ଅବ୍ୟୟ ପଦ ପୂର୍ବପଦରେ ଥାଇ ଯେଉଁ ସମାସ ହୁଏ, ତାହାକୁ ଅବ୍ୟୟୀଭାବ ସମାସ କୁହାଯାଏ (“पूर्वपदार्थप्रधानः अव्ययीभावः”)। କୃତ୍, ତଦ୍ଧିତ, ନିପାତ ଓ ଉପସର୍ଗ ଅନ୍ତର୍ଗତ ଅବ୍ୟୟ ପଦ ପୂର୍ବପଦରେ ଲାଗିଲେ ସମସ୍ତପଦ ଅବ୍ୟୟୀଭାବ ହୁଏ। ସାଧାରଣତଃ ସମସ୍ତପଦ ଅବ୍ୟୟ ହୁଏ।
୧. ‘यथा’ (ଅନତିକ୍ରମ୍ୟ ଅର୍ଥରେ)
अहं यथाशक्ति धनं दास्यामि। (शक्तिम् अनतिक्रम्य)
पिता यथाकालम् आगमिष्यति। (कालम् अनतिक्रम्य)
सः दरिद्रेभ्यः यथेष्टं यच्छति। (इच्छाम् अनतिक्रम्य)
अहं यथाविधि ईश्वरं नमामि। (विधिम् अनतिक्रम्य)
ମନେରଖପୂର୍ବପଦରେ ପ୍ରଯୁକ୍ତ ଅବ୍ୟୟ ବିଗ୍ରହବାକ୍ୟରେ ତା'ର ଅର୍ଥ ସ୍ପଷ୍ଟ କରେ। ମାତ୍ର ‘यथा हरिः तथा हरः’ ଆଦି କ୍ଷେତ୍ରରେ ଏପରି ଭାବ ନ ଥିବାରୁ ସମାସ ହୁଏ ନାହିଁ।
୨. ‘उप’ (ସାମୀପ୍ୟ ଅର୍ଥରେ)
सः उपकूलं गच्छति। (कूलस्य समीपम्)
यानम् उपनगरं प्राप्तम्। (नगरस्य समीपम्)
नदी उपमन्दिरं प्रवहति। (मन्दिरस्य समीपम्)
ଧ୍ୟାନ ଦିଅउपराज्यपालः, उपकुलाधिपतिः, उपाध्यक्षः ଆଦି ପଦରେ ‘उप’ ର ସାମୀପ୍ୟ ଅର୍ଥ ନ ଥାଇ ‘ଅଧସ୍ତନ (subordinate)’ ବୁଝାଏ — ତେଣୁ ସେଠାରେ ଅବ୍ୟୟୀଭାବ ହୁଏ ନାହିଁ।
୩. ‘अनु’ (ପଶ୍ଚାତ୍ ଅର୍ଥରେ)
अनुशिक्षकं छात्राः गच्छन्ति। (शिक्षकस्य पश्चात्)
अनुवृक्षं रौरः अस्ति। (वृक्षस्य पश्चात्)
अनुगृहं बाटिका विद्यते। (गृहस्य पश्चात्)
ଧ୍ୟାନ ଦିଅ‘अनुरूपम्’ ର ବିଗ୍ରହ रूपस्य योग्यम् ଓ ‘अनुकूलम्’ ର ବିଗ୍ରହ अनुगतं कूलम् ହୁଏ।
୪. ‘सु’ (ସମୃଦ୍ଧି / ପ୍ରାଚୁର୍ଯ୍ୟ ଅର୍ଥରେ)
प्राक् अयं देशः सुभारतम् आसीत्। (भारतानां समृद्धिः)
सुकलिङ्गं वर्धते स्म। (कलिङ्गानां समृद्धिः)
सुमद्रं गर्वं जनयति। (मद्राणां प्राचुर्यम्)
अत्र सुफलं नास्ति। (फलानां प्राचुर्यम्)
ଧ୍ୟାନ ଦିଅକର୍ମଧାରୟ ଓ ବହୁବ୍ରୀହି ସମାସରେ ‘सु’ ପଦ ‘ଶୋଭନ / ସୁନ୍ଦର’ ଅର୍ଥରେ ବିଶେଷଣ ରୂପେ ବ୍ୟବହୃତ ହୁଏ।
୫. ‘दुः / निः’ (ଅଭାବ ଅର୍ଥରେ)
देशे दुर्भिक्षं दृश्यते। (भिक्षायाः अभावः)
स्थानेऽस्मिन् निर्मक्षिकम् अनुभूयते। (मक्षिकाणाम् अभावः)
ଧ୍ୟାନ ଦିଅକର୍ମଧାରୟ ଓ ବହୁବ୍ରୀହିରେ ‘दुः’ = ଦୁଷ୍ଟ ଓ ‘निः’ = ଅବିଦ୍ୟମାନ ଅର୍ଥରେ ବିଶେଷଣ ରୂପେ ବ୍ୟବହୃତ ହୁଏ।
୬. ‘अधि’ (ସପ୍ତମୀ ଅର୍ଥରେ — ଇତି)
वक्ता अध्यात्मम् अभाषत। (आत्मनि इति)
कृषकाः अधिग्रामं निवसन्ति। (ग्रामे इति)
अधिहरि भक्तिं कुरु। (हरौ इति)
୭. ‘आ’ (ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ / ଯାବତ୍ ଅର୍ଥରେ)
गान्धिमहाभागः आमरणं सत्यम् अपालयत्। (मरणं यावत्)
दोषी आजीवनं कारागारं नीतः। (जीवनं यावत्)
रघुः आसमुद्रं राज्यं शशास। (समुद्रं यावत्)
पिता माम् आपादमस्तकम् अपश्यत्। (पादमस्तकं व्याप्य)
भारतवर्षम् आकुमारीहिमाचलं वर्धते। (कुमारीहिमाचलौ यावत्)
आहिमालयं गङ्गा दृश्यते। (हिमालयात् आरभ्य)
୮. ‘स’ (ସାଦୃଶ୍ୟ ଅର୍ଥରେ)
सिंहः सचित्रं प्रतिभाति। (चित्रस्य सादृश्यम्)
भक्तः ईश्वरे सहरि अनुभवति। (हरेः सादृश्यम्)
୯. ‘प्रति’ (ବୀପ୍ସା — ବାରମ୍ବାର ଆବୃତ୍ତି)
भिक्षुः प्रतिगृहं भिक्षते। (गृहं गृहम् / गृहेगृहे)
मेघः प्रतिदिशं व्याप्नोति। (दिशं दिशम् / दिशिदिशि)
प्रतिदिनं विद्यालयम् आगच्छ। (दिनं दिनम् / दिने दिने)
सः प्रत्यहम् आगच्छति। (अहनि अहनि)
ମନେରଖ‘अक्षि’ ଶବ୍ଦ ସମାସବିଧି ସମୟରେ ‘अक्ष’ ରେ ପରିଣତ ହୁଏ — प्रत्यक्षम् (अक्षि प्रति), परोक्षम् (अक्ष्णोः परम्), समक्षम् (अक्ष्णोः समीपम्/समम्), अन्वक्षम् (अक्ष्णोः पश्चात्)।
୧୦. ନଦୀବାଚକ ପଦର ସମାହାର
ନଦୀବାଚକ ପଦର ସମାହାର ହେଲେ ତାହା ଦ୍ୱିଗୁ ନ ହୋଇ ଅବ୍ୟୟୀଭାବ ହୁଏ।
उत्तरभारते पञ्चनदम् अस्ति। (पञ्चानां नदीनां समाहारः)
प्रयागे त्रिगङ्गं विराजते। (तिसृणां गङ्गानां समाहारः)
ମନେରଖଅବ୍ୟୟୀଭାବ ସମାସରେ ସମସ୍ତ ପଦ ଅବ୍ୟୟ ହୋଇଥିଲେ ମଧ୍ୟ କେତେକ କ୍ଷେତ୍ରରେ ତୃତୀୟା ଓ ସପ୍ତମୀ ବିଭକ୍ତିର ପ୍ରୟୋଗ ଦେଖାଯାଏ — ଯଥା परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम्। ‘ବଡ଼ସାନ କ୍ରମ’ ଅର୍ଥରେ ମଧ୍ୟ ଅବ୍ୟୟୀଭାବ ହୁଏ — अनुज्येष्ठम् (ज्येष्ठस्य आनुपूर्व्येण)।
💡 ଉତ୍ସ: BSE ଓଡ଼ିଶା ଦଶମ ଶ୍ରେଣୀ ସଂସ୍କୃତ ବ୍ୟାକରଣ (संस्कृतव्याकरणप्रकाशः) — ସମାସ ପ୍ରକରଣ (ଅବ୍ୟୟୀଭାବ, ପୃଷ୍ଠା ୧୦–୧୫)।