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गद्य पाठ 5: जननी जन्मभूमि

गद्य विभाग · पाठ 5 · हिन्दी सौरभ

हिन्दी (गद्य) · Odisha Board Class 10 · संकलित — ओड़िशा का इतिहास (निबंध) · 25 क्विज़

जननी जन्मभूमि — पाठ-परिचय, विषय-वस्तु, सार एवं शब्दार्थ

पाठ-परिचय (संकलित)

यह संकलित निबंध हमारी जन्मभूमि ओड़िशा (उत्कल, कलिंग, कोशल आदि) के गौरवशाली इतिहास और वर्तमान प्रगति के बारे में जानकारी देता है। कलिंग के लोग बड़े वीर और साहसी थे; कलिंग की सेना ने सम्राट अशोक की सेना का डटकर मुकाबला किया। मध्यकाल में गजपति राजाओं ने गंगा से गोदावरी तक राज्य फैलाया। उत्कल भूमि मंदिर-मूर्तियाँ बनाने की कला तथा चित्रकला-शिल्प में प्रख्यात रही। स्वतंत्रता के बाद यहाँ अनेक उद्योग, कारखाने व बंदरगाह स्थापित हुए और यह प्रांत आज प्रगति के पथ पर चल रहा है।

जन्मभूमि : ओड़िशा के नाम

ओड़ देश या ओड़िशा के कई नाम मिलते हैं — कलिंग, उत्कल, कंगोद और कोशल। एक-एक नाम किसी अंचल या काल में अधिक प्रिय हुआ। ‘उत्कल’ का अर्थ है — उत्कृष्ट (श्रेष्ठ) कला का देश।

पाठ का सार

संसार की विविधता : यह दुनिया बड़ी अजीब (निराली) है — इसमें पहाड़, जंगल, नदियाँ, झरने, सागर, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और नर-नारी सब हैं। भला भी है तो बुरा भी। तुलसीदास कहते हैं — ‘जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार।’ यह विविधता का भंडार है; अच्छे लोग अच्छाई को चुनते हैं, जैसे हंस दूध पी लेता है और पानी छोड़ देता है। संसार हर पल बदलता है — ऋतुएँ, मौसम, सुख-दुःख, अमीरी-गरीबी सब बदलते रहते हैं। पर मनुष्य अंधेरी रात से डरता नहीं, लड़ता है; उसकी अदम्य जिज्ञासा नया-नया इतिहास रचती है।

इतिहास का पहला पन्ना — कलिंग का शौर्य : ईस्वी पूर्व तीसरी शताब्दी में लिखा है — ‘कलिंगा: साहसिका:’, क्योंकि कलिंग के सैनिकों ने विशाल मगध-सेना के दाँत खट्टे कर दिए। उन्होंने सम्राट अशोक का डटकर मुकाबला किया — जानें दीं, पर जमीन नहीं दी। लाखों मरे, लाखों बंदी बने; ‘दया’ नदी में रक्त की धारा बह चली। इस भीषण नरसंहार से प्रचंड अशोक घबरा गया और धर्मशोक बन गया — उसने युद्ध छोड़ा, तलवार फेंकी और मानव-प्रेम व अहिंसा की नीति अपनाई। धौली के अशोकीय शिलालेख इसका बयान करते हैं। बाद में कलिंग सम्राट खारवेल ने मगध पर आक्रमण कर ‘कलिंग जिन’ (मगध से लाई मूल्यवान वस्तु/मूर्ति) वापस ले आया; खण्डगिरि-उदयगिरि के शिलालेख व गुफाएँ उसका यशोगान करती हैं। आधुनिक युग में बक्सि जगबन्धु, सुरेन्द्र साय, चाखि खुण्टिया, चक्रधर बिसोई, लक्ष्मण नायक जैसे साहसी सपूतों ने अंग्रेजों को भी चैन से नहीं बैठने दिया — प्राण दे दिये, पर अन्याय नहीं सहा।

इतिहास का दूसरा पन्ना — उत्कृष्ट कला : उत्कल कलाओं का देश है। भुवनेश्वर, पुरी और कोणार्क के विशाल मंदिर आज भी सिर उठाये खड़े हैं — ये दुनिया के अजूबे हैं। हजारों नारी-मूर्तियाँ, हाथी-घोड़े-पहिये-कमल, रथाकार मंदिर, नृत्य-गान का माहौल! ओड़िशा के सूती व पाट के वस्त्र, सोने-चाँदी के गहने, काँसे-पीतल के बर्तन, सींग की कलाकृतियाँ विदेशी बाजार का आकर्षण रहीं; ओड़िशी चित्रकला, नृत्य व संगीत विदेशों में लोकप्रिय हैं। ओड़िआ साधव (बनिये) छोटे-बड़े नावों में सुदूर पूर्वी द्वीपों में व्यापार फैलाये हुए थे — वे न तूफान से डरते, न गहरे सागर से; नारा देते — ‘आ का मा भै’ (हमें किसी का डर नहीं)। चिलिका झील उत्कल-लक्ष्मी की विलास-सरोवर रही। पर जैसे दीपक जलता है तो बुझता भी है — ओड़िशा का यह शौर्य, ऐश्वर्य और वैभव काल के गर्भ में विलीन हो गया; उसका पतन हो गया।

पुनर्जागरण : बीसवीं शती के आरंभ में महापुरुष मधुसूदन (दास) ने यह इतिहास पढ़ा; उनका दिल भर आया। उन्होंने सोते को जगाया — ‘हे उत्कल के सपूतो! उठो, जागो! अपने पुराने गौरव को याद करो... अब तो उठो! करो या मरो।’ ओड़िशावासियों ने यह पुकार सुनी — अप्रैल 1936 को स्वतंत्र ओड़िशा प्रदेश बना। उत्कल विश्वविद्यालय स्थापित हुआ, स्कूल-कॉलेज, इंजीनियरिंग व मेडिकल कॉलेज खुले। हीराकुद बाँध बना, खेतों की सिंचाई हुई, अनाज बढ़ा; राउरकेला से लोहे का उत्पादन, सुनाबेड़ा में हवाई जहाज, पराद्वीप बंदरगाह से नौवाणिज्य; इम्फा, नालको, जिन्दल, वेदान्त जैसी कंपनियाँ; चाँदीपुर और बडमाल में रक्षा-सामग्री बनने लगी।

संदेश : सदियों बाद फिर ओड़िशा की किस्मत पलटी है — वह प्रगति के रास्ते पर है, दूसरे राज्यों के साथ कदम-से-कदम मिलाकर चल रहा है। हम सबको इससे लाभ उठाना चाहिए और नये उद्यमों में भागीदारी करनी चाहिए — तभी ओड़िशा का नया गौरवशाली इतिहास बन सकेगा।

शब्दार्थ

निराला = विचित्र, अनोखा। स्थावर = स्थिर रहनेवाले। जंगम = चलने-फिरनेवाले। जड़ = लकड़ी-पत्थर जैसी वस्तुएँ। चेतन = जीव। सुहावना = सुखकर। फकीरी = गरीबी। खुशहाली = सुख का वक्त। बदहाली = बुरा समय। गम = दुःख। पन्ना = पृष्ठ। सिलसिला = कड़ी, क्रम। अजूबा = आश्चर्य-वस्तु। झील = बड़ा जलाशय। शौर्य = वीरत्व। आखिरकार = अंत में। सपूत = सुपुत्र। हंस का विवेक (नीर-क्षीर विवेक) = गुण को ग्रहण करना और दोष को छोड़ना। चार दिन की चाँदनी फिर अँधेरी रात = कुछ दिन सुख के फिर दुःख (कहावत)। दिल दहलना = डर जाना। कलिंग जिन = वह मूल्यवान वस्तु जो मगध से लायी गयी थी। आ का मा भै = ओड़िशा के बनिये समुद्र में बोहित (नाव) छोड़ते वक्त यह नारा देते थे (हमें किसी का डर नहीं)। विलास सरोवर = चिलिका, व्यापार का केन्द्र जहाँ धनरत्न आते थे। अदम्य = न दबनेवाली। जिज्ञासा = जानने की इच्छा।

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