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पाठ 7: मैं और मेरा देश

गद्य खंड · पाठ 7 · गंगा

हिन्दी (गद्य) · CBSE Class 9 · गंगा · पाठ 7: मैं और मेरा देश (कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’) · 25 क्विज़

पाठ 7 — मैं और मेरा देश (लेखक परिचय, सार, शब्दार्थ)

यह ‘गंगा’ (कक्षा 9) के गद्य खंड की सातवीं एवं अंतिम रचना है — कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ का प्रेरक निबंध, जो बताता है कि व्यक्ति और उसका देश दो अलग चीज़ें नहीं, बल्कि एक ही सत्ता के दो रूप हैं — मेरा हर अच्छा-बुरा कर्म मेरे देश की प्रतिष्ठा से जुड़ा है।

लेखक परिचय — कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’

जन्म सन् 1906, देवबंद (जिला सहारनपुर, उ.प्र.)। वे प्रसिद्ध पत्रकार, निबंधकार व स्वतंत्रता सेनानी थे — नया जीवन तथा विकास जैसी पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया। स्वाधीनता-संग्राम में सक्रिय भाग लेकर अनेक बार जेल-यात्रा की। सहज, प्रेरक व आत्मीय शैली उनके लेखन की विशेषता है। उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया। निधन सन् 1995। प्रमुख कृतियाँ — ज़िंदगी मुस्कराई, माटी हो गई सोना, दीप जले शंख बजे, आकाश के तारे–धरती के फूल।

निबंध का मूल भाव / सार

लेखक कहता है कि ‘मैं’ और ‘मेरा देश’ दो अलग सत्ताएँ नहीं हैं — जैसा मैं हूँ, वैसा ही मेरा देश बनता है। जब कोई भारतीय विदेश में कुछ भी बुरा करता है तो वह केवल अपना नहीं, पूरे भारत का नाम डुबोता है; और जब वह अच्छा करता है तो पूरे देश का सिर ऊँचा होता है। लेखक इसे ‘मानसिक भूकंप’ (लाला लाजपत राय के शब्द — विदेश में भारत की गुलामी व पिछड़ेपन की लज्जा का कलंक) से जोड़ता है और कई प्रसंगों से इस सत्य को उजागर करता है।

केंद्रीय संदेश: राष्ट्र कोई बाहरी वस्तु नहीं — वह हम नागरिकों से मिलकर बनता है। इसलिए प्रत्येक नागरिक को अपने अधिकारों के साथ कर्तव्यों का भी बोध होना चाहिए, और हर कर्म में देश की प्रतिष्ठा का ध्यान रखना चाहिए। चुनाव में सोच-समझकर ‘ठीक मनुष्य’ को मत देना भी इसी देश-भक्ति की कसौटी है।

पाठ के प्रमुख प्रसंग (दृष्टांत)

1. स्वामी रामतीर्थ व जापानी युवक — स्वामी जी ताज़े फल लेने जापानी दुकान पर गए; युवक ने ताज़े फल न होने पर यह कहने से मना किया कि ‘जापान में अच्छे फल नहीं मिलते’ — क्योंकि इससे पूरे जापान का अपमान होता। यानी नागरिक अपने देश के गौरव को अपने से ऊपर रखता है।

2. पुस्तकालय से चित्र चुराने वाला विद्यार्थी — एक भारतीय विद्यार्थी द्वारा विदेशी पुस्तकालय से चित्र चुराने पर सभी भारतीय विद्यार्थियों पर प्रतिबंध लगा दिया गया — एक व्यक्ति की गलती पूरे देश पर कलंक बन जाती है।

3. कमालपाशा व देहाती बूढ़ा — तुर्की में कमालपाशा को एक देहाती बूढ़े ने शहद भेंट किया और दाम लेने से मना कर दिया — यह दिखाता है कि देश का साधारण नागरिक भी अपने नेता/देश से कितने प्रेम से जुड़ा होता है।

4. नेहरू जी व किसान की खाट — पं. नेहरू एक गरीब किसान की खाट पर प्रेमपूर्वक बैठे — नेता व जनता के बीच आत्मीय जुड़ाव का प्रतीक।

शक्ति-बोध और सौंदर्य-बोध

लेखक कहता है कि नागरिक में दो बोध जगने चाहिए — शक्ति-बोध (अपने व देश के सामर्थ्य का विश्वास) और सौंदर्य-बोध (देश की संस्कृति, प्रकृति व मूल्यों के प्रति प्रेम व गर्व)। इन्हीं से सच्ची राष्ट्र-भावना पनपती है।

अधिकार और कर्तव्य · चुनाव की कसौटी

स्वतंत्र देश में नागरिक को अधिकार मिले हैं, पर अधिकार के साथ कर्तव्य भी जुड़े हैं। लेखक चुनाव को लोकतंत्र की कसौटी मानता है — ‘ठीक मनुष्य को अपना मत दें’; सोच-समझकर दिया गया एक मत देश का भविष्य बनाता है।

साथ-साथ पढ़ें — निर्मल जीत सिंह सेखों

इस पाठ के साथ परमवीर चक्र विजेता फ्लाइंग ऑफिसर निर्मल जीत सिंह सेखों की वीरगाथा दी गई है — जिन्होंने 1971 के युद्ध में अद्भुत शौर्य दिखाकर देश के लिए बलिदान दिया। यह ‘मैं और मेरा देश’ के भाव का जीवंत उदाहरण है।

विधा — निबंध

निबंध गद्य की वह विधा है जिसमें लेखक किसी विषय पर अपने विचार, भाव व तर्क क्रमबद्ध, तर्कसंगत व सहज रूप में प्रस्तुत करता है। यह ‘विचारात्मक/भावात्मक’ निबंध है, जिसमें दृष्टांतों के माध्यम से राष्ट्र-भावना को समझाया गया है।

शब्द-संपदा (शब्दार्थ)

अविभाज्य = जिसे अलग न किया जा सके; कलंक = धब्बा/दाग; लज्जा = शर्म; प्रतिष्ठा = मान-सम्मान; दृष्टांत = उदाहरण; बोध = समझ/अनुभूति; कसौटी = परख का आधार; सामर्थ्य = शक्ति/क्षमता; दरार = फटन/विभाजन; गाँठ = गुत्थी/मन का मैल; भेंट = उपहार; शौर्य = वीरता; बलिदान = त्याग/न्योछावर।

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