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गद्य पाठ 1: मधुर भाषण

गद्य विभाग · पाठ 1 · हिन्दी सौरभ

हिन्दी (गद्य) · Odisha Board Class 10 · गुलाबराय (निबंध) · 25 क्विज़

मधुर भाषण — लेखक परिचय, सार, मुख्य बिंदु एवं शब्दार्थ

लेखक परिचय : गुलाबराय

गुलाबराय का जन्म सन् 1888 में इटावा में हुआ। माता-पिता की धार्मिक और दार्शनिक प्रवृत्ति का उन पर विशेष प्रभाव पड़ा। उन्होंने दर्शन शास्त्र में एम.ए. और एल.एल.बी. की परीक्षा पास की; दर्शन पर कई पुस्तकें लिखीं। बाद में उनकी रुचि साहित्य में हुई — वे आगरा के सेंट जान्स कॉलेज में अध्यापक रहे और ‘साहित्य संदेश’ का सफल संपादन किया। दर्शन, इतिहास, राजनीति और साहित्य पर उनके अमूल्य ग्रंथ हैं; आगरा विश्वविद्यालय ने उन्हें डी.लिट्. की उपाधि दी। दार्शनिक रचनाएँ — मन की बातें, कर्तव्य शास्त्र, पाश्चात्य दर्शन का इतिहास, बौद्धधर्म; आलोचनात्मक — नवरस, प्रसादजी की कला, सिद्धांत और अध्ययन, हिन्दी नाट्य विमर्श; निबंध-संग्रह — ठलुआक्लब, प्रबंध प्रभाकर, जीवन पथ, मेरी असफलताएँ, फिर निराशा क्यों आदि। उनके निबंधों में विषय-प्रतिपादन की स्पष्टता और गहराई है।

निबंध का सार

भाषा का महत्व: भाषा मनुष्य की सबसे बड़ी संपत्ति है। भाषा के कारण ही मनुष्य उन्नति कर सका; शारीरिक बल में कम होते हुए भी बुद्धि और भाषा के बल पर उसने पंच महाभूतों को वश में कर लिया। भाषा से ज्ञान और अनुभव की रक्षा होती है और समाज में मनुष्य की सामाजिकता कायम रहती है। किंतु भाषा का दुरुपयोग समाज को छिन्न-भिन्न भी कर देता है — एक मधुर शब्द दो रूठों को मिला देता है और एक कटु शब्द दो मित्रों में वैमनस्य उत्पन्न कर देता है।

मधुर भाषण क्या है: जो वस्तु मन को अच्छी लगे (मनोनुकूल हो) और जिससे चित्त द्रवित (पिघल) हो, वही मधुर कहलाती है। चित्त को पिघलाने वाले आनंद को ‘माधुर्य’ कहते हैं। मधुर वचन हृदय-द्वार खोलने की कुंजी है; उसका आकर्षण न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण और चुंबक से भी बढ़कर है। तुलसीदास ने कहा है — ‘कोयल काको देत है, कागा कासो लेत। तुलसी मीठे बचन ते, जग अपनो करि लेत॥’ एक ही बात को हम कठोर (कर्णकटु) शब्दों में भी कह सकते हैं और मधुर भी बना सकते हैं।

मधुर वचन की शक्ति: मधुर भाषी की वाणी विश्वास उत्पन्न करके भय और आतंक को दूर कर देती है। कटुभाषी से लोग हृदय खोलकर बात करने में डरते हैं। जब बुरे वचन आदमी को रुष्ट कर सकते हैं, तो मधुर वचन दूसरे को प्रसन्न भी कर सकते हैं — ‘शब्दों का जादू बड़ा जबरदस्त होता है।’

कथनी-करनी का साम्य: केवल मधुर वचन काफी नहीं; उनके पीछे टकसाली (सच्ची) भावना भी होनी चाहिए, नहीं तो वे मुलम्मे (नकली) के सिक्कों की भाँति बेकार रहेंगे। वचन के अनुकूल जब कर्म भी होते हैं, तभी मनुष्य वंद्य (आदरणीय) बनता है। मन, वाणी और कर्म का सामंजस्य ही मनुष्य को श्रेष्ठता के पद पर पहुँचाता है — फिर भी वचनों का विशेष महत्व है, क्योंकि एक कटु वचन सारे किए-धरे पर पानी फेर सकता है।

शिष्टाचार: वार्तालाप की शिष्टता मनुष्य को आदर का भाजन बनाती है। शिष्टाचार का अर्थ दिखावा नहीं, सज्जनोचित व्यवहार है। किसी काम के लिए ‘कृपया’ कहना और काम होने पर ‘धन्यवाद’ कहना शिष्टता का परिचायक है। अपने से नीचे/कम स्थिति के लोगों के स्वाभिमान की रक्षा करना सज्जन का पहला कर्तव्य है। कोई काम प्रसन्नता से करना चाहिए और ‘वचने दरिद्रता’ (कथन में कंजूसी) नहीं दिखानी चाहिए।

इनकार का ढंग एवं वार्तालाप: यदि इनकार करना ही पड़े तो उसमें अधिकार और अभिमान की गंध न हो; इनकार करते समय खेद प्रकट करना चाहिए। वार्तालाप में व्यापारिक (जाब्ते की) बातचीत और निजी बातचीत में थोड़ा अंतर रखना चाहिए — व्यापारिक बातचीत नपी-तुली हो सकती है, पर निजी बातचीत में आत्मीयता (निजीपन) का अभाव न हो; तथा बात उतनी ही कही जाए जितनी निभाई जा सके।

निष्कर्ष: मधुर बोलकर, शिष्ट व्यवहार से और करनी-कथनी के मेल से हम दूसरों का दिल जीत सकते हैं। हमें भद्र, सभ्य और सरल बनना चाहिए — यही मानवता के लक्षण हैं। संसार में सफलता और कामयाबी की कुंजी मीठी बात ही है।

शब्दार्थ

भौतिक बल = शारीरिक ताकत। न्यून = कम। पंचमहाभूत = पृथ्वी, जल, आकाश, वायु, अग्नि। सहकारिता = सबसे मिलकर काम करना। वैमनस्य = विरोधी भाव, नाराजगी। माधुर्य = मधुरता। मनोनुकूल = मन को अच्छा लगने वाला। कादम्बरी = बाणभट्ट रचित प्रसिद्ध गद्यकाव्य (संस्कृत)। गलतफहमी = भ्रम धारणा। चालढाल = आचार-व्यवहार। जबरदस्त = जोरदार। टकसाली भाव = सच्ची भावना। मुलम्मे के सिक्के = नकली मुद्रा। कटु = तिक्त, कड़वा। शिष्ट = भद्र। सैद्धान्तिक = किसी सिद्धांत से सम्बंधित। मजबूरी = बाध्यता। वार्तालाप = बातचीत। विषभरे कनकघट = बाहर से आकर्षक मगर भीतर से हानिकारक (सफेद भेष में काले दिलवाला)। वचने दरिद्रता = कथन में कमी/कंजूसी। आत्मीयता = निजीपन। वंद्य = आदरणीय।

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