ସଂସ୍କୃତ (संस्कृतसाहित्यमञ्जरी) · ଓଡ଼ିଶା ବୋର୍ଡ ଦଶମ ଶ୍ରେଣୀ · ଗଦ୍ୟଭାଗ ପ୍ରଥମ ପାଠ · ଟିପ୍ପଣୀ + ଅଭ୍ୟାସ + ୨୫ Quiz
📖 ପାଠ ପରିଚୟ: ‘उपदेशामृतम्’ ହେଉଛି ପ୍ରାଚୀନ ବେଦ ଓ ଉପନିଷଦ (ବିଶେଷତଃ ତୈତ୍ତିରୀୟ ଉପନିଷଦ) ଆଦି ଶାସ୍ତ୍ରରୁ ସଂଗୃହୀତ କେତେକ ସଦାଚାର-ଉପଦେଶର ସଙ୍କଳନ। ପ୍ରାଚୀନ ଗୁରୁକୁଳରେ ଆଚାର୍ଯ୍ୟମାନେ ଛାତ୍ରମାନଙ୍କୁ ଏହିପରି ସୂକ୍ତବାକ୍ୟ ଶିଖାଉଥିଲେ। ଗୁରୁଙ୍କ ଉପଦେଶ ପାଇ ଆଚରଣରେ ପ୍ରୟୋଗ କଲେ ମନୁଷ୍ୟ ଅମୃତତ୍ୱ ଲାଭ କରେ। ଆଜିର ବିଜ୍ଞାନଯୁଗରେ ମଧ୍ୟ ଏହି ଉପଦେଶର ପ୍ରାସଙ୍ଗିକତା ରହିଛି।
ମୂଳ ପାଠ (मूलपाठः)
एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति। ऋतस्य पथा प्रेत। अहमनृतात् सत्यमुपैमि। श्रद्धया सत्यमाप्यते।
माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः। वयं राष्ट्रे जागृयाम। मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे। न स सखा यो न ददाति सख्ये।
तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु। आरोह तमसो ज्योतिः। चरैवेति चरैवेति चरन् वै मधु विन्दति। विद्यामृतमश्नुते।
सत्यं वद। धर्मं चर। स्वाध्यायान्मा प्रमदः। सत्यान्न प्रमदितव्यम्। धर्मान्न प्रमदितव्यम्। कुशलान्न प्रमदितव्यम्। भूत्यै न प्रमदितव्यम्। स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम्। देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम्।
मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव। यान्यनवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि नो इतराणि। यान्यस्माकं सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि नो इतराणि।
मा हिंसीः पुरुषान् पशूंश्च। मा गृधः कस्यस्विद् धनम्।
उत्तिष्ठत। जाग्रत! प्राप्य वरान्निबोधत।
एष आदेशः। एष उपदेशः। एषा वेदोपनिषत्। एतदनुशासनम्। एवमुपासितव्यम्॥
ଓଡ଼ିଆ ଅନୁବାଦ (ଭାବାର୍ଥ)
एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति।ଗୋଟିଏ ପରମ ସତ୍ୟ (ଈଶ୍ୱର)କୁ ବିଦ୍ୱାନମାନେ ବହୁ ପ୍ରକାରରେ ବର୍ଣ୍ଣନା କରନ୍ତି।
ऋतस्य पथा प्रेत। अहमनृतात् सत्यमुपैमि। श्रद्धया सत्यमाप्यते।ସତ୍ୟ (ଧର୍ମ)ର ମାର୍ଗରେ ଅଗ୍ରସର ହୁଅ। ମୁଁ ମିଥ୍ୟାରୁ ସତ୍ୟ ଆଡ଼କୁ ଯାଏ। ଶ୍ରଦ୍ଧା ଦ୍ୱାରା ସତ୍ୟ ପ୍ରାପ୍ତ ହୁଏ।
माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।ଭୂମି ମୋର ମାତା, ମୁଁ ଏହି ପୃଥିବୀର ପୁତ୍ର।
वयं राष्ट्रे जागृयाम। मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे। न स सखा यो न ददाति सख्ये।ଆମେ ରାଷ୍ଟ୍ର ପାଇଁ ସର୍ବଦା ଜାଗ୍ରତ ରହିବା। ଆମେ ମିତ୍ରର ଦୃଷ୍ଟିରେ (ବନ୍ଧୁଭାବରେ) ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଦେଖିବା। ଯେ ବନ୍ଧୁକୁ କିଛି ଦିଏ ନାହିଁ, ସେ ପ୍ରକୃତ ବନ୍ଧୁ ନୁହେଁ।
तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु। आरोह तमसो ज्योतिः।ମୋର ମନ ଶୁଭ ସଂକଳ୍ପ (କଲ୍ୟାଣକାରୀ ଚିନ୍ତା)ଯୁକ୍ତ ହେଉ। ଅନ୍ଧକାର (ଅଜ୍ଞାନ)ରୁ ଆଲୋକ (ଜ୍ଞାନ) ଆଡ଼କୁ ଆରୋହଣ କର।
चरैवेति चरैवेति चरन् वै मधु विन्दति। विद्यामृतमश्नुते।“ଅଗ୍ରସର ହୁଅ, ଅଗ୍ରସର ହୁଅ” — ଗତିଶୀଳ (ପରିଶ୍ରମୀ) ବ୍ୟକ୍ତି ହିଁ ମଧୁ (ସଫଳତା/ଅମୃତ) ଲାଭ କରେ। ବିଦ୍ୟା ଦ୍ୱାରା ମନୁଷ୍ୟ ଅମୃତତ୍ୱ ଲାଭ କରେ।
सत्यं वद। धर्मं चर। स्वाध्यायान्मा प्रमदः।ସତ୍ୟ କୁହ। ଧର୍ମ ଆଚରଣ କର। ସ୍ୱାଧ୍ୟାୟ (ଅଧ୍ୟୟନ)ରୁ ବିରତ ହୁଅ ନାହିଁ।
सत्यान्न... धर्मान्न... कुशलान्न... भूत्यै न... स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न... देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम्।ସତ୍ୟ, ଧର୍ମ, କୁଶଳ (ମଙ୍ଗଳକାର୍ଯ୍ୟ), ଉନ୍ନତି, ଅଧ୍ୟୟନ-ଅଧ୍ୟାପନ ତଥା ଦେବକାର୍ଯ୍ୟ-ପିତୃକାର୍ଯ୍ୟ — ଏହିସବୁରୁ ବିରତ ହେବା ଉଚିତ ନୁହେଁ।
मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव।ମାତାଙ୍କୁ ଦେବତା ଜ୍ଞାନ କର। ପିତାଙ୍କୁ ଦେବତା ଜ୍ଞାନ କର। ଗୁରୁଙ୍କୁ ଦେବତା ଜ୍ଞାନ କର। ଅତିଥିଙ୍କୁ ଦେବତା ଜ୍ଞାନ କର।
यान्यनवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि नो इतराणि। यान्यस्माकं सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि नो इतराणि।ଯେଉଁ କର୍ମ ନିନ୍ଦାରହିତ (ଦୋଷଶୂନ୍ୟ), ସେଗୁଡ଼ିକ କରିବା ଉଚିତ, ଅନ୍ୟ (ଦୋଷଯୁକ୍ତ) ନୁହେଁ। ଆମର ଯେଉଁ ଆଚରଣ ଉତ୍ତମ (ସୁଚରିତ), କେବଳ ତାହା ତୁମେ ଅନୁସରଣ କରିବା ଉଚିତ, ଅନ୍ୟ ନୁହେଁ।
मा हिंसीः पुरुषान् पशूंश्च। मा गृधः कस्यस्विद् धनम्।ମନୁଷ୍ୟ ଓ ପଶୁମାନଙ୍କୁ ହିଂସା କର ନାହିଁ। କାହାର ଧନ ପ୍ରତି ଲୋଭ କର ନାହିଁ।
उत्तिष्ठत। जाग्रत! प्राप्य वरान्निबोधत।ଉଠ। ଜାଗ୍ରତ ହୁଅ। ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଜ୍ଞାନୀମାନଙ୍କ ପାଖରୁ ଜ୍ଞାନ ପ୍ରାପ୍ତ କରି ବୁଝ।
एष आदेशः। एष उपदेशः। एषा वेदोपनिषत्। एतदनुशासनम्। एवमुपासितव्यम्।ଏହା ଆଦେଶ। ଏହା ଉପଦେଶ। ଏହା ବେଦର ରହସ୍ୟ (ଉପନିଷଦ)। ଏହା ଅନୁଶାସନ। ଏହିପରି ଆଚରଣ କରିବା ଉଚିତ।
ଶବ୍ଦାର୍ଥ (ଟିପ୍ପଣୀ)
| ସଂସ୍କୃତ ଶବ୍ଦ | ଓଡ଼ିଆ ଅର୍ଥ |
| एकं सत् | ଏକମାତ୍ର ସତ୍ ତତ୍ତ୍ୱ (ପରମ ସତ୍ୟ) |
| बहुधा | ବହୁ ପ୍ରକାରରେ |
| ऋतस्य | ସତ୍ୟର (ଧର୍ମର) |
| पथा | ମାର୍ଗରେ |
| प्रेत | ଯାଅ (ଅଗ୍ରସର ହୁଅ) |
| अनृतात् | ମିଥ୍ୟାରୁ |
| श्रद्धया | ଆଦର/ଶ୍ରଦ୍ଧା ଦ୍ୱାରା |
| जागृयाम | ଜାଗ୍ରତ ହେବା ଉଚିତ |
| चक्षुषा | ଦୃଷ୍ଟିରେ |
| सखा / सख्ये | ମିତ୍ର / ବନ୍ଧୁକୁ (ସମ୍ପ୍ରଦାନ) |
| शिवसङ्कल्पम् | ଶୁଭ ବିଚାରମୟ |
| तमसः | ଅନ୍ଧକାରରୁ (ଅଜ୍ଞାନରୁ) |
| ज्योतिः | ଆଲୋକ (ଜ୍ଞାନ) |
| चरैवेति | ଅଗ୍ରସର ହୁଅ (चर + एव + इति) |
| मधु | ମଧୁ (ଅମୃତ, ସଫଳତା) |
| विद्यामृतमश्नुते | ବିଦ୍ୟା ଦ୍ୱାରା ଅମୃତ ଲାଭ କରେ |
| मा प्रमदः / प्रमदितव्यम् | ବିରତ ହୁଅ ନାହିଁ / ବିରତ ହେବା ଉଚିତ ନୁହେଁ |
| भूत्यै | ଉନ୍ନତି / ସମୃଦ୍ଧି ନିମିତ୍ତ |
| अनवद्यानि | ନିନ୍ଦାରହିତ, ଦୋଷଶୂନ୍ୟ |
| सुचरितानि | ଉତ୍ତମ ଆଚରଣ (ଆଦର୍ଶ ଚରିତ) |
| मा हिंसीः | ହିଂସା କର ନାହିଁ |
| मा गृधः | ଲୋଭ କର ନାହିଁ |
| वरान् | ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଜ୍ଞାନୀମାନଙ୍କୁ |
| निबोधत | ବୁଝ / ଜାଣ |
💡 ଏହି ପାଠର ଅଧିକାଂଶ ବାକ୍ୟ ତୈତ୍ତିରୀୟ ଉପନିଷଦର ‘ଶିକ୍ଷାବଲ୍ଲୀ’ ଓ ଅନ୍ୟ ବେଦ-ଉପନିଷଦରୁ ସଂଗୃହୀତ।
ଅଭ୍ୟାସ — ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ସମାଧାନ (ପ୍ରଶ୍ନ ସଂସ୍କୃତରେ · ଉତ୍ତର ଓଡ଼ିଆରେ)
୧. निजभाषया प्रायशः वाक्यद्वयेण उत्तरं लिखत।
୧(କ)कस्तावदुपदेशः? संप्रति एतेषामुपदेशानां कथं प्रासङ्गिकता अस्ति?
ପ୍ରାଚୀନ ଗୁରୁକୁଳରେ ଆଚାର୍ଯ୍ୟମାନେ ବେଦ ଓ ଶାସ୍ତ୍ରରୁ ସଦାଚାର ଶିକ୍ଷା ପାଇଁ ଯେଉଁ ସୂକ୍ତବାକ୍ୟ (ଅନୁଶାସନ) ଦେଉଥିଲେ, ତାହା ହିଁ ଉପଦେଶ। ଗୁରୁଙ୍କ ଉପଦେଶ ପାଇ ଆଚରଣରେ ପ୍ରୟୋଗ କଲେ ମନୁଷ୍ୟ ଅମୃତତ୍ୱ ଲାଭ କରେ। ଆଜିର ବିଜ୍ଞାନଯୁଗରେ ମଧ୍ୟ ଏହି ଉପଦେଶାମୃତର ପ୍ରାସଙ୍ଗିକତା ରହିଛି, କାରଣ ସତ୍ୟ, ଧର୍ମ, ସଦାଚାର ଓ ମୂଲ୍ୟବୋଧ ସର୍ବକାଳୀନ — ଯେକୌଣସି ଯୁଗରେ ମନୁଷ୍ୟକୁ ଉତ୍ତମ ଓ ନୈତିକ କରିବାରେ ସାହାଯ୍ୟ କରେ।
୧(ଖ)कुतः न प्रमदितव्यमिति उपदेशाः प्रदत्ताः?
सत्यात्, धर्मात्, कुशलात्, भूत्यै, स्वाध्यायप्रवचनाभ्याम्, देवपितृकार्याभ्याम् — ଅର୍ଥାତ୍ ସତ୍ୟ, ଧର୍ମ, କୁଶଳ (ମଙ୍ଗଳକାର୍ଯ୍ୟ), ଉନ୍ନତି, ଅଧ୍ୟୟନ-ଅଧ୍ୟାପନ ଏବଂ ଦେବକାର୍ଯ୍ୟ-ପିତୃକାର୍ଯ୍ୟ — ଏହିସବୁରୁ ବିରତ ହେବା ଉଚିତ ନୁହେଁ ବୋଲି ଉପଦେଶ ଦିଆଯାଇଛି।
୧(ଗ)कानि कर्माणि सेवितव्यानि उपास्यानि च?
ଯେଉଁ କର୍ମ अनवद्य (ନିନ୍ଦାରହିତ, ଦୋଷଶୂନ୍ୟ) — କେବଳ ସେଗୁଡ଼ିକ ହିଁ ସେବନ (କରିବା) ଉଚିତ, ଦୋଷଯୁକ୍ତ କର୍ମ ନୁହେଁ। ତଥା ଆଚାର୍ଯ୍ୟ (ଗୁରୁଜନ)ମାନଙ୍କ ଯେଉଁ ଆଚରଣ सुचरित (ଉତ୍ତମ), କେବଳ ତାହା ହିଁ ଅନୁସରଣ (ଉପାସନା) କରିବା ଉଚିତ, ଅନ୍ୟ ନୁହେଁ।
୨. संक्षेपेण उत्तरं लिखत।
୨(କ)किं के बहुधा वदन्ति?
एकं सत् (ଗୋଟିଏ ପରମ ସତ୍ୟ)କୁ विप्राः (ବିଦ୍ୱାନ)ମାନେ ବହୁ ପ୍ରକାରରେ କୁହନ୍ତି।
୨(ଖ)कस्य पथा प्रेत?
ऋतस्य (ସତ୍ୟ/ଧର୍ମର) ମାର୍ଗରେ ଅଗ୍ରସର ହେବା ଉଚିତ।
୨(ଗ)कथं सत्यम् आप्यते?
श्रद्धया (ଶ୍ରଦ୍ଧା ଦ୍ୱାରା) ସତ୍ୟ ପ୍ରାପ୍ତ ହୁଏ।
୨(ଘ)का मम माता?
भूमिः (ପୃଥିବୀ/ଭୂମି) ମୋର ମାତା।
୨(ଙ)ऋतस्य इति पदस्य कोऽर्थः?
‘ऋतस्य’ ପଦର ଅର୍ଥ — ସତ୍ୟର (ସତ୍ୟ/ଧର୍ମର)।
୨(ଚ)अहं कस्याः पुत्रः?
ମୁଁ पृथिव्याः (ପୃଥିବୀର) ପୁତ୍ର।
୨(ଛ)वयं कुत्र जागृयाम?
ଆମେ राष्ट्रे (ରାଷ୍ଟ୍ର ପାଇଁ) ଜାଗ୍ରତ ରହିବା।
୨(ଜ)केन वयं समीक्षामहे?
मित्रस्य चक्षुषा (ମିତ୍ରର ଦୃଷ୍ଟିରେ, ବନ୍ଧୁଭାବରେ) ଆମେ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଦେଖିବା।
୨(ଝ)कः सखा न भवति?
ଯେ सख्ये (ବନ୍ଧୁକୁ) କିଛି ददाति न (ଦିଏ ନାହିଁ), ସେ ପ୍ରକୃତ ସଖା (ବନ୍ଧୁ) ନୁହେଁ।
୨(ଞ)मम मनः कथमस्तु?
ମୋର ମନ शिवसङ्कल्पम् (ଶୁଭ ସଂକଳ୍ପଯୁକ୍ତ, କଲ୍ୟାଣକାରୀ) ହେଉ।
୨(ଟ)कुतः ज्योतिः आरोह?
तमसः (ଅନ୍ଧକାର/ଅଜ୍ଞାନରୁ) ଜ୍ୟୋତି (ଆଲୋକ/ଜ୍ଞାନ) ଆଡ଼କୁ ଆରୋହଣ କର।
୨(ଠ)कथं मधु विन्दति?
चरन् (ଗତିଶୀଳ/ପରିଶ୍ରମୀ ବ୍ୟକ୍ତି ହିଁ) ମଧୁ (ସଫଳତା/ଅମୃତ) ଲାଭ କରେ।
୨(ଡ)कस्यै न प्रमदितव्यम्?
भूत्यै (ଉନ୍ନତି/ସମୃଦ୍ଧି ନିମିତ୍ତ) ବିରତ ହେବା ଉଚିତ ନୁହେଁ।
୨(ଢ)आचार्यदेवः इति पदस्य कोऽर्थः?
‘आचार्यदेवः’ ଅର୍ଥ — ଗୁରୁଙ୍କୁ ଦେବତା ଜ୍ଞାନ କରୁଥିବା (ଗୁରୁ ଦେବତା ତୁଲ୍ୟ — ଏପରି ଭାବନା)।
୨(ଣ)कान् न हिंसीः?
पुरुषान् पशूंश्च (ମନୁଷ୍ୟ ଓ ପଶୁମାନଙ୍କୁ) ହିଂସା କରିବା ଉଚିତ ନୁହେଁ।
୨(ତ)कान् प्राप्य निबोधत?
वरान् (ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଜ୍ଞାନୀମାନଙ୍କୁ) ପାଇ ଜ୍ଞାନ ଲାଭ କରିବା ଉଚିତ।
୩. बन्धनीमध्यात् रेखाङ्कितपदस्य कारकविभक्तिगतं शुद्धम् उत्तरं चिनुत।
୩(କ)ऋतस्य पथा प्रेत।
ଉତ୍ତର: मार्गवाचकशब्दयोगे तृतीया। (‘पथा’ ମାର୍ଗବାଚକ ଶବ୍ଦ; ମାର୍ଗବାଚକ ଶବ୍ଦ ଯୋଗରେ ତୃତୀୟା ବିଭକ୍ତି ହୁଏ।)
୩(ଖ)श्रद्धया सत्यमाप्यते।
ଉତ୍ତର: करणे तृतीया। (ଶ୍ରଦ୍ଧା = ସାଧନ/କରଣ; କରଣ କାରକରେ ତୃତୀୟା।)
୩(ଗ)यो न ददाति सख्ये।
ଉତ୍ତର: संप्रदाने चतुर्थी। (ଯାହାକୁ ଦିଆଯାଏ ସେ ସମ୍ପ୍ରଦାନ; ‘ଦା’ ଧାତୁ ଯୋଗରେ ସମ୍ପ୍ରଦାନରେ ଚତୁର୍ଥୀ।)
୩(ଘ)आरोह तमसो ज्योतिः।
ଉତ୍ତର: अपादाने पञ्चमी। (ଅନ୍ଧକାରରୁ ଦୂରେଇ ଯିବାର ଭାବ; ଅପାଦାନରେ ପଞ୍ଚମୀ।)
୩(ଙ)विद्यया अमृतमश्नुते।
ଉତ୍ତର: करणे तृतीया। (ବିଦ୍ୟା = ଅମୃତ ଲାଭର ସାଧନ/କରଣ।)
୩(ଚ)धर्मात् न प्रमदितव्यम्।
ଉତ୍ତର: प्रमादार्थकधातुप्रयोगे पञ्चमी। (ପ୍ରମାଦ-ଅର୍ଥକ ଧାତୁ ଯୋଗରେ ଅପାଦାନ ପଞ୍ଚମୀ ହୁଏ।)
୩(ଛ)भूत्यै न प्रमदितव्यम्।
ଉତ୍ତର: निमित्तार्थे चतुर्थी। (“ଉନ୍ନତି ନିମିତ୍ତ” — ନିମିତ୍ତାର୍ଥେ ଚତୁର୍ଥୀ।)
୩(ଜ)तानि त्वयोपास्यानि।
ଉତ୍ତର: उक्ते कर्मणि प्रथमा। (କର୍ମବାଚ୍ୟରେ ଉକ୍ତ କର୍ମରେ ପ୍ରଥମା ବିଭକ୍ତି।)
୩(ଝ)मा हिंसीः पुरुषान् पशूंश्च।
ଉତ୍ତର: कर्मणि द्वितीया। (ହିଂସାର କର୍ମ ‘पुरुषान्’; କର୍ମଣି ଦ୍ୱିତୀୟା।)
୩(ଞ)प्राप्य वरान् निबोधत।
ଉତ୍ତର: कर्मणि द्वितीया। (‘वरान्’ = ପ୍ରାପ୍ତିର କର୍ମ; କର୍ମଣି ଦ୍ୱିତୀୟା।)
୪. वाक्यनिर्माणं कुरुत।
୪सत्यम्, श्रद्धया, ददाति, अस्तु, धर्मात्, प्राप्य।
सत्यम् — सत्यम् एव जयते। (ସତ୍ୟ ହିଁ ଜୟଯୁକ୍ତ ହୁଏ।)
श्रद्धया — श्रद्धया ज्ञानं प्राप्यते। (ଶ୍ରଦ୍ଧା ଦ୍ୱାରା ଜ୍ଞାନ ପ୍ରାପ୍ତ ହୁଏ।)
ददाति — सः दरिद्रेभ्यः धनं ददाति। (ସେ ଦରିଦ୍ରମାନଙ୍କୁ ଧନ ଦିଏ।)
अस्तु — तव मङ्गलम् अस्तु। (ତୁମର ମଙ୍ଗଳ ହେଉ।)
धर्मात् — धर्मात् न प्रमदितव्यम्। (ଧର୍ମରୁ ବିଚ୍ୟୁତ ହେବା ଉଚିତ ନୁହେଁ।)
प्राप्य — विद्यां प्राप्य नरः विद्वान् भवति। (ବିଦ୍ୟା ପାଇ ମନୁଷ୍ୟ ବିଦ୍ୱାନ ହୁଏ।)
୫. सन्धिविधानं कुरुत। (ସନ୍ଧି ଯୋଡ଼)
୫सत्यम् + उपैमि ... एवम् + उपासितव्यम्।
सत्यम् + उपैमि = सत्यमुपैमि
सत्यम् + आप्यते = सत्यमाप्यते
चर + एव + इति = चरैवेति
स्वाध्यायात् + मा = स्वाध्यायान्मा
यानि + अनवद्यानि = यान्यनवद्यानि
पशून् + च = पशूंश्च
एतत् + अनुशासनम् = एतदनुशासनम्
एवम् + उपासितव्यम् = एवमुपासितव्यम्
୬. सन्धिविच्छेदं कुरुत। (ସନ୍ଧି ବିଚ୍ଛେଦ)
୬उपदेशामृतम् ... एष आदेशः।
उपदेशामृतम् = उपदेश + अमृतम्
यदनुशासनम् = यत् + अनुशासनम्
विज्ञानयुगेऽपि = विज्ञानयुगे + अपि
सद्विप्राः = सत् + विप्राः
अहमनृतात् = अहम् + अनृतात्
पुत्रोऽहम् = पुत्रः + अहम्
तन्मे = तत् + मे
सत्यान्न = सत्यात् + न
त्वयोपास्यानि = त्वया + उपास्यानि
यान्यस्माकम् = यानि + अस्माकम्
एष आदेशः = एषः + आदेशः
୭. बन्धनीमध्यात् विग्रहवाक्यं/समस्तपदं/समासनाम चित्वा शुद्धम् उत्तरं लिखत।
୭(କ)गुरुकुले (गुरोः कुलं तस्मिन् / गुरुः एव कुलं तस्मिन् / गुरुणा कुलं तस्मिन्)।
ଉତ୍ତର: गुरोः कुलं तस्मिन् (ଷଷ୍ଠୀ ତତ୍ପୁରୁଷ ସମାସ)।
୭(ଖ)उपदेशः एव अमृतम् (उपदेशामृतेन / उपदेशामृतः / उपदेशामृतम्)।
ଉତ୍ତର: उपदेशामृतम्।
୭(ଗ)विज्ञानयुगे (कर्मधारयः / द्विगुः / षष्ठी तत्पुरुषः)।
ଉତ୍ତର: षष्ठी तत्पुरुषः (विज्ञानस्य युगम्)।
୭(ଘ)विद्यार्थिनाम् (विद्याम् अर्थयन्ते ये तेषाम् / विद्या एव अर्थाः तेषाम् / विद्यायाः अर्थाः तेषाम्)।
ଉତ୍ତର: विद्याम् अर्थयन्ते ये तेषाम् (ଉପପଦ ତତ୍ପୁରୁଷ)।
୭(ଙ)आचार्यः देवः यस्य सः (आचार्यदेवता / आचार्यदेवः / आचार्यदेवी)।
ଉତ୍ତର: आचार्यदेवः (ବହୁବ୍ରୀହି ସମାସ)।
୭(ଚ)अनवद्यानि (नञ् तत्पुरुषः / निषेधार्थबहुव्रीहि / कर्मधारयः)।
ଉତ୍ତର: नञ् तत्पुरुषः (न अवद्यम् = अनवद्यम्)।
୭(ଛ)सुशिक्षार्थम् (सुशिक्षायाः इदम् / सुशिक्षायै इदम् / सुशिक्षायै इयम्)।
ଉତ୍ତର: सुशिक्षायै इदम् (ଚତୁର୍ଥୀ ତତ୍ପୁରୁଷ — ‘ସୁଶିକ୍ଷା ନିମିତ୍ତ’)।
୭(ଜ)वेदोपनिषत् (वेदश्चासौ उपनिषत् च / वेदौ च उपनिषत् च / वेदाश्चासौ उपनिषत् च)।
ଉତ୍ତର: वेदश्चासौ उपनिषत् च (କର୍ମଧାରୟ ସମାସ)।
୮. बन्धनीमध्यात् शुद्धं प्रकृतिगतं प्रत्ययगतं वा उत्तरं चित्वा शून्यस्थानं पूरयत।
୮उपदेशः, सूक्ते, अनुशासनम्, प्राप्य, चरन्, प्रमदितव्यम्, प्रवचनाभ्याम्, सेवितव्यानि, आदेशः।
(କ) उपदेशः = उप + दिश् + घञ् — ‘दिश्’
(ଖ) सूक्ते = सु + वच् + क्त — ‘वच्’
(ଗ) अनुशासनम् = अनु + शास् + ल्युट् — ‘ल्युट्’
(ଘ) प्राप्य = प्र + आप् + ल्यप् — ‘ल्यप्’
(ଙ) चरन् = चर् + शतृ — ‘शतृ’
(ଚ) प्रमदितव्यम् = प्र + मद् + तव्य — ‘तव्य’
(ଛ) प्रवचनाभ्याम् = प्र + वच् + ल्युट् — ‘ल्युट्’
(ଜ) सेवितव्यानि = सेव् + तव्य — ‘सेव्’
(ଝ) आदेशः = आ + दिश् + घञ् — ‘घञ्’
୯. स्त्रीप्रत्यये रूपाणि लिखत। (ସ୍ତ୍ରୀଲିଙ୍ଗ ରୂପ)
୯आचार्य, गुरु, मनुष्य, पुत्र, पुरुष, सत्, सखि।
आचार्य → आचार्या (टाप्)
गुरु → गुर्वी (ङीष्)
मनुष्य → मनुष्या (टाप्)
पुत्र → पुत्री (ङीप्)
पुरुष → पुरुषी (ङीष् ଯୋଗରେ; ଅଳ୍ପ ପ୍ରଚଳିତ)
सत् → सती (ङीप्)
सखि → सखी (ସ୍ତ୍ରୀ ବନ୍ଧୁ)