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पाठ 11: झाँसी की रानी

काव्य खंड · पाठ 11 · गंगा

हिन्दी (काव्य) · CBSE Class 9 · गंगा · पाठ 11: झाँसी की रानी (सुभद्राकुमारी चौहान) · 25 क्विज़

पाठ 11 — झाँसी की रानी / सुभद्राकुमारी चौहान (कवयित्री परिचय, सार, शब्दार्थ)

यह ‘गंगा’ (कक्षा 9) के काव्य खंड की चौथी रचना है — सुभद्राकुमारी चौहान की अत्यंत प्रसिद्ध कथात्मक (वीर-रस) कविता, जो 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि पर रानी लक्ष्मीबाई के जीवन, संघर्ष व बलिदान का ओजपूर्ण चित्रण करती है।

कवयित्री परिचय — सुभद्राकुमारी चौहान

जन्म सन् 1904, प्रयागराज (उ.प्र.); आरंभिक शिक्षा प्रयागराज में। वे प्रसिद्ध रचनाकार होने के साथ स्वतंत्रता सेनानी भी थीं — आंदोलन के कारण दो बार जेल गईं। उनके लेखन में देश-प्रेम, स्त्री-केंद्रित विषय व स्वाधीनता-संग्राम के प्रति गहन प्रतिबद्धता है; भाषा की सहजता ने उन्हें व्यापक लोकप्रियता दी। प्रमुख रचनाएँ — मुकुल, त्रिधारा (कविता), बिखरे मोती, उन्मादिनी, सीधे-सादे चित्र (कहानी), कदंब का पेड़, सभा का खेल (बाल-साहित्य)। मुकुल व बिखरे मोती के लिए दो बार ‘सेकसरिया पुरस्कार’। निधन सन् 1948; भारतीय डाक विभाग ने उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया।

कविता का सार (कथा-क्रम)

1857 में सिंहासन हिल उठे और बूढ़े भारत में फिर से नई जवानी (विद्रोह) आई; सबने अंग्रेज़ों (फिरंगी) को दूर करने की ठान ली। रानी लक्ष्मीबाई — नाना साहब की मुँहबोली बहन ‘छबीली’ — बचपन से ही बरछी, ढाल, कृपाण के साथ खेलती, नकली युद्ध, व्यूह-रचना व शिकार उसके प्रिय खेल थे। झाँसी में ब्याह कर आने के बाद सुख-सौभाग्य छाया, पर राजा की निःसंतान मृत्यु से रानी विधवा हो गईं। ‘बुझा दीप झाँसी का’ देख डलहौजी ने ‘राज्य-हड़प नीति (डॉक्ट्रिन ऑफ़ लैप्स)’ के बहाने झाँसी हड़प ली। चारों ओर दिल्ली, लखनऊ, कानपुर, मेरठ आदि में क्रांति की लपटें उठीं; नाना धुंधूपंत, तांतिया टोपे, अज़ीमुल्ला, अहमदशाह मौलवी, कुँवरसिंह जैसे वीर साथ आए। रानी ने लेफ़्टिनेंट वॉकर को घायल कर भगाया, कालपी होते हुए ग्वालियर पर अधिकार किया; पर अंततः जनरल ह्यू रोज़ की सेना से घिरकर, नाला पार करते समय नया घोड़ा अड़ जाने पर घायल होकर, मात्र तेईस वर्ष की आयु में वीरगति को प्राप्त हुईं। कवयित्री कहती हैं — वे ‘स्वतंत्रता नारी’ बनकर हमें जगाने आई थीं; उनका बलिदान स्वतंत्रता की अविनाशी ज्योति जगाता रहेगा।

मूल भाव: कविता वीरता, त्याग, देश-प्रेम व नारी-शक्ति का ओजस्वी गान है। ध्रुपद-पंक्तियाँ “बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥” पूरी कविता में बार-बार आकर उसकी वीरता को अमर बनाती हैं।

विधा व शैली

यह कथात्मक वीर-रस की कविता है जिसमें कविता व कहानी के तत्व जुड़े हैं — घटनाओं का क्रम (बचपन → विवाह → वैधव्य → राज्य-हड़प → युद्ध → वीरगति) है। गेयता, प्रवाह व ओज इसे जीवंत बनाते हैं; हर छंद के अंत में एक ही टेक (ध्रुपद) दोहराई जाती है।

शब्द-संपदा (शब्दार्थ)

फिरंगी = अंग्रेज़/विदेशी; मर्दानी = बहादुर/पुरुषोचित; छबीली = तेजस्वी/सजीली/सुंदर; बरछी = छोटा भाला; ढाल = वार रोकने का साधन; कृपाण/कटारी = तलवार/छोटा शस्त्र; गाथा = कथा/प्रशंसा-गीत; दुर्ग = किला; सुभट = रणकुशल योद्धा; विरुदावलि = यशोगान/कीर्ति-गाथा; बिरानी = पराई; बिसात = हैसियत/सामर्थ्य; निपात = गिरना/विनाश; बेजार = दुखी/ऊबा हुआ; सन्मुख = सामने/भिड़ने वाला; कृतज्ञ = एहसानमंद; अविनाशी = अक्षय/नित्य; मदमाती = मस्त/मदमत्त; स्मारक = याद दिलाने वाला/स्मृति-भवन; अवतारी = अवतार लेने वाली/दिव्य गुण-संपन्न।

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