हिन्दी (कृतिका) · CBSE Class 10 · कृतिका भाग 2 · मधु कांकरिया (यात्रा-वृत्तांत) · 25 क्विज़
साना-साना हाथ जोड़ि… — लेखिका परिचय, पाठ-सार, मुख्य भाव एवं शब्दार्थ
लेखिका परिचय
मधु कांकरिया (जन्म सन् 1957, कोलकाता) समकालीन हिन्दी की चर्चित कथाकार एवं यात्रा-लेखिका हैं। उन्होंने अर्थशास्त्र एवं समाजशास्त्र का अध्ययन किया। उनकी रचनाओं में सामाजिक सरोकार, स्त्री-जीवन, पर्यावरण एवं संवेदना के स्वर प्रमुख हैं। उनकी प्रमुख कृतियाँ — उपन्यास ‘खुले गगन के लाल सितारे’, ‘सलाम आखिरी’, ‘पत्ताखोर’, ‘सेज पर संस्कृत’ तथा कहानी-संग्रह ‘खुदा सही सलामत है’, ‘बीतते हुए’ आदि। वे अनेक सम्मानों से विभूषित हैं।
पाठ-परिचय (विधा — यात्रा-वृत्तांत)
‘साना-साना हाथ जोड़ि…’ एक यात्रा-वृत्तांत (travelogue) है, जिसमें लेखिका ने सिक्किम की राजधानी गंगटोक (गंतोक) से युमथांग एवं कटाओ तक की हिमालय-यात्रा का सजीव एवं काव्यात्मक वर्णन किया है। शीर्षक एक नेपाली प्रार्थना-गीत की पंक्ति है जिसका अर्थ है — ‘छोटे-छोटे हाथ जोड़कर प्रार्थना करती हूँ कि मेरा सारा जीवन अच्छाइयों को समर्पित हो।’ इस यात्रा के माध्यम से लेखिका ने प्रकृति के विराट एवं दिव्य सौंदर्य के साथ-साथ पहाड़ी जीवन के संघर्ष, श्रम-सौंदर्य, सीमा पर तैनात फौजियों के त्याग एवं पर्यावरण-चिंता को भी उभारा है। यह केवल भ्रमण नहीं, एक आध्यात्मिक एवं आत्म-खोज की यात्रा बन जाती है।
पाठ का सार
लेखिका गंगटोक की जगमगाती, सितारों-भरी रात से सम्मोहित हो जाती है — उसे गंगटोक ‘मेहनतकश बादशाहों का शहर’ लगता है। सुबह वह युमथांग की ओर निकलती है। ड्राइवर-कम-गाइड जितेन नार्गे रास्ते भर सिक्किम की प्रकृति, भूगोल एवं जनजीवन की जानकारी देता है। रास्ते में वह सफेद बौद्ध पताकाएँ (किसी की मृत्यु पर 108 श्वेत पताकाएँ, नए कार्य पर रंगीन पताकाएँ), ‘धर्मचक्र’ (प्रेयर व्हील) एवं कवी-लोंग स्टॉक जैसे स्थान देखती है।
ऊँचाई बढ़ने के साथ बाज़ार, बस्तियाँ पीछे छूटती जाती हैं। लेखिका तीस्ता नदी के अनुपम सौंदर्य, झर-झर गिरते ‘सेवन सिस्टर्स वाटरफॉल’ एवं रंग-बिरंगे फूलों से मंत्रमुग्ध हो जाती है। उसे लगता है जैसे वह देश-काल की सीमाओं से परे बहती धारा बन गई हो — उसकी सारी तामसिकताएँ एवं दुष्ट वासनाएँ इस निर्मल धारा में बह जाती हैं।
इसी बीच वह देखती है — इस दिव्य सौंदर्य से निरपेक्ष, पीठ पर बच्चों को बाँधे पत्थर तोड़ती पहाड़ी स्त्रियाँ। सौंदर्य एवं श्रम, मातृत्व एवं जीवन-संघर्ष साथ-साथ चलते हैं। ये श्रमिक स्त्रियाँ ‘वेस्ट एट रिपेयरिंग’ हैं — कम लेकर समाज को अधिक लौटाने वाली। लेखिका को पलामू-गुमला के जंगलों की आदिवासी स्त्रियाँ याद आ जाती हैं; सब जगह आम ज़िंदगी की कहानी एक-सी है।
रास्ते में सिक्किम सरकार के बोर्ड (‘मौत को झुठलाकर सड़कें बनाते लोग’), खतरनाक घुमावदार रास्ते, स्कूल से लौटते पहाड़ी बच्चे (जो रोज़ 3-3.5 किमी चढ़ाई चढ़ते हैं), याक एवं चाय-बागानों में काम करती युवतियाँ दिखती हैं। लायुंग में रात्रि-विश्राम के दौरान जितेन एवं साथी नाचते-गाते हैं। अगली सुबह लेखिका कटाओ (‘भारत का स्विट्ज़रलैंड’) की ओर बढ़ती है और पहली बार घुटनों तक बर्फ देखती एवं उस पर कूदती है। वहाँ उसे सीमा पर तैनात फौजियों का त्याग याद आता है (‘वी गिव अवर टुडे फॉर योर टुमारो’)। अंत में लेखिका युमथांग लौटती है और समझती है कि मंज़िल से कहीं ज़्यादा रोमांचक होता है मंज़िल तक का सफर, तथा मनुष्य की इसी अनंत खोज का नाम सौंदर्य है।
शब्दार्थ
अतींद्रियता = इंद्रियों से परे की अनुभूति; उजास = उजाला, प्रकाश; रद्दा-रद्दा / रक़म-रक़म = तरह-तरह के; शिद्दत = तीव्रता, प्रबलता; मशगूल = व्यस्त; अभिशप्त = शापित; सरहद = सीमा; तामसिकताएँ = तमोगुण से युक्त/कुटिल भाव; दुष्ट वासनाएँ = बुरी इच्छाएँ; सयानी = समझदार, चतुर; जन्नत = स्वर्ग; चैरवेति-चैरवेति = चलते रहो, चलते रहो; वजूद = अस्तित्व; हलाहल = विष, ज़हर; संक्रमण = संयोग, मिलन; मद्धिम = धीमी, हलकी; ठाठे = हाथ में पड़ने वाली गाँठें/निशान; वेस्ट एट रिपेयरिंग = कम लेकर अधिक लौटाना; सुर्खियों में आना = चर्चा में आना; गुड़ुप करना = निगल लेना।
प्रश्न-अभ्यास (सभी उत्तर)
1झिलमिलाते सितारों की रोशनी में नहाया गंतोक लेखिका को किस तरह सम्मोहित कर रहा था?
रात में झिलमिलाते सितारों की रोशनी में नहाया गंतोक लेखिका को किसी जादुई संसार-सा लगा — मानो आसमान उलटा पड़ा हो एवं सारे तारे बिखरकर नीचे टिमटिमा रहे हों। दूर ढलान पर सितारों के गुच्छे रोशनियों की झालर-से बना रहे थे। वह रहस्यमयी, सितारों-भरी रात लेखिका में ऐसा सम्मोहन जगा रही थी कि उन जादू-भरे क्षणों में उसका अपना अस्तित्व, चेतना एवं आस-पास सब स्थगित एवं अर्थहीन हो गया — भीतर-बाहर केवल शून्य एवं रोशनी की वह जादुई झालर रह गई, जिससे उसके होंठों पर स्वतः प्रार्थना फूट पड़ी।
2गंतोक को ‘मेहनतकश बादशाहों का शहर’ क्यों कहा गया?
गंतोक को ‘मेहनतकश बादशाहों का शहर’ इसलिए कहा गया क्योंकि यह शहर इतिहास एवं वर्तमान के संधि-स्थल पर खड़ा है और यहाँ के लोग कठोर परिश्रम से अपना जीवन सँवारते हैं। पहाड़ी एवं कठिन भौगोलिक परिस्थिति में भी यहाँ के लोग मेहनत करके अपने शहर को सुंदर एवं समृद्ध बनाए हुए हैं। परिश्रम ही यहाँ की संपन्नता एवं सुंदरता का आधार है, इसलिए यहाँ का हर मेहनती व्यक्ति मानो अपने जीवन का बादशाह है।
3कभी श्वेत तो कभी रंगीन पताकाओं का फहराना किन अलग-अलग अवसरों की ओर संकेत करता है?
श्वेत (सफेद) पताकाएँ — किसी बौद्ध व्यक्ति की मृत्यु पर उसकी आत्मा की शांति के लिए शहर से दूर किसी पवित्र स्थान पर 108 श्वेत पताकाएँ फहराई जाती हैं; इन्हें उतारा नहीं जाता, ये धीरे-धीरे स्वयं नष्ट हो जाती हैं। रंगीन पताकाएँ — किसी नए एवं शुभ कार्य की शुरुआत पर फहराई जाती हैं। इस प्रकार श्वेत पताकाएँ शोक/मृत्यु का एवं रंगीन पताकाएँ मंगल/नई शुरुआत का संकेत देती हैं।
4जितेन नार्गे ने लेखिका को सिक्किम की प्रकृति, वहाँ की भौगोलिक स्थिति एवं जनजीवन के बारे में क्या महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ दीं, लिखिए।
जितेन नार्गे ने अनेक जानकारियाँ दीं — (i) प्रकृति: युमथांग यानी घाटियाँ, जहाँ हिमालय की गहनतम घाटियाँ एवं फूलों से लदी वादियाँ मिलती हैं; (ii) धार्मिक: बौद्ध श्वेत/रंगीन पताकाओं एवं ‘धर्मचक्र’ (प्रेयर व्हील, जिसे घुमाने से पाप धुलते हैं) का महत्त्व; (iii) ऐतिहासिक: कवी-लोंग स्टॉक — ‘गाइड’ फिल्म की शूटिंग-स्थल एवं लेपचा-भुटिया जातियों के बीच शांति-वार्ता का स्थल; (iv) जनजीवन: पहाड़ी बच्चे रोज़ 3-3.5 किमी चढ़ाई चढ़कर स्कूल जाते एवं माँओं के साथ मवेशी चराते, पानी व लकड़ी ढोते हैं; जीवन अत्यंत कठोर है। (v) अन्य: गुरुनानक से जुड़ी किंवदंती (खेदुम), सीमा पर फौज एवं बोर्ड रोड ऑर्गेनाइज़ेशन की सड़क-निर्माण की जानकारी।
5लोसांग स्टॉक में घूमते हुए चक्र को देखकर लेखिका को पूरे भारत की आत्मा एक-सी क्यों दिखाई दी?
कुटिया के भीतर घूमते ‘धर्मचक्र’ (प्रेयर व्हील) को देखकर नार्गे ने बताया कि इसे घुमाने से सारे पाप धुल जाते हैं। यह सुनकर लेखिका को लगा कि चाहे मैदान हो या पहाड़, तमाम वैज्ञानिक प्रगति के बावजूद इस देश की आत्मा एक जैसी है — लोगों की आस्थाएँ, विश्वास, अंधविश्वास, पाप-पुण्य की अवधारणाएँ एवं कल्पनाएँ सर्वत्र एक समान हैं। पाप धुलने का यह विश्वास पूरे भारत में समान रूप से मिलता है, इसीलिए उसे पूरे भारत की आत्मा एक-सी दिखाई दी।
6जितेन नार्गे की गाइड की भूमिका के बारे में विचार करते हुए लिखिए कि एक कुशल गाइड में क्या गुण होते हैं?
एक कुशल गाइड में निम्नलिखित गुण होने चाहिए — (i) अपने क्षेत्र की प्रकृति, इतिहास, भूगोल एवं जनजीवन की गहरी जानकारी; (ii) बातचीत की रोचक एवं मनोरंजक शैली तथा अच्छा संवाद-कौशल; (iii) पर्यटकों के प्रति विनम्रता, धैर्य एवं सहयोग की भावना; (iv) अपने देश/क्षेत्र एवं भाषा पर गर्व तथा लगाव; (v) सतर्कता एवं सुरक्षा का ध्यान (खतरनाक रास्तों पर सावधानी से वाहन चलाना); (vi) प्रसन्न, जीवंत एवं मिलनसार स्वभाव। जितेन नार्गे में ये सभी गुण थे — वह न केवल अच्छा ड्राइवर, बल्कि जानकार, विनोदी एवं अपनी भाषा-संस्कृति पर गर्व करने वाला कुशल गाइड था।
7इस यात्रा-वृत्तांत में लेखिका ने हिमालय के जिन-जिन रूपों का चित्र खींचा है, उन्हें अपने शब्दों में लिखिए।
लेखिका ने हिमालय के अनेक पल-पल परिवर्तित रूपों का चित्र खींचा है — आरंभ में वह छोटी-छोटी पहाड़ियों के रूप में, फिर क्रमशः अपने विराट एवं वैभवपूर्ण रूप में सामने आता है। कहीं वह ताश के घरों-सा, कहीं विशालकाय एवं भीमकाय; घाटियाँ गहराती हुई पाताल नापने लगती हैं, वादियाँ चौड़ी होती हैं। कहीं हरी-भरी सघन घाटियाँ, झर-झर गिरते जलप्रपात, बल खाती तीस्ता नदी, तो कहीं बर्फ से ढके चाँदी-से चमकते शिखर (कटाओ)। कभी बादलों से ढका, कभी छाया-पहाड़, कभी ‘थिंक ग्रीन’ लिखी हरियाली। अंततः हिमालय लेखिका के लिए केवल कविता नहीं, एक दर्शन बन जाता है।
8प्रकृति के उस अनंत और विराट स्वरूप को देखकर लेखिका को कैसी अनुभूति होती है?
प्रकृति के अनंत एवं विराट स्वरूप को देखकर लेखिका को आध्यात्मिक एवं दिव्य अनुभूति होती है। उसे लगता है कि वह देश एवं काल की सीमाओं से परे बहती धारा बन गई है; उसकी सारी तामसिकताएँ एवं दुष्ट वासनाएँ इस निर्मल धारा में बह गई हैं। भीतर-बाहर की रेखा मिट जाती है, आत्मा की सारी खिड़कियाँ खुल जाती हैं एवं वह स्वयं को ईश्वर के निकट अनुभव करती है। उसका मन काव्यमय एवं एकात्म हो उठता है — मानो सत्य एवं सौंदर्य को छू रही हो। उसे अनुभव होता है कि जीवन का आनंद यही चलायमान (परिवर्तनशील) सौंदर्य है।
9प्राकृतिक सौंदर्य के अलौकिक आनंद में डूबी लेखिका को कौन-कौन से दृश्य झकझोर गए?
प्राकृतिक सौंदर्य के आनंद में डूबी लेखिका को जीवन-संघर्ष के दृश्य झकझोर गए — (i) इस दिव्य सौंदर्य से निरपेक्ष, पीठ पर बच्चों को बाँधे पत्थर तोड़ती पहाड़ी स्त्रियाँ, जिनके कोमल हाथों में कुदाल एवं हथौड़े थे; (ii) रोज़ 3-3.5 किमी पहाड़ी चढ़कर स्कूल जाते एवं शाम को मवेशी चराते, पानी-लकड़ी ढोते बच्चे; (iii) माइनस 15 डिग्री की कड़कड़ाती ठंड में सीमा पर तैनात फौजी, जो हमारी नींद के लिए पहरा देते हैं एवं ‘अपना आज हमारे कल के लिए’ न्योछावर कर देते हैं। इन दृश्यों ने सौंदर्य के पीछे छिपे श्रम, अभाव एवं त्याग को उजागर कर लेखिका का मन उदासी एवं करुणा से भर दिया।
10सैलानियों को प्रकृति की अलौकिक छटा का अनुभव करवाने में किन-किन लोगों का योगदान होता है, उल्लेख करें।
सैलानियों को प्रकृति की अलौकिक छटा का अनुभव करवाने में अनेक लोगों का योगदान होता है — (i) ड्राइवर-कम-गाइड (जैसे जितेन नार्गे), जो खतरनाक रास्तों पर सावधानी से वाहन चलाकर एवं रोचक जानकारियाँ देकर यात्रा सुखद बनाते हैं; (ii) सड़क बनाने वाले मज़दूर एवं पहाड़ी स्त्रियाँ, जो जान जोखिम में डालकर पहाड़ काटकर रास्ते बनाते हैं; (iii) बोर्ड रोड ऑर्गेनाइज़ेशन (BRO) के कर्मचारी; (iv) सीमा पर तैनात फौजी, जो सुरक्षा प्रदान करते हैं; तथा (v) स्थानीय दुकानदार, होटल-कर्मी एवं आम जनता। इन सबके श्रम एवं सहयोग से ही पर्यटक सुरक्षित रूप से सौंदर्य का आनंद ले पाते हैं।
11“कितना कम लेकर ये समाज को कितना अधिक वापस लौटा देती हैं।” इस कथन के आधार पर स्पष्ट करें कि आम जनता की देश की आर्थिक प्रगति में क्या भूमिका है?
पत्थर तोड़ती पहाड़ी स्त्रियों को देखकर लेखिका सोचती है कि ये ‘वेस्ट एट रिपेयरिंग’ हैं — कितना कम लेकर समाज को कितना अधिक लौटा देती हैं। इसी से स्पष्ट होता है कि देश की आर्थिक प्रगति में आम मेहनतकश जनता (मज़दूर, किसान, श्रमिक) की भूमिका सबसे बड़ी है। ये लोग बहुत कम मज़दूरी एवं सुविधाओं में भी कठोर श्रम करके सड़कें, भवन, खेती एवं उद्योग खड़े करते हैं, जिन पर देश की समृद्धि टिकी है। जीवन का वास्तविक संतुलन एवं विकास इन्हीं अनाम श्रमिकों के अथक परिश्रम से चलता है, परंतु इन्हें इसके बदले बहुत कम मिलता है — सारी मलाई दूसरों के हाथ और सारे अभाव, आँसू एवं वंचना इनके हिस्से।
12आज की पीढ़ी द्वारा प्रकृति के साथ किस तरह का खिलवाड़ किया जा रहा है। इसे रोकने में आपकी क्या भूमिका होनी चाहिए?
खिलवाड़: आज की पीढ़ी अंधाधुंध वनों की कटाई, प्रदूषण, औद्योगीकरण, प्लास्टिक एवं कचरे द्वारा प्रकृति की लय, ताल एवं गति से खिलवाड़ कर रही है। इसी कारण ‘स्नो-फॉल’ (हिमपात) घटता जा रहा है, जलवायु बिगड़ रही है एवं पारिस्थितिक संतुलन टूट रहा है — लेखिका इसे ‘अक्षम्य अपराध’ कहती है। मेरी भूमिका: मुझे वृक्षारोपण करना चाहिए, जल एवं ऊर्जा बचानी चाहिए, प्लास्टिक एवं प्रदूषण कम करना चाहिए, कचरे का उचित निपटान करना चाहिए तथा दूसरों को भी पर्यावरण-संरक्षण के प्रति जागरूक करना चाहिए। छोटे-छोटे प्रयासों से ही प्रकृति को बचाया जा सकता है।
13प्रदूषण के कारण स्नोफॉल में कमी का जिक्र किया गया है। प्रदूषण के और कौन-कौन से दुष्परिणाम सामने आए हैं, लिखें।
प्रदूषण के अनेक दुष्परिणाम सामने आए हैं — (i) स्नो-फॉल (हिमपात) एवं ग्लेशियरों का घटना तथा जलस्रोतों का सूखना; (ii) जलवायु-परिवर्तन एवं ग्लोबल वार्मिंग — तापमान बढ़ना; (iii) वायु, जल एवं मृदा प्रदूषण से अनेक रोग (श्वास, त्वचा आदि); (iv) अम्लीय वर्षा एवं ओज़ोन परत का क्षरण; (v) जैव-विविधता एवं वनस्पति-जीव-जंतुओं का नाश; (vi) मौसम-चक्र का बिगड़ना, बाढ़-सूखा एवं प्राकृतिक आपदाओं की वृद्धि। कुल मिलाकर प्रदूषण ने समूचे पारिस्थितिक संतुलन को खतरे में डाल दिया है।
14‘कटाओ’ पर किसी भी दुकान का न होना उसके लिए वरदान है। इस कथन के पक्ष में अपनी राय व्यक्त कीजिए?
यह कथन पूर्णतः उचित है कि ‘कटाओ’ पर किसी दुकान का न होना उसके लिए वरदान है। क्योंकि अभी तक टूरिस्ट स्पॉट न बनने के कारण कटाओ अपने प्राकृतिक, शुद्ध एवं अछूते स्वरूप में है। दुकानें एवं बाज़ार बन जाने पर वहाँ भीड़, व्यापार, कचरा, प्लास्टिक एवं प्रदूषण आ जाता — जैसा अन्य पर्यटन-स्थलों में हुआ है — और उसका नैसर्गिक सौंदर्य नष्ट हो जाता। दुकानों के अभाव ने ही कटाओ को प्रदूषण एवं व्यावसायिक दोहन से बचाकर उसकी स्वच्छता एवं अप्रतिम सुंदरता को सुरक्षित रखा है। अतः यह कमी वास्तव में उसके लिए वरदान ही है।
15प्रकृति ने जल संचय की व्यवस्था किस प्रकार की है?
लेखिका की सहेली मणि दार्शनिकों की तरह बताती है कि हिम-शिखर पूरे एशिया के जल-स्तंभ हैं। प्रकृति बड़े नायाब ढंग से जल-संचय की व्यवस्था करती है — सर्दियों में वह वर्षा/हिमपात को बर्फ के रूप में संचित (जमा) कर लेती है, एवं गर्मियों में जब पानी के लिए त्राहि-त्राहि मचती है, तब यही बर्फ की शिलाएँ पिघल-पिघलकर जलधारा (नदियाँ) बनकर हमारे सूखे कंठों को तरावट पहुँचाती हैं। इस प्रकार हिमशिखर एवं नदियाँ प्रकृति की अद्भुत जल-संचय प्रणाली हैं, जिनका हम पर बहुत ऋण है।
16देश की सीमा पर बैठे फौजी किस तरह की कठिनाइयों से जूझते हैं? उनके प्रति हमारा क्या उत्तरदायित्व होना चाहिए?
कठिनाइयाँ: सीमा पर तैनात फौजी माइनस 15 डिग्री जैसी कड़कड़ाती ठंड में, जहाँ पेट्रोल को छोड़कर सब कुछ जम जाता है, घर-परिवार से दूर रहकर पहरा देते हैं। वे पौष-माघ की भीषण सर्दी, बर्फ, खतरनाक दुर्गम इलाकों एवं निरंतर जान के जोखिम से जूझते हैं, ताकि हम चैन की नींद सो सकें — ‘वी गिव अवर टुडे फॉर योर टुमारो’। उत्तरदायित्व: हमें उनके त्याग एवं बलिदान के प्रति सम्मान, कृतज्ञता एवं गर्व रखना चाहिए; उनके परिवारों की सहायता एवं सम्मान करना चाहिए; राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य निष्ठापूर्वक निभाने चाहिए एवं देश की एकता-अखंडता बनाए रखनी चाहिए। उनकी कुर्बानी को कभी भुलाना नहीं चाहिए।