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गद्य पाठ 2: बोध

गद्य विभाग · पाठ 2 · हिन्दी सौरभ

हिन्दी (गद्य) · Odisha Board Class 10 · प्रेमचन्द (कहानी) · 25 क्विज़

बोध — लेखक परिचय, पात्र-परिचय, कहानी का सार एवं शब्दार्थ

लेखक परिचय : प्रेमचन्द

प्रेमचन्द का जन्म उत्तर प्रदेश में बनारस के पास लमही गाँव में 31 जुलाई, सन् 1880 को एक कायस्थ परिवार में हुआ था। बचपन का नाम धनपतराय था। आरम्भ में उर्दू-फारसी की शिक्षा पाई, फिर मैट्रिक व बी.ए. किया। स्कूल में अध्यापक और बाद में डिप्टी इंस्पेक्टर बने, पर गांधी जी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर नौकरी से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने लगभग ढाई सौ से अधिक कहानियाँ, बारह उपन्यास और कुछ निबंध लिखे; ‘हंस’ और ‘जागरण’ पत्रिकाओं का संपादन किया। उनकी समस्त कहानियाँ ‘मानसरोवर’ (आठ भाग) में संकलित हैं। हिन्दी कहानी-साहित्य में प्रेमचन्द ने सबसे पहले कल्पना के बदले मानव-जीवन को विषय बनाया — किसान-मजदूर, शोषित-दलित और दुःखी नर-नारियों के जीवन को सहानुभूति के साथ चित्रित किया। उनकी भाषा सरल, बोलचाल की और सजीव है, जिसमें देहाती शब्द भी मिलते हैं। प्रमुख उपन्यास — सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, कायाकल्प, निर्मला, गबन, कर्मभूमि, गोदान, मंगल-सूत्र (अपूर्ण)। प्रेमचन्द को ‘उपन्यास सम्राट’ कहा जाता है।

पात्र-परिचय

• पं. चन्द्रधर — एक गरीब, ईमानदार अध्यापक (मुदर्रिस); अल्प वेतन से असंतुष्ट, भाग्य को कोसते रहते।
• ठाकुर अतिबल सिंह — थाने के हेड कांस्टेबल; भ्रष्ट, घमंडी, ऐशोआराम में डूबे।
• मुंशी बैजनाथ — तहसील के सियाहनवीस; घूसखोर, शराब-कबाब के व्यसनी।
• डॉ. चोखेलाल — बिल्हौर के अस्पताल के कम्पौंडर (डॉक्टर), जिससे मुंशी बैजनाथ ने तहसील में घूस वसूली थी।
• कृपाशंकर — पं. चन्द्रधर का पुराना शिष्य; अयोध्या में म्युनिसिपल्टी में नौकर; विनम्र एवं कृतज्ञ।

कहानी का सार

यह प्रेमचन्द की एक मार्मिक कहानी है, जिसका संदेश है — ‘जैसे बोओगे वैसे काटोगे’ और सच्ची सेवा (शिक्षकता) ही महान कर्म है। पं. चन्द्रधर एक अपर प्राइमरी में अध्यापक थे, जिन्हें मात्र पंद्रह रुपये मासिक मिलते; वे गरीबी में सदा पछताते और अपने भाग्य को कोसते कि ‘हमसे तो मजूर ही भले’। उनके पड़ोस में ठाकुर अतिबल सिंह (हेड कांस्टेबल) और मुंशी बैजनाथ (सियाहनवीस) रहते थे — वेतन लगभग उतना ही, पर घूस और रौब के बल पर ऐशोआराम में रहते, बाजार में उन्हें सस्ती चीजें मिलतीं। वे पंडित जी से ‘अनुग्रहपूर्ण’ ढंग से अपने बच्चों की निगरानी करवाते, मानो वे उनके गुलाम हों। पंडित जी इसे ‘विष के घूँट’ की तरह पीते रहते।

एक बार तीनों अयोध्या की यात्रा पर निकले (ठाकुर व मुंशी ने पंडित जी का खर्च देना स्वीकार किया)। रेलगाड़ी के डिब्बे में उन्हें वे चार मुसाफिर मिले जिन्हें पहले इन्हीं ठाकुर-मुंशी ने सताया था। मुसाफिरों ने बदला लेते हुए उन्हें बैठने की जगह नहीं दी, अपमानित किया और प्लेटफार्म पर धक्का दे दिया। आगे मुंशी बैजनाथ हैजे (कै-दस्त) से बुरी तरह बीमार पड़ गए। जिस डॉ. चोखेलाल से मुंशी ने तहसील में कभी घूस वसूली थी, उसी ने अब बदला लेकर इलाज की मोटी फीस (दस रुपये रोज) वसूली — मुंशी का गहना तक बिक गया।

अयोध्या पहुँचकर कहीं ठिकाना न मिला; रात को आँधी-तूफान और बारिश में सब विवश हो गए। तभी पंडित जी का पुराना शिष्य कृपाशंकर लालटेन लिए आता दिखा; उसने गुरु के चरण छुए, सबको अपने घर ले जाकर शानदार आतिथ्य किया और कहा — ‘गुरुजी के कारण ही मैं आदमी बना हूँ।’ तीन दिन उसने सबको हर धाम के दर्शन कराए और विदा करते समय सजल नेत्रों से बोला — ‘कभी-कभी इस सेवक को याद करते रहिएगा।’

बोध (निष्कर्ष): रेलगाड़ी की रगड़-झगड़ और अस्पताल की नोच-खसोट के सामने कृपाशंकर की सहायता और शालीनता पंडित जी को प्रकाशमय लगी। उन्हें आज शिक्षक-पद का गौरव और शिक्षकता की महानता का बोध (ज्ञान) हुआ। उनके स्वभाव में बड़ा परिवर्तन आया — उन्होंने फिर कभी अपने भाग्य को नहीं कोसा और न शिक्षक का पद छोड़कर किसी दूसरे विभाग में जाने की चेष्टा की।

शब्दार्थ

बोध = ज्ञान, जानकारी, तसल्ली। मुदर्रिसी = अध्यापक की नौकरी, शिक्षकता। जंजाल = झंझट, बखेड़ा। मजूर = मजदूर। मुंशी = मुहर्रिर (कायस्थों की उपाधि)। तहसील = तहसीलदार का दफ्तर/कचहरी। सियाहनवीस = सरकारी खजाने में सियाहा लिखनेवाला। खमीरा = तम्बाकू में डाला जाने वाला सड़ाव। कबाब = सींखों पर भुना मांस। रोबदाब = बड़प्पन की धाक, दबदबा। बनिया = व्यापारी, आटा-दाल बेचनेवाला। टका = अधन्ना (दो पैसे)। ठाठ-बाट = आडम्बर, तड़क-भड़क। कुढ़ते = मन-ही-मन खीझते। कोसते = गालियाँ देते। ऊसर = खारी/क्षारयुक्त भूमि जिसमें घास तक नहीं जमती। मेले-ठेले = भीड़-भाड़। असमंजस = दुविधा। खुफिया = गुप्त, छिपा हुआ। फरोसी = बेचनेवाला। रियायत = छूट, नरमी। ठट्ठा मारकर हँसना = उपहास करना। दरोगा = थानेदार। हेठी = तौहीन, मानहानि। वैर = दुश्मनी। कचूमर निकालना = खूब पीटना/कुचलना। हैजा = विशूचिका (कै-दस्त की बीमारी)। ढाढ़स = आश्वासन, धैर्य। डोली = कहारों के कंधों पर चलने वाली पालकी। नोच-खसोट = छीना-झपटी। शालीनता = विनम्रता। जनाब = आदरसूचक शब्द। चंगा = स्वस्थ। डेरा = पड़ाव, ठिकाना।

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