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पाठ 3: संवादहीन

गद्य खंड · पाठ 3 · गंगा

हिन्दी (गद्य) · CBSE Class 9 · गंगा · पाठ 3: संवादहीन (शेखर जोशी) · 25 क्विज़

पाठ 3 — संवादहीन (लेखक परिचय, सार, शब्दार्थ)

यह ‘गंगा’ (कक्षा 9) के गद्य खंड की तीसरी रचना है — शेखर जोशी की एक संवेदनशील कहानी जो एक ग्रामीण वृद्ध स्त्री के अकेलेपन और मनुष्य–पक्षी के भावनात्मक संबंध को मार्मिक ढंग से दर्शाती है।

लेखक परिचय — शेखर जोशी

जन्म सन् 1932, अल्मोड़ा (उत्तराखंड)। पहला कहानी-संग्रह ‘कोसी का घटवार’ (1958)। अन्य रचनाएँ — साथ के लोग, दाज्यू, हलवाहा, मेरा पहाड़ आदि। उन्होंने ग्रामीण-शहरी मध्यवर्ग और कारखानों के मजदूरों के जीवन-संघर्ष को प्रमुखता से उभारा। महावीर प्रसाद द्विवेदी पुरस्कार, साहित्य भूषण आदि से सम्मानित। निधन सन् 2022।

पाठ-सार

गाँव के बीच एक सूने खंडहर जैसे बड़े घर में अब केवल दो प्राणी बचे हैं — बूढ़ी ताई और उनका तोता मिट्ठू। कभी इस घर में भरा-पूरा परिवार, नौकर-चाकर, गाय-ढोर सब था, पर बहू-बेटे गाँव छोड़कर शहरों के हो गए और सब कुछ पराए हाथों चला गया। ताई के सूनेपन को गनपत के लाए पहाड़ी तोते मिट्ठू ने सहारा दिया — ताई की सारी ममता उसी पर बरस पड़ी। मिट्ठू उनके सिखाए ‘राम-राम, सीताराम, हर हर गंगे’ दोहराता, कभी प्रेमपूर्ण संवाद, कभी नोक-झोंक — और ‘मिट्ठू! अब कैसे कटेगी?’ के उत्तर में ‘कटेगी! कटेगी!!’ कहकर बुढ़ापे का सहारा बनता।

एक बार ताई कुंभ-स्नान के लिए प्रयागराज जाती हैं और मिट्ठू को जगन मास्टर की पत्नी (मास्टराइन) के पास छोड़ जाती हैं। जगन मास्टर आदर्शवादी व स्वतंत्र विचारों के व्यक्ति हैं; पिंजरे में बंद मिट्ठू को देखकर उन्हें बेचैनी होती है, इसलिए वे रोज़ कमरा बंद कर उसे थोड़ी देर खुली हवा में छोड़ते हैं। तीन-चार दिन बाद मिट्ठू रोशनदान से उड़ जाता है — ‘ये गए! वो गए!!’

ताई के लौटने से पहले यह अनहोनी सबको चिंतित कर देती है। गनपत के सुझाव पर ताई को भ्रम में रखने के लिए वैसी ही सूरत का एक दूसरा (एवजी) तोता ले आया जाता है, और जगन मास्टर उसे पाठ रटाने में जुट जाते हैं। पर कुंभ से लौटकर जब ताई सीधे जगन मास्टर के द्वार पहुँचती हैं, तो एवजी मिट्ठू कोई हरकत नहीं करता, चुप रहता है। ताई अपने मिट्ठू को पुकारती रह जाती हैं — उनका सूनेपन का साथी न जाने किन अमराइयों में घूम रहा होगा।

मूल भाव: शीर्षक ‘संवादहीन’ जीवन के उस मौन व अकेलेपन का प्रतीक है जो संवाद छिन जाने पर आता है। कहानी समकालीन यथार्थ की विसंगतियों — पलायन, बुज़ुर्गों का अकेलापन, और आदर्श बनाम यथार्थ के द्वंद्व (जगन मास्टर का आदर्शवाद अनर्थ कर बैठता है) — को उजागर करती है।

पात्र

ताई — अकेली, ममतामयी, तेज-स्वभाव वृद्धा; मिट्ठू — उनका संवाद-साथी तोता; जगन मास्टर — आदर्शवादी, सिद्धांतप्रिय; मास्टराइन — दयालु पर कुछ अदूरदर्शी; गनपत — सहायक गाँववासी; एवजी तोता — मौन, निर्जीव-सा विकल्प।

विधा — कहानी

यह ग्रामीण परिवेश की मनोवैज्ञानिक/संवेदनात्मक कहानी है, जिसकी लोकधर्मी भाषा, चित्रात्मकता व संवाद इसे जीवंत बनाते हैं।

शब्द-संपदा (शब्दार्थ)

ढोर = पालतू पशु; तकाजा = बार-बार माँगना/आवश्यकता; कुशाग्र = तीव्र बुद्धि; पौ फटना = प्रातःकाल होना; अचकचाना = चौंक उठना; निहाल = अत्यंत प्रसन्न; सत्ता = अधिकार, प्रभुत्व; रोबीला = प्रभावशाली; तुनकमिजाज = छोटी बात पर नाराज होने वाला; वियोग = बिछोह; साँकल = जंजीर/सिकड़ी; टोह = खोज; देहरी = दरवाजे की चौखट की नीचे वाली लकड़ी; प्रायश्चित = पाप का शोधन; मशगूल = किसी काम में लगा हुआ; एवजी = बदले में काम करने वाला, स्थानापन्न; जून = समय, वक्त।

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