बोध — लेखक परिचय, पात्र-परिचय, कहानी का सार एवं शब्दार्थ
लेखक परिचय : प्रेमचन्द
प्रेमचन्द का जन्म उत्तर प्रदेश में बनारस के पास लमही गाँव में 31 जुलाई, सन् 1880 को एक कायस्थ परिवार में हुआ था। बचपन का नाम धनपतराय था। आरम्भ में उर्दू-फारसी की शिक्षा पाई, फिर मैट्रिक व बी.ए. किया। स्कूल में अध्यापक और बाद में डिप्टी इंस्पेक्टर बने, पर गांधी जी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर नौकरी से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने लगभग ढाई सौ से अधिक कहानियाँ, बारह उपन्यास और कुछ निबंध लिखे; ‘हंस’ और ‘जागरण’ पत्रिकाओं का संपादन किया। उनकी समस्त कहानियाँ ‘मानसरोवर’ (आठ भाग) में संकलित हैं। हिन्दी कहानी-साहित्य में प्रेमचन्द ने सबसे पहले कल्पना के बदले मानव-जीवन को विषय बनाया — किसान-मजदूर, शोषित-दलित और दुःखी नर-नारियों के जीवन को सहानुभूति के साथ चित्रित किया। उनकी भाषा सरल, बोलचाल की और सजीव है, जिसमें देहाती शब्द भी मिलते हैं। प्रमुख उपन्यास — सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, कायाकल्प, निर्मला, गबन, कर्मभूमि, गोदान, मंगल-सूत्र (अपूर्ण)। प्रेमचन्द को ‘उपन्यास सम्राट’ कहा जाता है।
पात्र-परिचय
• पं. चन्द्रधर — एक गरीब, ईमानदार अध्यापक (मुदर्रिस); अल्प वेतन से असंतुष्ट, भाग्य को कोसते रहते।
• ठाकुर अतिबल सिंह — थाने के हेड कांस्टेबल; भ्रष्ट, घमंडी, ऐशोआराम में डूबे।
• मुंशी बैजनाथ — तहसील के सियाहनवीस; घूसखोर, शराब-कबाब के व्यसनी।
• डॉ. चोखेलाल — बिल्हौर के अस्पताल के कम्पौंडर (डॉक्टर), जिससे मुंशी बैजनाथ ने तहसील में घूस वसूली थी।
• कृपाशंकर — पं. चन्द्रधर का पुराना शिष्य; अयोध्या में म्युनिसिपल्टी में नौकर; विनम्र एवं कृतज्ञ।
कहानी का सार
यह प्रेमचन्द की एक मार्मिक कहानी है, जिसका संदेश है — ‘जैसे बोओगे वैसे काटोगे’ और सच्ची सेवा (शिक्षकता) ही महान कर्म है। पं. चन्द्रधर एक अपर प्राइमरी में अध्यापक थे, जिन्हें मात्र पंद्रह रुपये मासिक मिलते; वे गरीबी में सदा पछताते और अपने भाग्य को कोसते कि ‘हमसे तो मजूर ही भले’। उनके पड़ोस में ठाकुर अतिबल सिंह (हेड कांस्टेबल) और मुंशी बैजनाथ (सियाहनवीस) रहते थे — वेतन लगभग उतना ही, पर घूस और रौब के बल पर ऐशोआराम में रहते, बाजार में उन्हें सस्ती चीजें मिलतीं। वे पंडित जी से ‘अनुग्रहपूर्ण’ ढंग से अपने बच्चों की निगरानी करवाते, मानो वे उनके गुलाम हों। पंडित जी इसे ‘विष के घूँट’ की तरह पीते रहते।
एक बार तीनों अयोध्या की यात्रा पर निकले (ठाकुर व मुंशी ने पंडित जी का खर्च देना स्वीकार किया)। रेलगाड़ी के डिब्बे में उन्हें वे चार मुसाफिर मिले जिन्हें पहले इन्हीं ठाकुर-मुंशी ने सताया था। मुसाफिरों ने बदला लेते हुए उन्हें बैठने की जगह नहीं दी, अपमानित किया और प्लेटफार्म पर धक्का दे दिया। आगे मुंशी बैजनाथ हैजे (कै-दस्त) से बुरी तरह बीमार पड़ गए। जिस डॉ. चोखेलाल से मुंशी ने तहसील में कभी घूस वसूली थी, उसी ने अब बदला लेकर इलाज की मोटी फीस (दस रुपये रोज) वसूली — मुंशी का गहना तक बिक गया।
अयोध्या पहुँचकर कहीं ठिकाना न मिला; रात को आँधी-तूफान और बारिश में सब विवश हो गए। तभी पंडित जी का पुराना शिष्य कृपाशंकर लालटेन लिए आता दिखा; उसने गुरु के चरण छुए, सबको अपने घर ले जाकर शानदार आतिथ्य किया और कहा — ‘गुरुजी के कारण ही मैं आदमी बना हूँ।’ तीन दिन उसने सबको हर धाम के दर्शन कराए और विदा करते समय सजल नेत्रों से बोला — ‘कभी-कभी इस सेवक को याद करते रहिएगा।’
बोध (निष्कर्ष): रेलगाड़ी की रगड़-झगड़ और अस्पताल की नोच-खसोट के सामने कृपाशंकर की सहायता और शालीनता पंडित जी को प्रकाशमय लगी। उन्हें आज शिक्षक-पद का गौरव और शिक्षकता की महानता का बोध (ज्ञान) हुआ। उनके स्वभाव में बड़ा परिवर्तन आया — उन्होंने फिर कभी अपने भाग्य को नहीं कोसा और न शिक्षक का पद छोड़कर किसी दूसरे विभाग में जाने की चेष्टा की।
शब्दार्थ
बोध = ज्ञान, जानकारी, तसल्ली। मुदर्रिसी = अध्यापक की नौकरी, शिक्षकता। जंजाल = झंझट, बखेड़ा। मजूर = मजदूर। मुंशी = मुहर्रिर (कायस्थों की उपाधि)। तहसील = तहसीलदार का दफ्तर/कचहरी। सियाहनवीस = सरकारी खजाने में सियाहा लिखनेवाला। खमीरा = तम्बाकू में डाला जाने वाला सड़ाव। कबाब = सींखों पर भुना मांस। रोबदाब = बड़प्पन की धाक, दबदबा। बनिया = व्यापारी, आटा-दाल बेचनेवाला। टका = अधन्ना (दो पैसे)। ठाठ-बाट = आडम्बर, तड़क-भड़क। कुढ़ते = मन-ही-मन खीझते। कोसते = गालियाँ देते। ऊसर = खारी/क्षारयुक्त भूमि जिसमें घास तक नहीं जमती। मेले-ठेले = भीड़-भाड़। असमंजस = दुविधा। खुफिया = गुप्त, छिपा हुआ। फरोसी = बेचनेवाला। रियायत = छूट, नरमी। ठट्ठा मारकर हँसना = उपहास करना। दरोगा = थानेदार। हेठी = तौहीन, मानहानि। वैर = दुश्मनी। कचूमर निकालना = खूब पीटना/कुचलना। हैजा = विशूचिका (कै-दस्त की बीमारी)। ढाढ़स = आश्वासन, धैर्य। डोली = कहारों के कंधों पर चलने वाली पालकी। नोच-खसोट = छीना-झपटी। शालीनता = विनम्रता। जनाब = आदरसूचक शब्द। चंगा = स्वस्थ। डेरा = पड़ाव, ठिकाना।
प्रश्न और अभ्यास — उत्तर
1पण्डित चन्द्रधर हमेशा क्यों पछताया करते थे?
पण्डित चन्द्रधर इसलिए पछताते थे कि वे शिक्षकता के जंजाल में फँस गए। उन्हें मात्र पंद्रह रुपये मासिक मिलते थे, न बाहर की कोई आमदनी थी, न पदोन्नति — न खाने का सुख, न पहनने का आराम। वे सोचते कि यदि किसी अन्य विभाग में नौकरी होती तो आराम से जीवन कटता।
2पण्डितजी क्यों कहा करते थे कि ‘हमसे तो मजूर ही भले’?
क्योंकि मजदूर को कम-से-कम दिन भर की मेहनत का उचित पैसा तो मिल जाता है, जबकि पंडित जी को महीने भर पढ़ाने के बाद भी केवल पंद्रह रुपये मिलते, वे भी इधर आये उधर गायब! इस घोर गरीबी और अभाव के कारण उन्हें लगता था कि उनकी दशा मजदूर से भी बुरी है।
3ठाकुर अतिबल सिंह और मुंशी बैजनाथ के लिए बाजार में कैसे अलग भाव था?
रौब-दबदबे के कारण बनिये उन्हें आते-जाते देखकर उठकर सलाम करते थे और उनके लिए बाजार में अलग (सस्ता) भाव था — चार पैसे की चीज वे टके (दो पैसे) में ले आते और लकड़ी-ईंधन मुफ्त में मिल जाता। अर्थात् घूस-रौब के बल पर उन्हें हर चीज सस्ती या मुफ्त मिलती थी।
4ठाकुर साहब और मुंशीजी की कृपा के बदले में पण्डितजी को क्या करना पड़ता था?
उनकी ‘कृपा’ (कभी थोड़ा दूध, दही या तरकारी भेजने) के बदले पंडित जी को ठाकुर साहब के दो और मुंशीजी के तीन लड़कों की निगरानी (देखरेख) करनी पड़ती थी — इन्हें पढ़ाना-सँभालना पड़ता। यह बात बड़े अनुग्रहपूर्ण ढंग से कही जाती, मानो पंडित जी उनके गुलाम हों।
5पहले मुसाफिर ने ठाकुर अतिबल सिंह को गाड़ी में क्यों नहीं बैठने दिया?
क्योंकि वह वही व्यक्ति था जिस पर ठाकुर साहब ने पहले ‘खुफिया फरोसी’ का झूठा अपराध लगाया था और उससे 25 रुपये नकद लेकर छोड़ा था। अब मौका पाकर उसने बदला लेते हुए ठाकुर को जगह नहीं दी और कहा कि ‘मैंने भी तुम्हारे साथ रियायत की कि गाड़ी में खड़ा रहने दिया, ढकेल देता तो तुम्हारी हड्डी-पसली का पता न लगता’।
6डाक्टर चोखेलाल मुंशी बैजनाथ से क्यों नाराज था?
डॉ. चोखेलाल का घर बिल्हौर में था और वहाँ उसकी थोड़ी जमीन थी। जब वह तहसील में लगान जमा करने जाता, तो मुंशी बैजनाथ डाँटकर, अपना हक (घूस) वसूल कर लेते; न देने पर उसे शाम तक खड़ा रखते। इसी पुराने अपमान और घूस का बदला लेने के लिए चोखेलाल मुंशीजी से नाराज था और उसने इलाज की मोटी फीस (दस रुपये रोज) वसूली।
7पण्डित चन्द्रधर को नींद क्यों नहीं आयी? / उन्हें किस बात का बोध हुआ?
यात्रा की घटनाएँ उनकी विचार-शक्ति में घूम रही थीं। रेलगाड़ी की रगड़-झगड़ और अस्पताल की नोच-खसोट के सामने शिष्य कृपाशंकर की सहायता और शालीनता उन्हें प्रकाशमय दिखाई दे रही थी — इसी से उन्हें नींद नहीं आई। उन्हें बोध हुआ कि शिक्षकता महान कर्म है और शिक्षक का पद गौरवपूर्ण है। फिर उन्होंने न अपने भाग्य को कोसा, न शिक्षक-पद छोड़ने की चेष्टा की।
8एक-दो वाक्य: (क) पण्डित जी के पड़ोस में कौन-कौन रहते थे? (ख) संध्या को मुंशी बैजनाथ क्या करते थे? (ग) ठाकुर साहब शाम को क्या करते थे? (घ) ‘ऊसर की खेती’ किसे कहा गया है? (ङ) कृपाशंकर ने बिल्हौर से कौन-सी परीक्षा पास की और अयोध्या में किस पद पर था?
(क) ठाकुर अतिबल सिंह (हेड कांस्टेबल) और मुंशी बैजनाथ (सियाहनवीस)। (ख) शराब पीकर, बोतल पर बोतल साफ करते और नशा होने पर हारमोनियम बजाते। (ग) आराम कुर्सी पर लेटकर खुशबूदार खमीरा पीते। (घ) इस विभाग (शिक्षा) की वेतन-वृद्धि को, जो बहुत कठिनाई से मिलती थी। (ङ) इंट्रेंस परीक्षा पास की; अयोध्या में म्युनिसिपल्टी में नौकर था।
9एक शब्द: (क) ‘बोध’ कहानी किसने लिखी? (ख) महीने भर बाद पण्डित जी को कितने रुपये मिलते थे? (ग) ठाकुर साहब आराम कुर्सी पर क्या पीते थे? (घ) मुंशी जी को कौन-सा व्यसन था? (ङ) दोनों महाशयों ने कितने सप्ताह की छुट्टी ली? (च) डॉक्टर चोखेलाल कहाँ के रहनेवाले थे? (छ) शिक्षक का गौरव किसने समझा?
(क) प्रेमचन्द। (ख) पंद्रह रुपये। (ग) खमीरा। (घ) शराब-कबाब का। (ङ) एक-एक सप्ताह। (च) बिल्हौर के। (छ) पं. चन्द्रधर ने।
10अवतरणों के अर्थ स्पष्ट कीजिए: (क) ‘हमसे तो मजूर ही भले।’ (ख) ‘परन्तु इस विभाग की वेतन-वृद्धि ऊसर की खेती है।’ (ग) ‘पण्डित जी ने आज शिक्षक का गौरव समझा।’
(क) पंडित जी की गरीबी इतनी थी कि उन्हें मजदूर की दशा अपने से अच्छी लगती थी — मजदूर को कम-से-कम मेहनत का उचित पैसा तो मिल जाता है।
(ख) जैसे ऊसर (खारी) भूमि में कुछ नहीं उगता, वैसे ही शिक्षा-विभाग में वेतन-वृद्धि बहुत कठिनाई से, कभी-कभार ही मिलती थी — अर्थात् लगभग न के बराबर।
(ग) कृपाशंकर की सेवा-भावना देखकर पंडित जी को समझ आया कि शिक्षकता सबसे महान कर्म है; शिक्षक अनेक लोगों को ‘आदमी’ बनाता है — यही उसका सच्चा गौरव है।
11रिक्त स्थान भरिए: (क) ___ पैसे की चीज टके में लाते। (ख) ईश्वर ने उन्हें इतनी ___ दे रखी थी। (ग) आपने आकर मेरा ___ निकाल दिया। (घ) दारोगा जी ने ___ कर एक डोली का प्रबन्ध किया। (ङ) मेरे पिता कुछ दिनों बिल्हौर के ___ रहे थे।
(क) चार। (ख) प्रभुता। (ग) कचूमर। (घ) दौड़-धूप। (ङ) डाक-मुंशी।
12(MCQ) सही विकल्प: (क) पण्डित चन्द्रधर को कितने रुपये मासिक वेतन मिलता था? (ख) मुंशी बैजनाथ के कितने लड़के थे? (ग) ‘आपके खून का प्यासा हूँ’ का अर्थ? (घ) ‘पण्डित जी ने शिक्षक का गौरव समझा’ का आशय?
(क) (iii) पन्द्रह। (ख) (iii) तीन। (ग) (iii) वध करना चाहता हूँ। (घ) (i) शिक्षकता का महत्त्व अधिक है।