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क्षितिज पाठ 2: राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

काव्य खंड · पाठ 2 · क्षितिज भाग 2

हिन्दी (काव्य) · CBSE Class 10 · क्षितिज भाग 2 · तुलसीदास (रामचरितमानस) · 25 क्विज़

राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद — कवि परिचय, पाठ-सार, भावार्थ एवं शब्दार्थ

कवि परिचय

तुलसीदास (जन्म सन् 1532, राजापुर, जिला बाँदा, उ.प्र. — निधन सन् 1623, काशी) रामभक्ति परंपरा के अतुलनीय कवि हैं। वे मानव-मूल्यों के उपासक थे; उनके राम मानवीय मर्यादाओं एवं आदर्शों के प्रतीक हैं, जिनके माध्यम से तुलसी ने नीति, स्नेह, शील, विनय और त्याग जैसे उदात्त आदर्श प्रतिष्ठित किए। उनकी प्रमुख रचनाएँ — रामचरितमानस, कवितावली, गीतावली, दोहावली, विनयपत्रिका आदि। उन्हें अवधी एवं ब्रज दोनों भाषाओं पर समान अधिकार था।

पाठ-परिचय

यह अंश रामचरितमानस के बालकांड से लिया गया है। सीता-स्वयंवर में राम द्वारा शिव-धनुष भंग होने पर मुनि परशुराम क्रोधित होकर सभा में आते हैं। टूटे धनुष को देखकर वे आपे से बाहर हो जाते हैं। उनके क्रोध-भरे वचनों का उत्तर लक्ष्मण अपनी वीर रस से पगी व्यंग्योक्तियों से देते हैं, जबकि राम विनयपूर्वक शांत व्यवहार करते हैं। इस प्रसंग की विशेषता है — लक्ष्मण की तीखी व्यंग्य-वाणी और तुलसी की सरस व्यंजना-शैली।

प्रसंग का सार एवं भावार्थ

शिव-धनुष टूटने पर परशुराम क्रोध में पूछते हैं कि इसे किसने तोड़ा। राम विनम्रता से कहते हैं कि धनुष तोड़ने वाला आपका कोई दास ही होगा। लक्ष्मण हँसकर व्यंग्य करते हैं कि बचपन में तो हमने ऐसी कई धनुहियाँ तोड़ी हैं, इस पुराने धनुष पर इतनी ममता क्यों? परशुराम और क्रोधित होकर अपने फरसे की ओर संकेत करते हैं और अपनी वीरता (सहस्रबाहु-वध, क्षत्रिय-संहार) का बखान करते हैं। लक्ष्मण निर्भीक होकर उत्तर देते हैं कि वीर योद्धा युद्ध में अपनी वीरता दिखाते हैं, अपने मुँह से बखान नहीं करते; तर्जनी देखकर मरने वाले यहाँ कोई कुम्हड़बतिया (कमज़ोर) नहीं हैं। वे ब्राह्मण, गाय आदि पर प्रहार न करने की बात कहकर परशुराम के फरसे-धनुष को व्यर्थ बताते हैं। अंततः विश्वामित्र के समझाने एवं राम के विनय से परशुराम का क्रोध शांत होता है।

शब्दार्थ

भंजनिहारा = तोड़ने वाला; रिसाइ = क्रोध करना; रिपु = शत्रु; बिलगाउ = अलग होना; अवमाने = अपमान करना; लरिकाइँ = बचपन में; परसु/कुठारु = फरसा, कुल्हाड़ी (परशुराम का शस्त्र); कोही = क्रोधी; महिदेव = ब्राह्मण; बिलोक = देखकर; अभर्क/अभर्क = बच्चा; महाभट = महान योद्धा; मही = धरती; कुम्हड़बतिया = बहुत कमज़ोर/निर्बल व्यक्ति (कुम्हड़े का छोटा कच्चा फल); तर्जनी = अँगूठे के पास की उँगली; कुलिस = कठोर (वज्र); सरोष = क्रोध सहित; सरासन = धनुष।

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