हिन्दी (कृतिका) · CBSE Class 10 · कृतिका भाग 2 · शिवपूजन सहाय (देहाती दुनिया) · 25 क्विज़
माता का अँचल — लेखक परिचय, पाठ-सार, मुख्य भाव एवं शब्दार्थ
लेखक परिचय
शिवपूजन सहाय (जन्म सन् 1893, उनवाँस गाँव, जिला शाहाबाद/भोजपुर, बिहार — निधन सन् 1963) हिन्दी के प्रतिष्ठित कथाकार, निबंधकार एवं संपादक थे। वे सरल, सहज एवं ठेठ ग्रामीण भाषा के कुशल चितेरे माने जाते हैं। उनका उपन्यास ‘देहाती दुनिया’ (सन् 1926) हिन्दी का पहला आंचलिक उपन्यास एवं स्मरण-शिल्प में लिखा पहला उपन्यास माना जाता है, जिसमें ग्रामीण जीवन का चित्रण ग्रामीण जनता की ही भाषा में हुआ है। उनकी अन्य रचनाएँ — ग्राम-सुधार, वे दिन वे लोग, मेरा जीवन आदि। उनके संपादन में अनेक पत्र-पत्रिकाएँ निकलीं।
पाठ-परिचय
यह अंश शिवपूजन सहाय के उपन्यास ‘देहाती दुनिया’ से लिया गया है। इसका दृष्टि-बिंदु शिशु-चरित्र भोलानाथ है। संकलित अंश में ग्रामीण अंचल एवं उसके चरित्रों का अनोखा चित्र है — बालकों के खेल, कौतूहल, माँ की ममता, पिता का दुलार एवं लोकगीत जैसे अनेक प्रसंग इसमें शामिल हैं। लेखक ने शहर की चकाचौंध से दूर गाँव की सहजता एवं सादगी को आत्मीयता से प्रस्तुत किया है। बाल-मनोभावों की अभिव्यक्ति के साथ-साथ लेखक ने तत्कालीन समाज के पारिवारिक परिवेश एवं तीस के दशक की ग्राम्य-संस्कृति का भी सजीव चित्रण किया है।
पाठ का सार
भोलानाथ (असली नाम तारकेश्वरनाथ) का अपने पिता (बाबू जी) से गहरा लगाव था। माँ से तो केवल दूध पीने तक का नाता था; वह पिता के साथ ही बाहर की बैठक में सोता, उन्हीं के साथ उठता, नहा-धोकर पूजा पर बैठता। बाबू जी उसके चौड़े ललाट पर भभूत का त्रिपुंड लगाते, प्यार से ‘भोलानाथ’ पुकारते, कुश्ती लड़ते, झूला झुलाते, मछलियों को दाना खिलाते एवं अपने हाथ से खिलाते।
भोलानाथ अपने खेल-साथियों के साथ तरह-तरह के नाटक खेलता — मिठाई की दुकान, घरौंदा, बारात का जुलूस, खेती-बारी के खेल, और लोकगीतों की तुकबंदी। गोप्पी आम चाबना, आँधी-बारिश में भीगना, मूसन तिवारी को चिढ़ाना, पाठशाला से गुरु जी की पिटाई — ये सब बाल-जीवन के सहज प्रसंग हैं। बाबू जी बच्चों के इन खेलों में भी शामिल हो जाते एवं आनंद लेते।
कहानी का चरम तब आता है जब खेलते समय चूहे के बिल से साँप निकल आता है और बच्चे डरकर भागते हैं — कोई गिरता, किसी का सिर फूटता, किसी के दाँत टूटते; भोलानाथ का शरीर लहूलुहान एवं पैर काँटों से छलनी हो जाते हैं। डरा हुआ, काँपता भोलानाथ बाबू जी के पुकारने पर भी सीधे ‘मइया’ की गोद में जाकर उसके आँचल में छिप जाता है। माँ घबराकर रो पड़ती है, हल्दी पीसकर घावों पर लगाती है। बाबू जी उसे अपनी गोद में लेना चाहते हैं, पर भोलानाथ माँ के आँचल की — प्रेम एवं शांति के चँदोवे की — छाया नहीं छोड़ता। इस प्रकार कहानी दर्शाती है कि पिता से अधिक जुड़ाव होने पर भी विपदा में बच्चे के लिए माँ का आँचल ही सबसे बड़ी शरण है।
शब्दार्थ
तड़के = प्रातःकाल, सवेरे; लिलार = ललाट, माथा; त्रिपुंड = माथे पर तीन आड़ी रेखाओं वाला तिलक; भभूत = राख/विभूति; अफर जाना = पेट भर से अधिक खा लेना; गोरस = दूध-दही; महतारी = माता; उतान = पीठ के बल लेटना; कड़वा तेल = सरसों का तेल; ज्योनार = भोज, दावत; जीमना = भोजन करना; ओहार = परदे का कपड़ा; अमोला = आम का उगता पौधा; चिरौरी = विनती, दीनतापूर्ण प्रार्थना; अमनिया करना = साफ/शुद्ध करना; ओसारा = बरामदा; अँठई = कुत्ते के शरीर में चिपके रहने वाले कीड़े।
प्रश्न-अभ्यास (सभी उत्तर)
1प्रस्तुत पाठ के आधार पर कहा जा सकता है कि बच्चे का अपने पिता से अधिक जुड़ाव था, फिर भी विपदा के समय वह पिता के पास न जाकर माँ की शरण लेता है। आपकी समझ से इसकी क्या वजह हो सकती है?
यद्यपि भोलानाथ का पिता से खेल, दुलार एवं दिनचर्या के कारण अधिक जुड़ाव था, परंतु विपदा, भय एवं पीड़ा के समय बच्चे को माँ का आँचल ही सबसे बड़ी शरण एवं सुरक्षा लगता है। इसकी वजह है — माँ की ममता एवं कोमलता में जो सुरक्षा-बोध एवं अपनापन है, वह अनुपम है। भय में बच्चा सहज ही माँ की गोद खोजता है, क्योंकि माँ का प्रेम-भरा स्पर्श उसे सबसे अधिक आश्वस्ति एवं शांति देता है। मातृत्व की यही सहज सुरक्षा-भावना उसे माँ की ओर खींच लेती है।
2आपके विचार से भोलानाथ अपने साथियों को देखकर सिसकना क्यों भूल जाता है?
बच्चों का मन चंचल एवं क्षणिक होता है — वे किसी एक भाव में अधिक देर नहीं टिकते। भोलानाथ अपने खेल-साथियों को देखते ही उनके साथ खेलने के आकर्षण एवं उत्साह में डूब जाता है, और उसका ध्यान दुख/रुलाई से हटकर खेल की ओर चला जाता है। खेलने की ललक उसके दुख पर भारी पड़ जाती है, इसलिए वह सिसकना भूल जाता है।
3भोलानाथ और उसके साथी जब-तब खेलते-खाते समय किसी-न-किसी प्रकार की तुकबंदी करते हैं। आपको यदि अपने खेलों आदि से जुड़ी कोई तुकबंदी याद हो तो लिखिए।
(नमूना) बच्चों के खेलों से जुड़ी कुछ प्रचलित तुकबंदियाँ — ‘अक्कड़-बक्कड़ बंबे बो, अस्सी-नब्बे पूरे सौ…’; ‘पोशम्पा भई पोशम्पा…’; ‘ओरी-पोरी, छुपन-छुपाई…’; ‘इक्कड़-दुक्कड़…’ आदि। (छात्र अपने क्षेत्र में प्रचलित तुकबंदी लिखें।)
4भोलानाथ और उसके साथियों के खेल तथा खेलने की सामग्री आपके खेल और खेलने की सामग्री से किस प्रकार भिन्न है?
भिन्नता: भोलानाथ एवं उसके साथियों के खेल प्रकृति एवं ग्रामीण परिवेश से जुड़े थे और उनकी सामग्री घरेलू-प्राकृतिक चीज़ों (मिट्टी, धूल, ठीकरे, कागज़, रस्सी, लकड़ी, आम के अमोले) से बनती थी; ये अधिकतर सामूहिक एवं मैदानी खेल थे (मिठाई की दुकान, घरौंदा, बारात, खेती)। आज के खेल प्रायः मोबाइल/वीडियो गेम एवं तैयार प्लास्टिक/इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों वाले, अधिकतर इनडोर एवं अकेले खेले जाने वाले हैं। (छात्र अपने अनुसार विस्तार दें।)
5पाठ में आए ऐसे प्रसंगों का वर्णन कीजिए जो आपके दिल को छू गए हों।
(नमूना) दिल को छू लेने वाले प्रसंग — (i) बाबू जी का कुश्ती में जान-बूझकर हार दिखाकर बच्चे का उत्साह बढ़ाना; (ii) माँ का बनावटी चिड़ियों (तोता, मैना, कबूतर) के नाम से भात खिलाना; (iii) बच्चों का मिलकर घरौंदा एवं बारात का नाटक खेलना; और सबसे बढ़कर (iv) अंत में चोट लगने पर भोलानाथ का माँ के आँचल में शरण लेना एवं माँ का घबराकर रो पड़ना — यह प्रसंग सबसे मार्मिक एवं हृदयस्पर्शी है। (छात्र अपनी पसंद के प्रसंग चुनें।)
6इस उपन्यास-अंश में तीस के दशक की ग्राम्य-संस्कृति का चित्रण है। आज की ग्रामीण संस्कृति में आपको किस तरह के परिवर्तन दिखाई देते हैं?
(नमूना) आज की ग्रामीण संस्कृति में अनेक परिवर्तन दिखते हैं — गाँवों में भी शहरीकरण, मोबाइल, टीवी, इंटरनेट एवं आधुनिक शिक्षा आ गई है; पक्के मकान, बिजली एवं वाहन आम हो गए। परंपरागत सामूहिक खेल, लोकगीत, मेले एवं सादगी घटती जा रही है। खेती में मशीनें आ गई हैं। किन्तु पहले जैसी अपनापन एवं पड़ोस-संस्कृति कुछ कम हुई है। (छात्र विस्तार दें।)
7पाठ पढ़ते-पढ़ते आपको भी अपने माता-पिता का लाड़-प्यार याद आ रहा होगा। अपनी इन भावनाओं को डायरी में अंकित कीजिए।
(छात्र स्वयं डायरी-शैली में लिखें।) इसमें अपने माता-पिता के स्नेह, दुलार, डाँट में छिपे प्यार एवं सुरक्षा-भाव से जुड़ी अपनी भावनाओं को तिथि एवं दिन लिखकर, प्रथम-पुरुष में व्यक्त कीजिए।
8यहाँ माता-पिता का बच्चे के प्रति जो वात्सल्य व्यक्त हुआ है, उसे अपने शब्दों में लिखिए।
पिता का वात्सल्य: बच्चे को नहला-धुलाकर पूजा पर बिठाना, भभूत का तिलक लगाना, ‘भोलानाथ’ कहकर प्यार से पुकारना, कुश्ती लड़ना, झूला झुलाना, अपने हाथ से खिलाना एवं पाठशाला से गुरु जी की चिरौरी कर छुड़ा लाना। माता का वात्सल्य: तेल लगाना, सजाना, भर-मुँह कौर खिलाने का हठ, चोट लगने पर घबराकर रो पड़ना, हल्दी लगाना एवं आँचल में छिपा लेना। दोनों का प्रेम बच्चे के प्रति अत्यंत गहरा, कोमल एवं निःस्वार्थ है।
9‘माता का अँचल’ शीर्षक की उपयुक्तता बताते हुए कोई अन्य शीर्षक सुझाइए।
उपयुक्तता: शीर्षक ‘माता का अँचल’ पूर्णतः उपयुक्त है, क्योंकि पूरी कहानी का चरम एवं निष्कर्ष यही है कि चाहे बच्चे का पिता से कितना भी लगाव क्यों न हो, विपदा के समय अंततः माँ का आँचल ही सबसे बड़ी शरण है। ‘अँचल’ मातृत्व, ममता एवं सुरक्षा का प्रतीक है। अन्य शीर्षक: ‘भोलानाथ का बचपन’, ‘मातृ-ममता’, ‘बचपन की दुनिया’ या ‘माँ की गोद’।
10बच्चे माता-पिता के प्रति अपने प्रेम को कैसे अभिव्यक्त करते हैं?
बच्चे अपने प्रेम को सहज एवं निश्छल क्रियाओं से अभिव्यक्त करते हैं — पिता के साथ कुश्ती लड़ना, उनकी मूँछें नोचना, चूमना, गोद में चढ़ना, खेल में साथ बिठाना, और रूठना-मनाना; तथा माँ के आँचल में छिपना, गोद में शरण लेना एवं लाड़ जताना। इन्हीं निर्दोष भाव-भंगिमाओं से बच्चे अपना गहरा प्रेम प्रकट करते हैं।
11इस पाठ में बच्चों की जो दुनिया रची गई है, वह आपके बचपन की दुनिया से किस तरह भिन्न है?
(नमूना) भोलानाथ की दुनिया प्रकृति, खुले मैदान, सामूहिक खेल, सादगी एवं स्वच्छंदता से भरी थी — बच्चे मिट्टी-धूल में खेलते, लोकगीत गाते एवं पूरे मोहल्ले में घूमते थे। इसके विपरीत आज बच्चों की दुनिया मोबाइल, टीवी, पढ़ाई का दबाव, फ्लैट-संस्कृति एवं सीमित मैदानों की है; खेल अधिकतर अकेले एवं स्क्रीन पर होते हैं। (छात्र अपने बचपन के अनुसार लिखें।)
12पाठेतर सक्रियता: फणीश्वरनाथ रेणु और नागार्जुन की आंचलिक रचनाओं को पढ़िए।
(स्व-अध्ययन) फणीश्वरनाथ रेणु का ‘मैला आँचल’ (आंचलिक उपन्यास) तथा नागार्जुन की आंचलिक रचनाएँ (जैसे ‘बलचनमा’) पढ़िए, जिनमें ग्रामीण जीवन एवं लोकसंस्कृति का सजीव चित्रण मिलता है।