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पाठ 1: अनमोल वाणी

पद्य विभाग · पाठ 1 · हिन्दी सौरभ

हिन्दी (पद्य) · Odisha Board Class 10 · कबीर · सूर · तुलसी · रहीम · 25 क्विज़

अनमोल वाणी — कवि परिचय, मूल पाठ, शब्दार्थ एवं भावार्थ

इस पाठ में चार महान संत-कवियों — कबीरदास, सूरदास, तुलसीदास और रहीम — की अनमोल वाणी (दोहे एवं पद) संकलित हैं।

1. कबीरदास

कवि परिचय: कबीरदास का जन्म सन् 1398 में काशी में हुआ था। एक जुलाहा दंपति ने उनका पालन-पोषण किया। वे ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे, पर बड़े अनुभवी थे। वे सभी धर्मों को बराबर मानते थे और ईश्वर के निर्गुण, निराकार रूप में विश्वास रखते थे। कबीर ने जाति-पाँति, ऊँच-नीच के भेदभाव, मूर्ति-पूजा, बाहरी आडंबर और अंधविश्वास का विरोध किया। वे सदाचार, सच्चाई, भाईचारे और धार्मिक सहिष्णुता का प्रचार करते थे। उनकी वाणियाँ शिष्यों ने ‘बीजक’ नामक ग्रंथ में संगृहीत कीं। उनकी भाषा मिश्रित खड़ीबोली (सधुक्कड़ी) है। उनके गुरु रामानंद स्वामी थे।

दोहे

साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप। जाके हिरदै साँच है, ताके हिरदै आप॥ जो तोको काँटा बुबै ताहि बोय तू फूल। तोकु फूल को फूल है, बाको है तिरसूल॥ धीरे-धीरे रे मना, धीरे-धीरे सब कुछ होय। माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय॥

शब्दार्थ: साँच = सत्य। बराबर = समान। तप = तपस्या, ज्ञान। झूठ = मिथ्या। पाप = पातक, कुकर्म। जाके = जिसके। हिरदै = हृदय। ताके = उसके। आप = ईश्वर, भगवान। तोको = तुझको। काँटा = कंटक। बुबै = बोता है। ताहि = उसे। बोय = बो। तोक = तुझको। बाको = उस, उसको। तिरसूल = त्रिशूल। मना = मन। होय = होता। माली = पेड़-पौधे सींचने वाला। सींचे = पानी देना। सौ = 100। घड़ा = मटका, कलश। ऋतु = मौसम।

भावार्थ: (1) सत्य के समान कोई तप या ज्ञान नहीं और झूठ के समान कोई पाप नहीं। जिसके हृदय में सत्य का निवास है, उसका हृदय निर्मल एवं पापरहित होता है और उसमें स्वयं भगवान विराजते हैं — अर्थात् सत्यवादी को ईश्वर के दर्शन होते हैं और समाज उसका आदर करता है। (2) जो तुम्हारे रास्ते में काँटा बोता है अर्थात् तुम्हारी बुराई करता है, तुम उसके लिए फूल बोओ अर्थात् उसकी भलाई करो। तुम्हारी अच्छाई का फल तुम्हें फूल (सुख) मिलेगा और उसकी बुराई का फल उसे त्रिशूल (कष्ट) मिलेगा। सार यह कि अच्छा काम करो और अच्छा फल पाओ। (3) हे मन! धैर्य रखो — सब काम धीरे-धीरे समय आने पर ही होते हैं। माली चाहे सौ घड़े पानी सींच दे, पर फल तो ऋतु (उचित समय) आने पर ही लगते हैं।

2. सूरदास

कवि परिचय: भक्तिकाल के श्रेष्ठ कवि सूरदास हिन्दी के ‘सूर्य’ जैसे तेजस्वी कवि हैं। उनका जन्म सन् 1478 में दिल्ली के निकट सीही गाँव में एक गरीब ब्राह्मण परिवार में हुआ। वे अंधे थे (पर जन्मांध नहीं जान पड़ते)। वे बल्लभाचार्य के शिष्य बने और ब्रज में गोवर्धन के पास पारसोली में रहकर पद रचते रहे। वात्सल्य भाव के वे मर्मज्ञ थे। श्रीमद्भागवत पर आधारित उनका विशाल ग्रंथ ‘सूर सागर’ हिन्दी की अमूल्य निधि है।

पद

1. मैया मोहि दाऊ बहुत खिझायो। मोसों कहत मोल को लीन्हों, तू जसुमति कब जायो॥ कहा कहौं एही रिस के मारे, खेलन हौं नहिं जात। पुनि-पुनि कहत कौन है माता, कौन है तुमरो तात॥ गोरे नन्द, जसोदा गोरी, तू कत स्याम सरीर। चुटकी दै दै हँसत ग्वाल सब, सिखै देते बलवीर॥ तू मोही को मारन सीखी, दाउहि कबहूँ न खीझै। मोहन मुख रिस की ये बातैं, जसुमति सुनि-सुनि रीझै॥ सुनहु कान्ह बलभद्र चबाई, जनमत ही को धूत। सूर स्याम मोहि गोधन की सौं, हौं माता तू पूत॥

2. हरि अपने आँगन कछु गावत। तनक-तनक चरनन सौं नाचत, मनहिं-मनहिं रिझावत॥ बाँह उचाइ काजरी-धौरी, गैयनि टेरि बुलावत। कबहुँक बाबा नंद पुकारत, कबहुँक घर मैं आवत॥ माखन तनक आपने कर लै, तनक-बदन मैं नावत। कबहुँ चितै प्रतिबिम्ब खंभ मैं, लौनी लिए खबावत॥ दुरि देखति जसुमति यह लीला, हरष आनंद बढ़ावत। सूर स्याम के बाल-चरित ये, नित देखत मन भावत॥

शब्दार्थ: मैया = माँ। मोहि = मुझे। दाऊ = बड़े भाई बलराम। खिझायो = चिढ़ाया। मोसों = मुझसे। मोल = खरीद कर। लीन्हों = लाया गया। जसुमति = यशोदा। जायो = जन्मा। रिस = क्रोध। तात = पिता। कत = क्यों। स्याम = काला। चुटकी = अंगूठे व पास की अंगुली से बजाना। ग्वाल = गोपाल। बलवीर = बलराम। रीझै = प्रसन्न होना। चबाई = चुगलखोर। जनमत = जन्म से। धूत = शैतान। गोधन = गाय रूपी धन। सौं = सौगंध। पूत = पुत्र। तनक-तनक = नन्हें-नन्हें। लौनी = मक्खन। खबावत = खिलाते हैं। दुरि = छिपकर।

भावार्थ: (1) बालक कृष्ण माँ यशोदा से शिकायत करते हैं — माँ! बलराम भैया मुझे बहुत चिढ़ाते हैं। वे कहते हैं कि तुझे मोल (खरीद कर) लाया गया है, यशोदा ने तुझे जन्म नहीं दिया। इसी क्रोध के कारण मैं खेलने नहीं जाता। वे बार-बार पूछते हैं कि तेरी माता कौन और पिता कौन? नंद गोरे, यशोदा गोरी, फिर तू क्यों साँवला है? यह सुनकर ग्वाल-बालक चुटकी बजाकर हँसते हैं और बलराम उन्हें सिखाते हैं। कृष्ण की यह रूठी हुई, क्रोधभरी बातें सुनकर यशोदा मन-ही-मन रीझ (प्रसन्न हो) जाती हैं और गोधन की सौगंध खाकर कहती हैं — मैं तेरी माता हूँ और तू मेरा पुत्र है। (2) कृष्ण आँगन में अकेले खेलते हुए कुछ गा रहे हैं, नन्हें चरणों से नाचते और मन-ही-मन रीझते हैं। कभी हाथ उठाकर काली-सफेद गायों को पुकारते हैं, कभी नंद बाबा को बुलाते हैं, तो कभी घर के भीतर जाकर मक्खन खाते और थोड़ा मुँह पर लगा लेते हैं। कभी खंभे में अपना प्रतिबिम्ब देखकर उसे मक्खन खिलाते हैं। यशोदा दूर खड़ी यह बाललीला देखकर आनंदित होती हैं। सूरदास कहते हैं — कृष्ण की यह बाललीला रोज देखने पर भी मन को प्यारी लगती है, मन तृप्त ही नहीं होता।

3. तुलसीदास

कवि परिचय: भक्त कवि तुलसीदास का जन्म सन् 1532 में उत्तर प्रदेश के राजापुर में हुआ और देहांत सन् 1633 में। बचपन में उन्हें बड़ा कष्ट उठाना पड़ा; गुरु नरहरिदास ने सहायता की। वे रामभक्त थे और रामानंद उनके गुरु थे। हिन्दी और संस्कृत के बड़े पंडित तुलसीदास ने रामचरितमानस लिखकर निष्कपट जीवन और आचरण का उदाहरण रखा। विनयपत्रिका, कवितावली, दोहावली, गीतावली आदि उनके अनेक ग्रंथ हैं। वे अवधी और ब्रजभाषा दोनों में लिखते थे।

दोहे

तुलसी मीठे वचन ते, सुख उपजत चहुँओर। वसीकरण यह मंत्र है, परिहरु वचन कठोर॥ गोधन, गजधन, बाजिधन और रतनधन खान। जब आवे सन्तोष धन, सब धन धूरि समान॥ रोष न रसना खोलिए, बरु खोलिओ तरवारि। सुनत मधुर परिनाम हित, बोलिअ वचन विचारि॥

शब्दार्थ: मीठे = मधुर। वचन = बात, वाणी। ते = से। उपजत = उत्पन्न होना। चहुँओर = चारों ओर। वसीकरण = वश में करना। मंत्र = प्रभावी शब्द। परिहरु = त्यागना, छोड़ना। कठोर = कठिन, अप्रिय। गोधन = गाय रूपी धन। गज = हाथी। बाजि = घोड़ा। खान = भंडार। सन्तोष धन = संतोष रूपी धन। धूरि = धूल, रेत। समान = बराबर। रोष = क्रोध। रसना = जीभ। बरु = बल्कि। तरवारि = तलवार। परिनाम = परिणाम। हित = भलाई। विचारि = सोच-समझकर।

भावार्थ: (1) मीठे वचन सबको प्रिय होते हैं; मीठी वाणी से हम सबको अपने वश में कर सकते हैं और चारों ओर सुख-शांति फैलती है। इसके विपरीत कड़वे वचन सबको दुःख पहुँचाते हैं। मीठा वचन तो वशीकरण मंत्र के समान है — इसलिए कठोर वचन त्यागकर मीठा ही बोलना चाहिए। (2) चाहे गाय, हाथी, घोड़े रूपी धन हो या धनरत्न-हीरे-मोती — यदि मन में संतोष नहीं है तो ये सब धूल के बराबर तुच्छ हैं, क्योंकि इनसे सच्चा सुख-शांति नहीं मिलती; मन चिंतित ही रहता है। सबसे बड़ा धन संतोष है। (3) क्रोध के समय जीभ नहीं खोलनी चाहिए (चाहे तलवार खोल लो) क्योंकि क्रोध में कहे कड़वे वचन तलवार से भी गहरा घाव करते हैं। तलवार शरीर पर घाव करती है, पर कड़वे वचन हृदय और मन को घायल कर अधिक कष्ट देते हैं — इसलिए सदा सोच-समझकर मधुर वचन बोलना चाहिए।

4. रहीम

कवि परिचय: रहीम का पूरा नाम अब्दुर्रहीम खानखाना है। जन्म सन् 1556 में हुआ। वे अकबर के अभिभावक बैरम खाँ के पुत्र थे। बाद में उन्हें गुजरात की सूबेदारी मिली। रहीम अरबी, फारसी, तुर्की, संस्कृत और हिन्दी के अच्छे जानकार थे तथा हिन्दू संस्कृति और भक्ति-भावना से प्रभावित थे। बड़े पद पर होकर भी उनमें गर्व नहीं था; वे सहृदय, स्वाभिमानी, वीर और दानी थे। उनके दोहों में भक्ति, नीति, वैराग्य और शृंगार मिलते हैं। रहीम रत्नावली और रहीम विलास उनके प्रामाणिक संग्रह हैं।

दोहे

तरुवर फल नहीं खात है, सरवर पियहिं न पान। कहि रहीम पर काज हित संपति संचहि सुजान॥ रहिमन देखि बड़ेन को लघु न दीजिए डारि। जहाँ काम आवै सुई कहा करै तलवारि॥ रहिमन पर उपकार के करत न यारी बीच। मांस दिये शिबि भूप ने, दिन्हीं हाड़ दधीचि॥

शब्दार्थ: तरुवर = पेड़, वृक्ष। खात = खाता। सरवर = तालाब। पियहिं = पीता है। पान = पानी, जल। पर = पराया। हित = मंगल। संचहि = एकत्र/संचय करना। सुजान = उत्तम/ज्ञानी लोग। लघु = छोटा। डारि = फेंकना, छोड़ना। सुई = सूची। तलवारि = तलवार। यारी = दोस्ती। भूप = राजा। हाड़ = हड्डी।

भावार्थ: (1) पेड़ अपना फल स्वयं नहीं खाता और तालाब अपना पानी स्वयं नहीं पीता — ये दोनों दूसरों के लिए फल और पानी की बचत करते हैं। इसी प्रकार ज्ञानी एवं सज्जन लोग दूसरों की भलाई (परोपकार) के लिए संपत्ति का संचय करते हैं; परोपकार ही सबसे महान कार्य है। (2) बड़ों को देखकर छोटों को तुच्छ समझकर नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि समाज में दोनों का अलग-अलग महत्व है। जहाँ छोटी-सी सुई का काम होता है, वहाँ तलवार कुछ नहीं कर सकती — इसलिए छोटे-बड़े दोनों का आदर करना चाहिए। (3) परोपकार केवल मित्रता देखकर नहीं किया जाता; वह किसी के भी साथ, कहीं भी आवश्यकता पड़ने पर किया जा सकता है। जैसे — राजा शिबि ने अपरिचित बाज के लिए अपने शरीर का मांस दे दिया और ऋषि दधीचि ने देवताओं की भलाई के लिए अपनी हड्डियाँ दान कर दीं (जिनसे वज्र बना और वृत्रासुर मारा गया) — इनसे उन्हें किसी लाभ की आशा नहीं थी, केवल परोपकार की भावना थी।

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