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बहुव्रीहि समास

Bahuvrihi Samasa · ବ୍ୟାକରଣ · ସମାସ (୬ · ଶେଷ)

ସଂସ୍କୃତ ବ୍ୟାକରଣ · ସମାସ ଭାଗ · ଓଡ଼ିଶା ବୋର୍ଡ ଦଶମ ଶ୍ରେଣୀ · ନିୟମ + ଅଭ୍ୟାସ + Quiz · (+ ଅଲୁକ୍ ସମାସ ବୋନସ୍)

📖 ପରିଚୟ: ସମସ୍ୟମାନ ପଦର ପ୍ରାଧାନ୍ୟ ନ ଥାଇ ଅନ୍ୟାର୍ଥର ପ୍ରାଧାନ୍ୟ ଥିଲେ ବହୁବ୍ରୀହି ସମାସ (“अन्यार्थप्रधानः बहुब्रीहिः”)। ପ୍ରକାର — ସମାନାଧିକରଣ, ବ୍ୟଧିକରଣ, ନଞ୍, ସହାର୍ଥ, ସଂଖ୍ୟାବାଚକ, ବ୍ୟତିହାର, ମଧ୍ୟପଦଲୋପୀ/ଉପମିତ ବହୁବ୍ରୀହି। (+ ବୋନସ୍ ଅଲୁକ୍ ସମାସ ଓ ସମାସଲକ୍ଷଣ ଶ୍ଳୋକ)

ସମସ୍ୟମାନ ପଦମାନଙ୍କର ପ୍ରାଧାନ୍ୟ ନ ଥାଇ ଅନ୍ୟାର୍ଥର ପ୍ରାଧାନ୍ୟ ଥିଲେ ବହୁବ୍ରୀହି ସମାସ ହୁଏ (“अन्यार्थप्रधानः बहुब्रीहिः”)। ସମସ୍ତପଦ ଯେଉଁ ଅନ୍ୟାର୍ଥକୁ ବିଶେଷିତ କରେ, ତାହାର ଲିଙ୍ଗ ଓ ବଚନ ଗ୍ରହଣ କରେ। ସମାନବିଭକ୍ତ୍ୟନ୍ତ ପଦ ଥିଲେ ସମାନାଧିକରଣ, ଭିନ୍ନ ବିଭକ୍ତି ଥିଲେ ବ୍ୟଧିକରଣ ବହୁବ୍ରୀହି।

(କ) ସମାନାଧିକରଣ ବହୁବ୍ରୀହି

पीताम्बरः विष्णुः विराजते। (पीतम् अम्बरं यस्य सः — ‘विष्णु’ प्रधान)
आरूढबानरः वृक्षः कम्पते। (आरूढः बानरः यं सः)
कृतकार्यः छात्रः नदति। (कृतं कार्यं येन सः)
श्वेतबस्त्रा नारी मन्दिरं गच्छति। (श्वेतं बस्त्रं यस्याः सा)
बहुजलं सरः। (बहु जलं यस्मिन् तत्)

ସଂଖ୍ୟାବାଚକ ପଦ ବିଶେଷଣ ହେଲେ ବହୁବ୍ରୀହି —

रामः दशाननम् अमारयत्। (दश आननानि यस्य, तम् — रावण)
त्रिनयनः (शिवः)। (त्रीणि नयनानि यस्य सः)
दुर्गा दशभुजा पूज्यते। (दश भुजाः यस्याः सा)
चतुराननः (ब्रह्मा)। (चत्वारि आननानि यस्य सः)
एकदन्तः (गणेश)। (एकः दन्तः यस्य सः)
ମନେରଖ (धनुः→धन्वा, जाया→जानि)‘धनुः’ ଓ ‘जाया’ ଶବ୍ଦ ପରପଦରୂପେ ବ୍ୟବହୃତ ହେଲେ ଯଥାକ୍ରମେ धन्वा ଓ जानि ରେ ପରିଣତ ହୁଏ — पुष्पधन्वा (पुष्पाणि धनुः यस्य सः), पिनाकधन्वा, सीताजानिः (सीता जाया यस्य सः), लक्ष्मीजानिः।
ମନେରଖ (भार्या→भार्य)‘भार्या’ ପଦ ‘भार्य’ ରେ ପରିଣତ ହୁଏ — रसिकाभार्यः (रसिका भार्या यस्य सः), गङ्गाभार्यः।
ମନେରଖ (सु/कु, महत्→महा)ଶୋଭନ/କୁସିତ ବିଶେଷଣ ରହି ବହୁବ୍ରୀହି ହେଲେ ‘सु’/‘कु’ ଅବଶିଷ୍ଟ ରୁହେ — सुबुद्धिः (शोभना बुद्धिः यस्य सः), कुमतिः (कुसिता मतिः यस्य सः)। ‘महत्’ → ‘महा’ — महाशयः (महान् आशयः यस्य सः), महाबुद्धिः।

(ଖ) ବ୍ୟଧିକରଣ ବହୁବ୍ରୀହି

ସମସ୍ୟମାନ ପଦର ଭିନ୍ନ ବିଭକ୍ତି (ଲିଙ୍ଗ-ବିଭକ୍ତି ଅଲଗା) ଥିଲେ ବ୍ୟଧିକରଣ ବହୁବ୍ରୀହି।

बीणापाणिः (सरस्वती)। (बीणा पाणौ यस्याः सा)
पद्मनाभः (विष्णु)। (पद्मं नाभौ यस्य सः)
चक्रपाणिः (कृष्ण)। (चक्रं पाणौ यस्य सः)
शूलहस्ता (दुर्गा)। (शूलं हस्ते यस्याः सा)
भालालोचनः (शिव)। (भाले लोचनं यस्य सः)
दण्डपाणिः। (दण्डः पाणौ यस्य सः)

(ଗ) ନଞ୍ / ନିଷେଧାର୍ଥକ ବହୁବ୍ରୀହି

ନାହିଁ ବା ନିଷେଧ ଅର୍ଥ ବୁଝାଇଲେ (निर्गत/अविद्यमान/नि: = नास्ति) ନିଷେଧାର୍ଥକ ବହୁବ୍ରୀହି।

निर्दोषः दण्डितः अभवत्। (निर्गतः दोषः यस्य/यस्मात् सः)
निरहङ्कारः पण्डितः। (निर्गतः अहङ्कारः यस्य सः)
अनसूया पतिव्रता आसीत्। (अविद्यमाना असूया यस्याः सा)
अनर्थकं बाक्यं मा बद। (अविद्यमानः अर्थः यस्य तत्)
जन्म निष्फलं भवति। (नि: (नास्ति) फलं यस्य तत्)

(ଘ) ସହାର୍ଥ ବହୁବ୍ରୀହି

ତୃତୀୟାନ୍ତ ପଦ ସହିତ ‘सह’ ଶବ୍ଦର ସମାସ — ‘सह’ ରୁ ‘स’ ଅବଶିଷ୍ଟ ରୁହେ।

सपरिवारः मातुलः आगतः। (परिवारेण सह बर्धमानः)
सपुत्रः गुरुः। (पुत्रेण सह बर्धमानः)
जीवनं मे सफलं जातम्। (फलेन सह बर्धमानम्)
सत्वरम् आगच्छ। (त्वरया सह बर्धमानम्)
सालङ्कारा कन्या। (अलङ्कारैः सह बर्धमाना)

(ଙ) ସଂଖ୍ୟାବାଚକ ବହୁବ୍ରୀହି

द्वित्राः जनाः। (द्वौ बा त्रयः बा)
त्रिचतुराः छात्राः। (त्रयः बा चत्वारः बा)
पञ्चषाः कृषकाः। (पञ्च बा षट् बा)
सप्ताष्टाः बालिकाः। (सप्त बा अष्टौ बा)

(ଚ) ବ୍ୟତିହାର ବହୁବ୍ରୀହି

ପରସ୍ପର ଯୁଦ୍ଧ / କଳହ ବୁଝାଇଲେ (ପ୍ରହରଣବିଷୟକ ତୃତୀୟାନ୍ତ, ଗ୍ରହଣବିଷୟକ ସପ୍ତମ୍ୟନ୍ତ ପଦ) ବ୍ୟତିହାର ବହୁବ୍ରୀହି।

केशाकेशी। (केशेषु केशेषु गृहीत्वा यत् युद्धं — ପରସ୍ପର କେଶ ଧରି)
हस्ताहस्ति। (हस्तेन हस्तेन गृहीत्वा यत् युद्धं)
दण्डादण्डि। (दण्डैः दण्डैः प्रहृत्य प्रबृद्धं युद्धम्)

(ଛ) ମଧ୍ୟପଦଲୋପୀ / ଉପମିତ ବହୁବ୍ରୀହି

ବିଗ୍ରହବାକ୍ୟ ମଧ୍ୟରୁ ପଦ ଲୋପ ପାଇଲେ ବା ତୁଳନା ପ୍ରକାଶିତ ହେଲେ ମଧ୍ୟପଦଲୋପୀ / ଉପମିତ ବହୁବ୍ରୀହି।

वृषस्कन्धः राजपुत्रः। (वृषस्य स्कन्धः इव स्कन्धः यस्य सः)
कमलनयनः भगवान्। (कमले इव नयने यस्य सः)
व्याघ्रमुखः। (व्याघ्रस्य मुखम् इव मुखं यस्य सः)
मृगनयना। (मृगस्य नयने इव नयने यस्याः सा)
कुम्भकर्णः, शूर्पणखा। (कुम्भौ इव कर्णौ; शूर्पं इव नखाः)
ବିଶେଷ ବିଧିसुहृत् = शोभनं हृदयं यस्य सः (ବନ୍ଧୁ); द्वीपम् = द्वयोः दिशोः आपः यस्य तत्; अन्तरीपम् = अन्तर्गताः आपः यस्य तत्; सपत्नी = समानः पतिः यस्याः सा (ସଉତୁଣୀ); सुगन्धः = शोभनः गन्धः यस्य सः।

✦ ବୋନସ୍: ଅଲୁକ୍ ସମାସ

ଅଲୁକ୍‌ସମାସ କୌଣସି ସ୍ୱତନ୍ତ୍ର ସମାସ ନୁହେଁ। ଯେଉଁ ସ୍ଥଳରେ ସମସ୍ତପଦର ପୂର୍ବପଦସ୍ଥିତ ବିଭକ୍ତି ଲୋପ ହୋଇ ନ ଥାଏ, ତାହାକୁ ଅଲୁକ୍‌ସମାସ କୁହାଯାଏ (ଭିନ୍ନ ଭିନ୍ନ ସମାସରେ ଦେଖାଯାଏ)।

युधिष्ठिरः ज्येष्ठपाण्डवः। (युधि स्थिरः — ‘युध्’ सप्तमी अबिकल)
वनेचरः। (बने चरति यः)
अन्तेवासी। (अन्ते बसति इति — ଶିଷ୍ୟ)
सरसिजम्। (सरसि जायते इति — ପଦ୍ମ)
परस्मैपदम्, आत्मनेपदम्, मनसिजः। (परस्मै पदम्; आत्मने पदम्; मनसि जायते यः)
📜 ସଂକ୍ଷେପରେ ସମାସଲକ୍ଷଣ (ସାରସ୍ୱତମ୍):
पूर्वेऽव्यये ऽव्ययीभावो ऽधमादौ तत्पुरुषः स्मृतः।
चकारबहुलो द्वन्द्वः संख्यापूर्वो द्विगुः स्मृतः॥
यस्य येन बहुब्रीहिः स रूढौ कर्मधारयः।
इति किञ्चित् समासानां लक्षणं लक्षणोरितम्॥

💡 ଉତ୍ସ: BSE ଓଡ଼ିଶା ଦଶମ ଶ୍ରେଣୀ ସଂସ୍କୃତ ବ୍ୟାକରଣ (संस्कृतव्याकरणप्रकाशः) — ସମାସ ପ୍ରକରଣ (ବହୁବ୍ରୀହି ପୃଷ୍ଠା ୪୦–୪୪; ଅଲୁକ୍ ସମାସ ୪୫)।

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