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क्षितिज पाठ 1: सूरदास के पद

काव्य खंड · पाठ 1 · क्षितिज भाग 2

हिन्दी (काव्य) · CBSE Class 10 · क्षितिज भाग 2 · सूरदास (भ्रमरगीत) · 25 क्विज़

सूरदास के पद — कवि परिचय, पाठ-सार, भावार्थ एवं शब्दार्थ

कवि परिचय

सूरदास (जन्म सन् 1478 के आसपास — निधन सन् 1583, पारसौली) हिन्दी के वात्सल्य एवं श्रृंगार के श्रेष्ठ कवि माने जाते हैं। वे महाप्रभु वल्लभाचार्य के शिष्य तथा अष्टछाप के सर्वाधिक प्रसिद्ध कवि थे। उनकी प्रमुख रचनाएँ — सूरसागर, साहित्य लहरी व सूरसारावली; इनमें ‘सूरसागर’ सर्वाधिक लोकप्रिय है। उनकी कविता में ब्रजभाषा का निखरा हुआ रूप मिलता है।

पाठ-परिचय

ये चार पद सूरसागर के ‘भ्रमरगीत’ से लिए गए हैं। श्रीकृष्ण मथुरा जाने के बाद स्वयं न लौटकर उद्धव के द्वारा गोपियों के पास निर्गुण ब्रह्म एवं योग का संदेश भेजते हैं। गोपियाँ ज्ञान-मार्ग के स्थान पर प्रेम-मार्ग को पसंद करती थीं, इसलिए उद्धव का शुष्क संदेश उन्हें अच्छा नहीं लगा। तभी वहाँ एक भौंरा (भ्रमर) आ पहुँचा — यहीं से भ्रमरगीत आरंभ होता है। गोपियाँ भौंरे के बहाने उद्धव पर व्यंग्य-बाण छोड़ती हैं और अपने एकनिष्ठ प्रेम में दृढ़ विश्वास प्रकट करती हैं। अंत में वे उद्धव को राजधर्म (प्रजा का हित) याद दिलाती हैं, जो सूरदास की लोकधर्मिता को दर्शाता है।

पदों का भावार्थ

पद 1 — ‘ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी’: गोपियाँ व्यंग्य से कहती हैं कि उद्धव बड़े भाग्यवान हैं जो कृष्ण के पास रहकर भी प्रेम के बंधन से अछूते (निर्लिप्त) रहे। जैसे कमल का पत्ता जल में रहकर भी भीगता नहीं, और जैसे जल में रखी तेल की गागर पर पानी की बूँद नहीं ठहरती — वैसे ही उद्धव प्रेम-नदी में पैर तक नहीं डुबाते। गोपियाँ स्वयं को ‘भोली अबला’ कहती हैं जो गुड़ पर लिपटी चींटी की तरह कृष्ण-प्रेम में पगी हैं।

पद 2 — ‘मन की मन ही माँझ रही’: गोपियों की मन की अभिलाषाएँ मन में ही रह गईं। कृष्ण के आने की आस में उन्होंने तन-मन की व्यथा सही, पर अब योग के संदेश सुन-सुनकर उनकी विरहाग्नि और भड़क उठी। जिनसे रक्षा की गुहार लगानी थी, वहीं से (योग की) उलटी धारा बह आई — अब वे धैर्य कैसे धरें; प्रेम की मर्यादा न रही।

पद 3 — ‘हमारैं हरि हारिल की लकरी’: गोपियों के लिए कृष्ण हारिल पक्षी की लकड़ी के समान हैं (जिसे वह कभी नहीं छोड़ता)। उन्होंने मन-कर्म-वचन से नंदनंदन को हृदय में दृढ़ता से पकड़ रखा है और सोते-जागते, दिन-रात ‘कान्ह-कान्ह’ रटती हैं। योग का उपदेश उन्हें कड़वी ककड़ी जैसा लगता है; यह ‘व्याधि’ वे उन्हें दे आएँ जिनका मन चकरी की तरह अस्थिर है।

पद 4 — ‘हरि हैं राजनीति पढ़ि आए’: गोपियाँ व्यंग्य करती हैं कि कृष्ण अब राजनीति पढ़कर आए हैं। पहले से चतुर थे, अब ‘गुरु-ग्रंथ’ पढ़कर बुद्धि और बढ़ गई, इसलिए योग का संदेश भेज दिया। वे कहती हैं — जो दूसरों की अनीति छुड़ाते हैं, वे स्वयं अनीति क्यों करें? राजधर्म तो यही है कि प्रजा को न सताया जाए।

शब्दार्थ

बड़भागी = भाग्यवान; अपरस = अछूता, निर्लिप्त, नीरस; तगा = धागा, बंधन; पुरइनि पात = कमल का पत्ता; दागी = दाग/धब्बा; प्रीति-नदी = प्रेम की नदी; बोर्यौ = डुबाया; परागी = मुग्ध होना; गुर चाँटी ज्यौं पागी = जैसे चींटी गुड़ में लिपटती है वैसे ही कृष्ण-प्रेम में अनुरक्त; अवधि आधार = आने की अवधि का सहारा; बिथा = व्यथा; बिरहिनि = विरह में जीने वाली; बिरह दही = विरह की आग में जलना; गुहारि = रक्षा हेतु पुकारना; मरजादा = मर्यादा; हारिल = एक पक्षी जो सदा पैरों में लकड़ी लिए रहता है; जक री = रटती रहती हैं; करुई ककरी = कड़वी ककड़ी; मन चकरी = अस्थिर मन; मधुकर = भौंरा (उद्धव के लिए संबोधन); पठाए = भेजा; पर हित = दूसरों के कल्याण हेतु; अनीति = अन्याय।

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