୂଳଧାତୁ | ଶତୃ କୃଦନ୍ତ | ପୁଂଲିଙ୍ଗ | ସ୍ତ୍ରୀଲିଙ୍ଗ |
|---|
| गम् | गच्छत् | गच्छन् | गच्छन्ती |
| पठ् | पठत् | पठन् | पठन्ती |
| दृश् | पश्यत् | पश्यन् | पश्यन्ती |
| पा | पिबत् | पिबन् | पिबन्ती |
| कृ | कुर्वत् | कुर्वन् | कुर्वती |
| दा | ददत् | ददत् | ददती |
| अस् | सत् | सन् | सती |
| हन् | घ्नत् | घ्नन् | घ्नती |
| श्रु | शृण्वत् | शृण्वन् | शृण्वती |
ମନେରଖଭ୍ୱାଦି ଓ ଦିବାଦି ଗଣୀୟ ଧାତୁର ଶତୃ ସ୍ତ୍ରୀଲିଙ୍ଗରେ ‘न्’ ଆଗମ ହୁଏ — भवत्-भवन्ती, गच्छत्-गच्छन्ती, नश्यत्-नश्यन्ती। ତୁଦାଦି ଓ ଆକାରାନ୍ତ ଅଦାଦିରେ ବିକଳ୍ପରେ — तुदत्-तुदती/तुदन्ती, मा-माती/मान्ती।
शानच्‘ଶତୃ’ ଭଳି ‘शानच्’ ବିଶେଷଣ ରୂପେ, କିନ୍ତୁ ଆତ୍ମନେପଦୀ ଧାତୁରେ ଲାଗେ। ଶାନଚ୍ ପଦ ପୁଂଲିଙ୍ଗରେ ‘ବାଳକ’, ସ୍ତ୍ରୀଲିଙ୍ଗରେ ‘ଲତା’, କ୍ଲୀବରେ ‘ଫଳ’ ଭଳି।
ଶାନଚ୍ର ତିନି ରୂପ — आन / मान / ईन:
वृध्+शानच् = वर्धमान (मान)
दीप्+शानच् = दीप्यमान (मान)
सेव्+शानच् = सेवमान (मान)
शी+शानच् = शयान (आन)
क्री+शानच् = क्रीणान (आन)
कृ+शानच् = कुर्वाण (आन)
अधि+इ+शानच् = अधीयान (आन)
आस्+शानच् = आसीन (ईन (ବିଶେଷ))
ନିୟମ: ଲଟ୍ ପ୍ରଥମ ପୁରୁଷ ଏକବଚନର ‘ते’ କାଢ଼ି ‘मान’ ବସାଇଲେ ଶାନଚ୍ ପଦ। କିନ୍ତୁ ଯେଉଁ ଧାତୁର ଦ୍ୱିବଚନରେ ‘आते’ ଲାଗେ (शी-शयाते, कृ-कुर्वाते) ସେଠାରେ ‘आन’; ‘आस्’ ଧାତୁରେ ‘ईन’ (आस्+शानच्=आसीन)।
କର୍ମ/ଭାବବାଚ୍ୟରେ ମଧ୍ୟ ଶାନଚ୍ ହୁଏ — तेन पठ्यमानं श्लोकम् अहं शृणोमि (पठ्+कर्मणि शानच्)।
୨. କ୍ତ୍ୱା (त्वा) ପ୍ରତ୍ୟୟ
क्त्वाଗୋଟିଏ ବାକ୍ୟରେ ପୂର୍ବକାଳବୋଧକ (ପ୍ରଥମେ ସମ୍ପନ୍ନ ହେଉଥିବା) ଅସମାପିକା କ୍ରିୟା ପାଇଁ ‘क्त्वा’। ସମାପିକା ଓ ଅସମାପିକା କ୍ରିୟାର କର୍ତ୍ତା ସମାନ ହେଲେ ଉପସର୍ଗହୀନ ଧାତୁରେ କ୍ତ୍ୱା ଲାଗେ। କ୍ତ୍ୱାନ୍ତ ପଦ ଅବ୍ୟୟ।
रामः खादित्वा विद्यालयम् अगच्छत् — ରାମ ଖାଇସାରି ବିଦ୍ୟାଳୟ ଗଲା (खाद्+क्त्वा)
तव वचनं श्रुत्वा हरिः अकुप्यत् (श्रु+क्त्वा)
त्वं चित्रं दृष्ट्वा उत्तरं लिख (दृश्+क्त्वा)
କେତେକ କ୍ତ୍ୱା ପ୍ରତ୍ୟୟାନ୍ତ ପଦ:
भू+क्त्वा = भूत्वा (ହୋଇ)
कृ+क्त्वा = कृत्वा (କରି)
गम्+क्त्वा? नी+क्त्वा = नीत्वा (ନେଇ)
दा+क्त्वा = दत्त्वा (ଦେଇ)
ग्रह्+क्त्वा = गृहीत्वा (ଗ୍ରହଣକରି)
हन्+क्त्वा = हत्वा (ବଧକରି)
ज्ञा+क्त्वा = ज्ञात्वा (ଜାଣି)
वच्+क्त्वा = उक्त्वा (କହି)
दृश्+क्त्वा = दृष्ट्वा (ଦେଖି)
प्रच्छ्+क्त्वा = पृष्ट्वा (ପଚାରି)
पा+क्त्वा = पीत्वा (ପାନକରି)
लभ्+क्त्वा = लब्ध्वा (ଲାଭକରି)
पच्+क्त्वा = पक्त्वा (ରାନ୍ଧି)
भुज्+क्त्वा = भुक्त्वा (ଭୋଗକରି)
वस्+क्त्वा = उषित्वा (ବାସକରି)
୩. ଲ୍ୟପ୍ (य, त्य) ପ୍ରତ୍ୟୟ
ल्यप्ସେହି ପୂର୍ବକାଳ ଅର୍ଥରେ प्र, परा, आ, वि, नि, उप ଆଦି ଉପସର୍ଗ ବା नमस्, पुरस्, तिरस् ଉପପଦ ଯୁକ୍ତ ଧାତୁରେ ‘क्त्वा’ ସ୍ଥାନରେ ‘ल्यप्’ ଆଦେଶ ହୁଏ। ଲ୍ୟପ୍ନ୍ତ ପଦ ମଧ୍ୟ ଅବ୍ୟୟ।
ସୂତ୍ର: ଉପସର୍ଗହୀନ ଧାତୁ → କ୍ତ୍ୱା · ଉପସର୍ଗଯୁକ୍ତ ଧାତୁ → ଲ୍ୟପ୍ · ଧାତୁ ପୂର୍ବରେ ‘नञ्’ ରହିଲେ କ୍ତ୍ୱା ରହେ।
କ୍ତ୍ୱା ଓ ଲ୍ୟପ୍ ତୁଳନା:
| କ୍ତ୍ୱା (ଉପସର୍ଗହୀନ) | ଲ୍ୟପ୍ (ଉପସର୍ଗଯୁକ୍ତ) |
|---|
| दा+क्त्वा = दत्त्वा | प्र+दा+ल्यप् = प्रदाय |
| ग्रह्+क्त्वा = गृहीत्वा | सम्+ग्रह्+ल्यप् = संगृह्य |
| नी+क्त्वा = नीत्वा | आ+नी+ल्यप् = आनीय |
| हन्+क्त्वा = हत्वा | नि+हन्+ल्यप् = निहत्य |
| ज्ञा+क्त्वा = ज्ञात्वा | वि+ज्ञा+ल्यप् = विज्ञाय |
| नम्+क्त्वा = नत्वा | प्र+नम्+ल्यप् = प्रणम्य |
| कृ+क्त्वा = कृत्वा | पुरस्+कृ+ल्यप् = पुरस्कृत्य |
ଆଉ କେତେକ ଲ୍ୟପ୍ ପଦ:
प्र+विश्+ल्यप् = प्रविश्य (ପ୍ରବେଶକରି)
उप+विश्+ल्यप् = उपविश्य (ବସିକରି)
आ+दा+ल्यप् = आदाय (ଆଣି)
सम्+चिन्त्+ल्यप् = सञ्चिन्त्य (ଚିନ୍ତାକରି)
आ+गम्+ल्यप् = आगम्य/आगत्य (ଆସି)
नि+शम्+ल्यप् = निशम्य (ଶୁଣି)
प्र+आप्+ल्यप् = प्राप्य (ପାଇ)
परि+धा+ल्यप् = परिधाय (ପିନ୍ଧି)
वि+हा+ल्यप् = विहाय (ତ୍ୟାଗକରି)
वि+लोक्+ल्यप् = विलोक्य (ଦେଖି)
उप+इ+ल्यप् = उपेत्य (ନିକଟକୁ ଯାଇ)
उत्+स्था+ल्यप् = उत्थाय (ଉଠି)
୪. ତୁମୁନ୍ (तुम्) ପ୍ରତ୍ୟୟ
तुमुन्ନିମିତ୍ତ/ପ୍ରୟୋଜନ (ଭବିଷ୍ୟତ/ପରକାଳ) ବୋଧକ ଅସମାପିକା କ୍ରିୟା ଓ ସମାପିକା କ୍ରିୟାର କର୍ତ୍ତା ସମାନ ହେଲେ ଧାତୁରେ ‘तुमुन्’ ହୁଏ। ‘ପାଇଁ, ନିମନ୍ତେ’ ଅର୍ଥ। ତୁମୁନ୍ନ୍ତ ପଦ ଅବ୍ୟୟ।
अहं नृत्यं द्रष्टुं गमिष्यामि (दृश्+तुमुन्)
त्वं खादितुम् आगच्छ (खाद्+तुमुन्)
रामः पठितुं विद्यालयं गच्छति (पठ्+तुमुन्)
दृश्+तुमुन् = द्रष्टुम्
श्रु+तुमुन् = श्रोतुम्
कृ+तुमुन् = कर्तुम्
गम्+तुमुन् = गन्तुम्
हन्+तुमुन् = हन्तुम्
लभ्+तुमुन् = लब्धुम्
नी+तुमुन् = नेतुम्
दा+तुमुन् = दातुम्
वह्+तुमुन् = वोढुम्
भू+तुमुन् = भवितुम्
ମନେରଖକର୍ତ୍ତା ପୃଥକ୍ ହେଲେ ତୁମୁନ୍ ହୁଏ ନାହିଁ — ସେଠାରେ ‘ତୁମର୍ଥେ ଚତୁର୍ଥୀ’ (भाव-वचनात्) ହୁଏ। ଯଥା — रामः श्यामं पठनाय अवदत् (ପଢ଼ିବା କର୍ତ୍ତା ଶ୍ୟାମ, କହିବା କର୍ତ୍ତା ରାମ)।
୫. କ୍ତିନ୍ (ति) ପ୍ରତ୍ୟୟ
क्तिन्ଭାବ ଅର୍ଥରେ ଧାତୁରେ ‘क्तिन्’ (ति)। କ୍ତିନ୍ନ୍ତ ପଦ ସ୍ତ୍ରୀଲିଙ୍ଗ, ‘ମତି’ ଶବ୍ଦ ଭଳି ରୂପ, ବିଶେଷ୍ୟବାଚକ।
दुर्बलस्य भीतिः अस्ति (भी+क्तिन्)
काकस्य दृष्टिः कुटिला (दृश्+क्तिन्)
तस्य धनस्य हानिः अभवत् (हा+क्तिन्)
म्लै+क्तिन् = म्लानिः
ग्लै+क्तिन् = ग्लानिः
भ्रम्+क्तिन् = भ्रान्तिः
क्षम्+क्तिन् = क्षान्तिः
शक्+क्तिन् = शक्तिः
मुच्+क्तिन् = मुक्तिः
सिध्+क्तिन् = सिद्धिः
बुध्+क्तिन् = बुद्धिः
୬. ଲ୍ୟୁଟ୍ (अन) ପ୍ରତ୍ୟୟ
ल्युट्ଭାବ ଅର୍ଥରେ ଧାତୁରେ ‘ल्युट्’ (अन)। ଲ୍ୟୁଟ୍ନ୍ତ ପଦ ବିଶେଷ୍ୟ ଓ କ୍ଲୀବଲିଙ୍ଗ, ‘ଫଳ’ ଶବ୍ଦ ଭଳି ରୂପ।
रामस्य गमनं सुन्दरम् (गम्+ल्युट्)
साधूनां दर्शनं पुण्यम् (दृश्+ल्युट्)
दिवा शयनं क्षतिकरम् (शी+ल्युट्)
पठ्+ल्युट् = पठनम्
ग्रह्+ल्युट् = ग्रहणम्
दा+ल्युट् = दानम्
स्मृ+ल्युट् = स्मरणम्
पा+ल्युट् = पानम्
भुज्+ल्युट् = भोजनम्
श्रु+ल्युट् = श्रवणम्
वन्द्+ल्युट् = वन्दनम्
୭. ଘଞ୍ (अ) ପ୍ରତ୍ୟୟ
घञ्ଭାବ ଅର୍ଥରେ ଧାତୁରେ ‘घञ्’ (अ) ହୋଇ ବିଶେଷ୍ୟ ପଦ। ଘଞ୍ନ୍ତ ପଦ ପୁଂଲିଙ୍ଗ, ‘ବାଳକ’ ଶବ୍ଦ ଭଳି ରୂପ।
लोभः अनर्थकः व्याधिः (लुभ्+घञ्)
सन्तानेषु मातुः स्नेहः अस्ति (स्निह्+घञ्)
दुःखस्य प्रतिकारः कः? (प्रति+कृ+घञ्)
पठ्+घञ् = पाठः
पच्+घञ् = पाकः
मुह्+घञ् = मोहः
त्यज्+घञ् = त्यागः
विद्+घञ् = वेदः
हन्+घञ् = घातः
भुज्+घञ् = भोगः
आ+चर्+घञ् = आचारः
अव+तृ+घञ् = अवतारः
सम्+हृ+घञ् = संहारः
रुज्+घञ् = रोगः
बन्ध्+घञ् = बन्धः
୮. କ୍ତ (त) ଓ କ୍ତବତୁ (तवत्) — ନିଷ୍ଠା ପ୍ରତ୍ୟୟ
क्त / क्तवतु‘निष्ठा’ ପ୍ରତ୍ୟୟ — ଅତୀତ କାଳ ଅର୍ଥରେ। ବିଶେଷଣ ଓ ସମାପିକା କ୍ରିୟା ରୂପେ, ବିଶେଷ୍ୟର ଲିଙ୍ଗ-ବିଭକ୍ତି-ବଚନ ଅନୁସରଣ କରେ। କ୍ତ — ପୁଂ ‘ବାଳକ’, ସ୍ତ୍ରୀ ‘ଲତା’, କ୍ଲୀବ ‘ଫଳ’ ଭଳି। କ୍ତବତୁ — ପୁଂ/କ୍ଲୀବ ‘ଶ୍ରୀମତ୍’, ସ୍ତ୍ରୀ ‘ନଦୀ’ ଭଳି।
କ୍ତ (निष्ठा) ପଦ:
गम्+क्त = गत (गतः/गता/गतम्)
दृश्+क्त = दृष्ट
या+क्त = यात
भू+क्त = भूत
स्वप्+क्त = सुप्त
पच्+क्त = पक्व
भिद्+क्त = भिन्न
खिद्+क्त = खिन्न
मुह्+क्त = मुग्ध/मूढ
हा+क्त = हीन
लभ्+क्त = लब्ध
वच्+क्त = उक्त
अद्+क्त = अन्न
प्र+सद्+क्त = प्रसन्न
आ+सद्+क्त = आसन्न
କ୍ତବତୁ ରୂପ: गम्+क्तवतु = गतवत् → ପୁଂ गतवान्, ସ୍ତ୍ରୀ गतवती, କ୍ଲୀବ गतवत्।
କର୍ତୃବାଚ୍ୟ: अहं गृहे खादितवान् (खाद्+क्तवतु) · यूयं ग्रामं गतवन्तः
ସ୍ତ୍ରୀ: सुशीला पतिं सेवितवती (सेव्+क्तवतु+ङीप्)
କର୍ମ: बालकैः फलानि खादितानि · ଭାବ: तेन शयितम्
୯. ତବ୍ୟ ଓ ଅନୀୟ (कृत्य) ପ୍ରତ୍ୟୟ
तव्य / अनीय‘କୃତ୍ୟ’ ପ୍ରତ୍ୟୟ — ଉଚିତ, ବିଧି, ଯୋଗ୍ୟ, ସମ୍ଭାବନା (ଭବିଷ୍ୟତକାଳ) ଅର୍ଥରେ। ବିଶେଷଣ ଓ ସମାପିକା କ୍ରିୟା ରୂପେ। ପୁଂ ‘ବାଳକ’, ସ୍ତ୍ରୀ ‘ଲତା’, କ୍ଲୀବ ‘ଫଳ’ ଭଳି। ଏକ ଧାତୁରେ ଦୁଇଟି ଯାକ ହୋଇପାରେ।
मया चन्द्रः द्रष्टव्यः (दृश्+तव्य) ବା दर्शनीयः (दृश्+अनीय)
तेन गीता पठितव्या (पठ्+तव्य)
बालकेन फलानि खादितव्यानि / खादनीयानि
| ଧାତୁ | तव्य | अनीय |
|---|
| गम् | गन्तव्य | गमनीय |
| दृश् | द्रष्टव्य | दर्शनीय |
| नी | नेतव्य | नयनीय |
| दा | दातव्य | दानीय |
| बुध् | बोद्धव्य | बोधनीय |
| कृ | कर्तव्य | करणीय |
| पा | पातव्य | पानीय |
ଭାବବାଚ୍ୟରେ ସଦା କ୍ଲୀବ ଏକବଚନ — मम शयितव्यम्/शयनीयम्, बालकैः स्नातव्यम्/स्नानीयम्।
💡 ଉତ୍ସ: BSE ଓଡ଼ିଶା ଦଶମ ଶ୍ରେଣୀ ସଂସ୍କୃତ ବ୍ୟାକରଣ (संस्कृतव्याकरणप्रकाशः) — କୃଦନ୍ତ ପ୍ରକରଣ (ପୃଷ୍ଠା ୫୫–୭୩)।